16 अप्रैल 2026

महाविद्या बगलामुखी कवच

 महाविद्या बगलामुखी कवच


श्री बगलामुखी विद्या, जिसे 'पीताम्बरा विद्या' भी कहा जाता है, दस महाविद्याओं में आठवीं और अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक विद्या है। यह विद्या मुख्य रूप से 'स्तम्भन' (किसी भी गतिशील वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को रोक देना) की अधिष्ठात्री है। विशेष रूप से लड़ाई झगड़े और कोर्ट केस मे बगलामुखी कवच और पूजन विशेष लाभदायक माना गया है । उनका सिद्धि दिवस वैशाख शुक्ल अष्टमी को होता है । इस अवसर पर कुछ बगलामुखी कवच अभिमंत्रित करूंगा जिसे आप नीचे लिखे नंबर पर अपनी समस्या की जानकारी और निर्धारित शुल्क देकर बूक कर सकते हैं जो आपको 26 अप्रेल को भेजूँगा और एक हफ्ते मे आपके पास पहुँच जाएगा । इसे आप गले मे धारण कर सकते हैं ।  



माँ बगलामुखी पीले वस्त्र धारण करती हैं और स्वर्ण के समान चमकती हैं। उनके एक हाथ में गदा है और दूसरे हाथ से वे शत्रु की जिव्हा (जीभ) पकड़े हुए हैं।जिव्हा को पकड़ना केवल बोलने से रोकने का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह 'बुद्धि के नियंत्रण' का प्रतीक है।

बगलामुखी विद्या का मुख्य आधार 'स्तम्भन' है। तंत्र शास्त्र में इसके कई स्तर बताए गए हैं:

शत्रु स्तम्भन: विरोधियों की चालों को विफल करना।

बुद्धि स्तम्भन: गलत विचारों और भ्रम को रोकना।

प्राण स्तम्भन: योग साधना में सांसों की गति को नियंत्रित कर समाधि प्राप्त करना।

रोग स्तम्भन: शरीर में बढ़ते हुए असाध्य रोगों के प्रभाव को रोकना।



बगलामुखी ध्यान :-

मध्येसुधाब्धि-मणिमण्डप-रत्नवेद्यां,

सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्।

पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषिताङ्गीं,

देवीं भजामि धृत-मुद्गर-वैरि-जिह्वाम्॥


शब्दवार अर्थ और भावार्थ


मध्येसुधाब्धि (मध्ये-सुधा-अब्धि):

अर्थ: सुधा (अमृत) के अब्धि (सागर) के बीच में।

भाव: माँ का निवास स्थान अमृत का समुद्र है, जो मन की पूर्ण शांति और अमरता का प्रतीक है।


मणिमण्डप-रत्नवेद्यां:

अर्थ: मणियों से बने मंडप में रत्न जड़ित वेदी (आसन) पर।

भाव: यह साधक के हृदय के भीतर के उच्चतम और प्रकाशमान स्थान को दर्शाता है।


सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्:

अर्थ: सिंहासन पर विराजमान और पूर्णतः पीले वर्ण (स्वर्ण के समान आभा) वाली।

भाव: पीला रंग तेज, ज्ञान और 'स्तम्भन' की शक्ति का प्रतीक है।


पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषिताङ्गीं:

अर्थ: जिन्होंने पीले वस्त्र (पीताम्बर), पीले आभूषण और पीले फूलों की माला धारण की है।

भाव: माँ का पूरा स्वरूप सौम्य होते हुए भी अत्यंत तेजस्वी है, जो ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को केंद्रित करता है।


देवीं भजामि धृत-मुद्गर-वैरि-जिह्वाम्:

अर्थ: ऐसी देवी का मैं भजन करता हूँ, जिन्होंने अपने हाथों में मुद्गर (गदा) धारण की है और जो (दूसरे हाथ से) शत्रु की जिव्हा (जीभ) पकड़े हुए हैं।

भाव: यहाँ 'शत्रु' केवल बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे भीतर के बुरे विचार और अज्ञान हैं। माँ हमारी चंचल बुद्धि और व्यर्थ की वाणी को नियंत्रित कर हमें सत्य की ओर ले जाती हैं।


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