31 जुलाई 2022

गायत्री मंत्र द्वारा एक सौ आठ देवी देवताओं का पूजन साधना

 गायत्री मंत्र द्वारा एक सौ आठ देवी देवताओं का पूजन साधना 



गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा के द्वारा स्थापित गायत्री परिवार के माध्यम से संपूर्ण विश्व गायत्री मंत्र की शक्ति और क्षमता से परिचित हो चुका है और गायत्री मंत्र के महत्त्व से  सभी साधक गण अच्छी तरह से परिचित है .

यहाँ पर  मैं अपने गुरु भाई श्री राहुल कुलकर्णी जी के द्वारा प्राप्त हुई पूजन  विधि प्रस्तुत कर रहा हूं जिसके माध्यम से आप 108 देवी देवताओं का पूजन एक साथ सब बंद कर सकते हैं इसमें मुश्किल से आधा या 1 घंटे का समय लगेगा ।  

 इसमें आप मंत्र जाप करते हुए पुष्प अक्षत जल जो आपकी श्रद्धा हो उसे अपने इष्ट के विग्रह शिवलिंग आदि पर समर्पित कर सकते हैं। 

कुछ भी उपलब्ध नही हो तो भी किसी खाली  प्लेट मे एक आचमनी जल छोडते हुये संपन्न कर सकते है । 

प्रयोग के रूप में अगर आप इसे करना चाहे तो जो माला, रुद्राक्ष या रत्न आप पहनते हैं या पहनना चाहते हैं उसके ऊपर इन मंत्रों का जाप करते हुए जल अक्षत कुमकुम आदि चढ़ाकर आप उसे चैतन्य कर सकते हैं । यह आपके लिए रक्षा कवच ऐसा कार्य करेगा । 

इस पूजन में सभी प्रमुख देवी देवताओं के साथ-साथ नवग्रह का पूजन भी सम्मिलित है यही नहीं इसमें सभी दिशाओं के देवताओं का पूजन सम्मिलित होने के कारण वास्तु पूजन भी संपन्न हो जाता है एक प्रकार से यह एक बेहद सरल छोटा और अपने आप में संपूर्ण पूजन है जिसका प्रयोग आप किसी भी विशेष पूजन के अवसर पर या नित्य पूजन में भी कर सकते हैं ।  मंत्रों का उच्चारण करने में शुरू में थोड़ी दिक्कत हो सकती है लेकिन उच्चारण करते करते आप का उच्चारण होता है स्पष्ट होता जाएगा यदि किसी शब्द के उच्चारण में आपको दिक्कत है तो आप मेरे ऑडियो चैनल से इसे सुन सकते हैं जिसका लिंक नीचे दिया हुआ है :-




सर्वप्रथम हाथ जोडकर प्रणाम करे 

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: 

ॐ श्री गणेशाय नम: 

ॐ  गायत्र्यै नम: 

अब दाहिने हाथ मे जल लेकर 4 बार आचमन करे 

 ॐ  आत्मतत्वाय स्वाहा 

ॐ विद्यातत्वाय स्वाहा 

ॐ  शिवतत्वाय स्वाहा 

ॐ  सर्वतत्वाय स्वाहा 

फिर गुरु , परम गुरु और पारमेष्ठी गुरु को प्रणाम करे 

ॐ गुरुभ्यो नम: 

ॐ परम गुरुभ्यो नम: 

ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम: 

अब अपने आसन को स्पर्श कर पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ आसन देवताभ्यो नम: 

ॐ पृथिव्यै  नम: 

अब एक  कलश मे जल लेकर उसमे कपुर , चंदन , इत्र की कुछ बुंदे , तुलसी पत्र , पुष्प अक्षत डाले और कलश को तिलक करे . 

 ॐ कलश देवताभ्यो नम: 

अब अपने आप को चंदन या कुंकुम का तिलक  लगाये 

फिर दाहिने हाथ मे जल लेकर निम्न संकल्प का उच्चारण कर छोडे

मैं (अपना नाम ), गोत्र ( न मालूम हो तो भारद्वाज या कश्यप गोत्र बोल सकते हैं ), आज इस पुण्य अवसर पर अपनी मनोकामना (मन मे अपनी मनोकामना बोल दें या आध्यात्मिक उन्नती हेतु कहें ) की पूर्ति हेतु श्रद्धापूर्वक सकल देवता की कृपा हेतु अष्टोत्तर देवता गायत्री मंत्र अर्चन संपन्न कर रहा हू .

हाथ जोड़कर देवी गायत्री के स्वरूप का ध्यान करके प्रणाम कर लें । 

भगवती गायत्री का पंचोपचार पूजन करे 

ॐ भुर्भुव:  स्व: गायत्र्यै नम : गंधं समर्पयामि [कुमकुम चढ़ाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: पुष्पं समर्पयामि [फूल चढ़ाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: धूपं समर्पयामि [अगरबत्ती दिखाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: दीपं  समर्पयामि [दीपक]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: नैवेद्यं  समर्पयामि [प्रसाद ]



अब गायत्री मंत्र का 12 बार उच्चारण करे .

ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात् 

अब विविध देवताओं के गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश के जल से एक एक आचमनी जल चढ़ाएँ । या कुमकुम, पुष्प, बेलपत्र,चावल जो भी आपकी भावना हो उसे चढ़ा सकते हैं । 

विविध देवताओं के  गायत्री मंत्र 

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1) ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् 

2) ॐ गुरुदेवाय विद्महे परम गुरवे धीमहि तन्नो गुरु: प्रचोदयात् 

3) ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीश: प्रचोदयात् 

4) ॐ अनसुयासुताय विद्महे अत्रिपुत्राय धीमहि तन्नो दत्त: प्रचोदयात् 

5) ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात् 

6) ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंति प्रचोदयात् 

7) ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसरुढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् 

8) ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै च धीमहि तन्नो वाणी प्रचोदयात् 

9) ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् 

10) ॐ महालक्ष्म्यै  विद्महे विष्णुप्रियायै   धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् 

11) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् 

12) ॐ कात्यायन्यै च विद्महे कन्याकुमारी च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् 

13) ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वतीरुपाय च धीमहि तन्नो कालिका प्रचोदयात् 

14) ॐ तारायै विद्महे महोग्रायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

15) ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

16) ॐ ऐं त्रिपुरा देव्यै विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै धीमहि सौस्तन्न: क्लिन्ने प्रचोदयात् 

17) ॐ त्रिपुरसुंदर्यै च विद्महे कामेश्वर्यै धीमहि तन्नो बाला प्रचोदयात् 

18) ॐ भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

19)  ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

20) ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात् 

21) ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तंभिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

22) ॐ मातंग्यै च विद्महे उच्छिष्टचांडाल्यै  च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

23) ॐ महालक्ष्मी विद्महे विष्णुपत्नी धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् 

24) ॐ महिषमर्दिन्यै च विद्महे दुर्गादेव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

25) ॐ तुलसीदेव्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो वृंदा प्रचोदयात् 

26) ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् 

27) ॐ शैलपुत्र्यै च विद्महे काममालायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

28) ॐ ब्रह्मचारिण्यै विद्महे ज्ञानमालायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

29) ॐ चंद्रघण्टायै विद्महे अर्धचंद्राय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्

30) ॐ कुष्मांडायै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

31) ॐ कुमार्यै  च विद्महे स्कंदमातायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

32) ॐ कात्यायन्यै च विद्महे सिद्धिशक्त्यै च धीमहि तन्नो कात्यायनी प्रचोदयात् 

33) ॐ कालरात्र्यै च विद्महे सर्वभयनाशिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

34) ॐ सिद्धिदात्र्यै च विद्महे सर्वसिद्धिदायिनी च धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् 

35) ॐ महागौर्यै विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् 

36) ॐ ब्रह्ममनसायै विद्महे मंत्रअधिष्ठात्र्यै च धीमहि तन्नो मनसा प्रचोदयात् 

37) ॐ सुस्थिरयौवनायै विद्महे सर्वमंगलायै च धीमहि तन्नो मंगलचंडी प्रचोदयात् 

38) ॐ भूवाराह्यै च विद्महे रत्नेश्वर्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

39) ॐ वराहमुखी विद्महे आंत्रासनी च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्

40) ॐ ज्वालामालिन्यै च विद्महे महाशूलिन्यै च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्

41) ॐ भगवत्यै विद्महे महेश्वर्यै धीमहि  तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात्

42) ॐ व्यापिकायै विद्महे नानारुपायै धीमहि तन्नो योगिनी प्रचोदयात् 

43) ॐ सहस्त्रथनाय विद्महे जननीरुपायै च धीमहि तन्नो कामधेनु: प्रचोदयात् 

44) ॐ देवकीनंदनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात् 

45) ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् 

46) ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात् 

47) ॐ जनकनंदिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि तन्नो सीता प्रचोदयात्

48) ॐ दशरथसुताय विद्महे रामानुजाय धीमहि तन्नो लक्ष्मण: प्रचोदयात् 

49) ॐ अंजनीसुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमत प्रचोदयात् 

50) ॐ श्री निलयाय विद्महे व्यंकटेशाय धीमहि तन्नो हरि: प्रचोदयात् 

51) ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात् 

52) ॐ जामदग्नाय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात् 

53) ॐ धन्वंतराय विद्महे अमृतकलशहस्ताय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् 

54) ॐ सहस्त्रशीर्षाय विद्महे विष्णुतल्पाय धीमहि तन्नो शेष: प्रचोदयात् 

55) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुड: प्रचोदयात् 

56) ॐ पांचजन्याय विद्महे पवमानाय धीमहि तन्नो शंख: प्रचोदयात् 

57) ॐ सुदर्शनाय विद्महे चक्रराजाय धीमहि तन्नो चक्र: प्रचोदयात् 

58) ॐ यंत्रराजाय विद्महे वरप्रदाय धीमहि तन्नो यंत्र: प्रचोदयात् 

59) ॐ पाशुपतये विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात् 

60) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय  धीमहि तन्नो स्कंद: प्रचोदयात् 

61) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुंडाय धीमहि तन्नो नंदी: प्रचोदयात् 

62) ॐ आपदुद्धारणाय विद्महे बटुकेश्वराय धीमहि तन्नो वीर:  प्रचोदयात् 

63) ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नो अनंग: प्रचोदयात् 

64) ॐ कालवर्णाय विद्महे महाकोपाय धीमहि तन्नो वीरभद्र: प्रचोदयात् 

65) ॐ शालुवेषाय विद्महे पक्षिराजाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात् 

66) ॐ श्वानध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नो क्षेत्रपाल: प्रचोदयात् 

67) ॐ ओंकाराय विद्महे भवताराय धीमहि तन्नो प्रणव: प्रचोदयात् 

68) ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात् 

69) ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो चंद्र: प्रचोदयात् 

70) ॐ अंगारकाय  विद्महे शक्तिहस्ताय  धीमहि तन्नो  भौम: प्रचोदयात् 

71) ॐ सौम्यरुपाय  विद्महे बाणेशाय  धीमहि तन्नो बुध: प्रचोदयात् 

72) ॐ आंगिरसाय विद्महे दिव्यदेहाय  धीमहि तन्नो जीव: प्रचोदयात् 

73) ॐ शुक्राचार्याय विद्महे गौरवर्णाय धीमहि तन्नो शुक्र: प्रचोदयात् 

74) ॐ कृष्णांगाय विद्महे रविपुत्राय धीमहि तन्नो सौरि: प्रचोदयात् 

75) ॐ कृष्णवर्णाय विद्महे रौद्ररुपाय धीमहि तन्न: शनैश्चर: प्रचोदयात् 

76) ॐ शिरोरुपाय  विद्महे अमृतेशाय  धीमहि तन्न: राहु: प्रचोदयात् 

77) ॐ पद्मपुत्राय  विद्महे अमृतेशाय  धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात् 

78) ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्रमूर्त्यै च धीमहि तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात् 

79) ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्नि: प्रचोदयात् 

80) ॐ जलबिंबाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो अंबु  प्रचोदयात् 

81) ॐ विश्वपुरुषाय विद्महे शिवापत्ये च धीमहि तन्नो पवन: प्रचोदयात् 

82) ॐ सर्वव्यापकाय विद्महे गगनाय च धीमहि तन्नो आकाश: प्रचोदयात् 

83) ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्न: इंद्र: प्रचोदयात् 

84) ॐ वैश्वानराय विद्महे सप्तजिव्हाय धीमहि तन्नो अग्नि: प्रचोदयात् 

85) ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम: प्रचोदयात् 

86) ॐ ज्वालामुखाय विद्महे उष्ट्रवाहनाय धीमहि निऋति: प्रचोदयात् 

87) ॐ पश्चिमेशाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नो वरुण: प्रचोदयात् 

88) ॐ ध्वजहस्ताय विद्महे प्राणाधिपाय धीमहि तन्नो वायु: प्रचोदयात् 

89) ॐ यक्षराजाय विद्महे पुलस्त्य पुत्राय धीमहि तन्नो कुबेर: प्रचोदयात् 

90) ॐ अर्धदेवाय विद्महे व्यंतरदेवत्रे च धीमहि तन्नो यक्ष: प्रचोदयात् 

91) ॐ गीतवीणायै विद्महे कामरुपिण्यै धीमहि तन्नो गंधर्व: प्रचोदयात् 

92) ॐ कामदेवप्रियायै विद्महे सौंदर्यमूर्तये धीमहि तन्नो अप्सरा प्रचोदयात् 

93) ॐ सहस्त्रफणाय विद्महे वासुकिराजाय धीमहि तन्नो नाग: प्रचोदयात्

94) ॐ पितृवंशाय विद्महे प्रपितामहाय धीमहि तन्नो पितर: प्रचोदयात् 

95) ॐ नागपृष्ठाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नो वास्तु प्रचोदयात् 

96) ॐ पाराशरगोत्राय विद्महे नानापुराणाय धीमहि तन्नो व्यास: प्रचोदयात् 

97) ॐ आदिऋष्यै विद्महे रामायणाय धीमहि तन्नो वाल्मिकि: प्रचोदयात् 

98) ॐ ब्रह्ममानसपुत्राय विद्महे पुराणेतिहासकाराय धीमहि तन्नो वसिष्ठ: प्रचोदयात् 

99) ॐ शक्तिपुत्राय विद्महे पापानिती निवारणाय धीमहि तन्नो पराशर: प्रचोदयात् 

100) ॐ गाधिपुत्राय विद्महे गायत्रीमंत्रप्रवर्तकाय च धीमहि तन्नो विश्वामित्र: प्रचोदयात् 

101) ॐ अक्षुणोत्पत्ताय विद्महे ब्रह्मपुत्राय धीमहि तन्नो अत्रि: प्रचोदयात् 

102) ॐ कर्दमसुतायै विद्महे अत्रिभार्यायै धीमहि तन्नो अनसुया प्रचोदयात् 

103) ॐ सप्तर्षाय विद्महे मानसीसृष्टाय धीमहि तन्नो गौतम: प्रचोदयात् 

104) ॐ मृकुण्डुपुत्राय विद्महे योगज्ञानाय च धीमहि तन्नो मार्कंडेय: प्रचोदयात् 

105 ) ॐ शिवतत्त्वाय विद्महे योगांतराय धीमहि तन्नो पतंजली प्रचोदयात् 

106) ॐ त्रिपथगामिनी विद्महे रुद्रपत्न्यै च धीमहि तन्नो गंगा प्रचोदयात् 

107) ॐ यमुनादेव्यै च विद्महे तीर्थवासिनी च धीमहि तन्नो यमुना प्रचोदयात्

108) ॐ रुद्रदेहायै विद्महे मेकलकन्यकायै धीमहि तन्नो रेवा प्रचोदयात्

अब एक आचमनी जल निम्न मंत्र बोलते हुये अर्पण करे 

अनेन अष्टोत्तर देवता गायत्री मंत्र पूजनेन भगवती  गायत्री सह सकल देवतां प्रीयतां न मम .. 

अब क्षमा प्रार्थना करे .

आवाहनं न जानामि , न जानामि विसर्जनं 

पूजां चैव न जानामि , क्षम्यतां परमेश्वरी 

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी 

यत पूजितं मया परिपूर्णं तदस्तु मे 

देव देव गुरुदेव पूजां प्राप्य करोतु यत 

त्राहि त्राहि कृपासिंधु पूजा पूर्णतरां कुरु 

ॐ तत्सत ब्रह्मार्पणं अस्तु


24 जुलाई 2022

एक गोपनीय शाबर रक्षा मंत्र

  एक गोपनीय शाबर रक्षा मंत्र



यह सद्गुरुदेव डा नारायण दत्त श्रीमाली जी के द्वारा दिया गया एक अद्भुत मंत्र है ..... 


ॐ रक्षो रक्ष महावीर !

काला गोरा भेरूँ! बल वहन करे !

वज्र सी देह रक्षा करे ! एडी सू चोटी चोटी सू एडी !

तणो वज्र निरधार झरे ! ठम ठम ठम !!!



इसे आप 108 बार जपकर सूर्यग्रहण/होली/शिवरात्रि/अमावस्या/नवरात्रि  के अवसर पर सिद्ध कर लें ।. 

सुबह उठते ही इसका नित्य 3 बार जाप करते रहें तो आपके ऊपर किसी प्रकार का प्रयोग आदि होने पर उससे रक्षा होगी ।.

18 जुलाई 2022

बिल्वपत्र समर्पण मंत्र

बिल्वपत्र समर्पण मंत्र 

मेरे आराध्य जगतगुरु दक्षिणामूर्ति देवाधिदेव महादेव के पूजन में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है बिल्वपत्र का समर्पण।

बिल्वपत्र या बेलपत्र को समर्पित करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले 108 स्तुतियों को आप शिव पूजन के लिए प्रयोग कर सकते हैं ।

 



त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।

त्रिजन्म पापसंहारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१॥

 

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।

तव पूजां करिष्यामि बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥२॥


सर्व त्रैलोक्य कर्तारं सर्व त्रैलोक्य पालनम् ।

सर्व त्रैलोक्य हर्तारं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥३॥


नागाधिराज वलयं नाग हारेण भूषितम् ।

नाग कुण्डल संयुक्तं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥४॥


अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वती प्रिय वल्लभम् ।

चन्द्रशेखरमीशानं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥५॥


त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गा देहार्ध धारिणम् ।

विभूत्यभ्यर्चितं देवं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥६॥


त्रिशूल धारिणं देवं नागाभरण सुन्दरम् ।

चन्द्रशेखरमीशानं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥७॥


गङ्गाधर अम्बिकानाथं फणि कुण्डल मण्डितम् ।

कालकालं गिरीशं च बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥८॥


शुद्ध स्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् ।

सर्वेश्वरं सदा शान्तं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥९॥


सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् ।

वागीश्वरं चिदाकाशं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१०॥


शिपिविष्टं सहस्राक्षं दुंदुभ्यश्च निषंगीणम ।

हिरण्यबाहुं सेनान्यं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥११॥


अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवम् ।

ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१२॥



हरिकेशं सनन्दीशं उच्चैर्घोषं सनातनम् ।

अघोर रूपकं कर्मम बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१३॥


पूर्वजावरजं याम्यं सूक्ष्मं तस्कर नायकम् ।

नीलकण्ठं जघन्यं च बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१४॥


सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनम् I

महासेनं महावीरं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१५॥


कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारथम् ।

तौर्यातौर्यं च देव्यं च बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१६॥


दशकर्णं ललाटाक्षं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम् ।

अशेष पाप संहारं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१७॥


नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीनानाथं महेश्वरम् ।

महापाप हरं शंभूम बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१८॥


चूडामणी कृतविभुं वलयीकृत वासुकिम् ।

कैलास निलयम भीमं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१९॥


कर्पूर कुन्द धवलं नरकार्णव तारकम् ।

करुणामृत सिन्धुं च बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२०॥


महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिप कङ्कणम् ।

महापाप हरं देवं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२१॥


भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनम् ।

वामे शक्तिधरं श्रेष्ठं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२२॥ 


कालेक्षणं विरूपाक्षं श्रीकण्ठं भक्तवत्सलम् ।

नीललोहित खट्वाङ्गं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२३॥


कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकम् ।

वृषाङ्कं वृषभारूढं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२४॥


सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलित विग्रहम् ।

मृत्युञ्जयं लोकनाथं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥२५॥


दारिद्र्य दुःख हरणं रविचन्द्रानलेक्षणम् ।

मृगपाणिं चन्द्रमौलिम बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥२६॥


सर्वलोकमयाकारं सर्वलोकैक साक्षिणम् ।

निर्मलं निर्गुणाकारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥२७॥


सर्व तत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकम् ।

सर्व तत्त्व स्वरूपं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥२८॥


सर्व लोक गुरुं स्थाणुं सर्वलोक वरप्रदम् ।

सर्व लोकैक नेत्रं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ २९॥


मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकम् ।

कमला प्रिय पूज्यं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥३०॥


तेजोमयं महाभीमं उमेशं भस्मलेपनम् ।

भव रोग विनाशं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ ३१॥


स्वर्गापवर्ग फलदं रघुनाथ वरप्रदम् ।

नगराज सुताकान्तं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥३२॥


मञ्जीरपाद युगलं शुभ लक्षण लक्षितम् ।

फणिराज विराजं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥३३॥


निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकम् ।

तेजोरूपं महारौद्रं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ ३४॥


सर्व लोकैक पितरं सर्व लोकैक मातरम् ।

सर्व लोकैक नाथं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥३५॥


चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वर वाहनम् ।

नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥३६॥


रत्नकञ्चुक रत्नेशं रत्नकुण्डल मण्डितम् ।

नवरत्नकिरीटं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ ३७॥


दिव्य रत्नाङ्गुली स्वर्णं कण्ठाभरण भूषितम् ।

नानारत्न मणिमयं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ ३८॥


रत्नाङ्गुलीय विलसत कर शाखा नखप्रभम् ।

भक्त मानस गेहं च बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥ ३९॥


वामाङ्ग भाग विलसद अंबिका वीक्षणप्रियम् ।

पुण्डरीकनिभाक्षं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४०॥


सम्पूर्ण कामदं सौख्यं भक्तेष्ट फलकारणम् ।

सौभाग्यदं हितकरं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४१॥


नानाशास्त्र गुणोपेतं स्फुरन्मङ्गल विग्रहम् ।

विद्या विभेद रहितं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४२॥


अप्रमेय गुणाधारं वेदकृद्रूप विग्रहम् ।

धर्माधर्म प्रवृत्तं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४३॥


गौरी विलास सदनं जीव जीवपितामहम् ।

कल्पान्त भैरवं शुभ्रं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४४॥


सुखदं सुख नाशं च दुःखदं दुःखनाशनम् ।

दुःखावतारं भद्रं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४५॥


सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्मफलप्रदम् ।

अतीन्द्रियं महामायं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४६॥


सर्वपक्षि मृगाकारं सर्वपक्षि मृगाधिपम् ।

सर्वपक्षि मृगाधारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४७॥


जीवाध्यक्षं जीववन्द्यं जीवजीवनरक्षकम् ।

जीवकृज्जीवहरणं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४८॥


विश्वात्मानं विश्ववन्द्यं वज्रात्मा वज्रहस्तकम् ।

वज्रेशं वज्रभूषं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥४९॥


गणाधिपं गणाध्यक्षं प्रलयानलनाशकम् ।

जितेन्द्रियं वीरभद्रं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५०॥


त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनम् ।

दिगम्बरं क्षोभनाशं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५१॥


कुन्देन्दु शङ्ख धवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलम् ।

कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५२॥


कम्बुग्रीवं कम्बुकण्ठं धैर्यदं धैर्यवर्धकम् ।

शार्दूल चर्मवसनं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५३॥


जगदुत्पत्ति हेतुं च जगत्प्रलय कारणम् ।

पूर्णानन्द स्वरूपं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५४॥


सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवणकीर्तनम् ।

ब्रह्माण्डनायकं तारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५५॥


मन्दार मूल निलयं मन्दार कुसुम प्रियम् ।

बृन्दारक प्रियतरं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥५६॥


महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकम् ।

सुलभासुलभं लभ्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५७॥


बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदम् ।

परेशं बीजनाशं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५८॥


युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनम् ।

परेशं बीज नाशं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥५९॥


धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलमण्डितम् ।

कर्पूरगौरं गौरीशं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६०॥


सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवम् ।

योगदं योगिनां सिंहं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६१॥


उत्तमानुत्तमं तत्त्वं अन्धकासुरसूदनम् ।

भक्त कल्पद्रुमस्तोमं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६२॥


विचित्र माल्य वसनं दिव्य चन्दन चर्चितम् ।

विष्णु ब्रह्मादि वन्द्यं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६३॥


कुमारं पितरं देवं स्थितचन्द्रकलानिधिम् ।

ब्रह्म शत्रुं जगन्मित्रं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६४॥


लावण्य मधुराकारं करुणारस वारिधिम् ।

भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६५॥


जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भूमिनायकम् ।

कामदं सर्वदागम्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६६॥


शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणम् ।

ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६७॥


वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रह कारणम् ।

ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६८॥


शशाङ्क धारिणं भर्गं सर्वलोकैक शङ्करम् I

शुद्धं च शाश्वतं नित्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥६९॥


शरणागत दीनार्त परित्राण परायणम् ।

गम्भीरं च वषट्कारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७०॥


भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानसम् I

करणं कारणं जिष्णुं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७१॥


क्षेत्रज्ञं क्षेत्रपालञ्च परार्धैकप्रयोजनम् ।

व्योमकेशं भीमवेषं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७२॥


भवज्ञं करुणोपेतं चोरिष्टं यमनाशनम् ।

हिरण्यगर्भं हेमाङ्गं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७३॥


दक्षं चामुण्ड जनकं मोक्षदं मोक्षनायकम् ।

हिरण्यदं हेमरूपं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७४॥


महाश्मशान निलयं प्रच्छन्नस्फटिकप्रभम् ।

वेदास्यं वेदरूपं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७५॥


स्थिरं धर्मं उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम् I

जगन्निवासं प्रमथम बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७६॥


रुद्राक्ष मालाभरणं रुद्राक्ष प्रिय वत्सलम् ।

रुद्राक्ष भक्त संस्तोभम बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७७॥


फणीन्द्र विलसत्कण्ठं भुजङ्गाभरण प्रियम् I

दक्षाध्वर विनाशं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७८॥


नागेन्द्र विलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतम् ।

मुनिवन्द्यं मुनिश्रेष्ठम बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥७९॥


मृगेन्द्र चर्म वसनं मुनीनामेक जीवनम् ।

सर्वदेवादि पूज्यं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८०॥


निधनेशं धनाधीशं अपमृत्यु विनाशनम् ।

लिङ्गमूर्तिम लिङ्गात्मं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८१॥


भक्त कल्याणदं व्यस्तं वेदवेदान्त संस्तुतम् ।

कल्पकृत्कल्पनाशं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८२॥


घोरपातक दावाग्निं जन्मकर्म विवर्जितम् ।

कपाल माला भरणं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८३॥


मातङ्ग चर्म वसनं विरदम पवित्र धारकम् ।

विष्णुक्रान्तम अनन्तं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८४॥


यज्ञ कर्म फलाध्यक्षं यज्ञ विघ्न विनाशकम् ।

यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८५॥


कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्ट निग्रह कारकम् ।

योगि मानस पूज्यं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८६॥


महोन्नत महाकायं महोदर महाभुजम् ।

महावक्त्रं महावृद्धं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥८७॥


सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीम पराक्रमम् ।

महेश्वरं शिवतरं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् II८८॥


समस्त जगदाधारं समस्त गुण सागरम् ।

सत्यं सत्यगुणोपेतं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥ ८९॥


माघ कृष्ण चतुर्दश्यां पूजार्थं च जगद्गुरोः ।

दुर्लभं सर्वदेवानां बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९०॥


तत्रापि दुर्लभं मन्येत् नभोमासेन्दुवासरे ।

प्रदोष काले पूजायां बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९१॥


तडागम धननिक्षेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयम् ।

कोटिकन्यामहादानं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९२॥


दर्शनं बिल्व वृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।

अघोर पाप संहारं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् II९३॥


तुलसी बिल्व निर्गुण्डी जम्बीरामलकं तथा ।

पञ्चबिल्वमिति ख्यातं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९४॥


अखण्ड बिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नन्दिकेश्वरम् ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यः बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९५॥


सालङ्कृता शतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकम् ।

साम्राज्य पृथ्वीदानं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९६॥


अश्व कोटि दानानि अश्वमेधसहस्रकम् ।

सवत्सधेनु दानानि बिल्वपत्रम शिवार्पणम् II९७॥


चतुर्वेद सहस्राणि भारतादिपुराणकम् ।

साम्राज्य पृथ्वीदानं च बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९८॥


सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकम् ।

तुलाभागं शतावर्तं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥९९॥


अष्टोत्तरशतं बिल्वं योऽर्चयेल्लिङ्गमस्तके ।

अथर्वोक्तं वदेद्यस्तु बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१००॥


काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम् ।

अघोर पाप संहारं बिल्व पत्रम शिवार्पणम् ॥१०१॥


अष्टोत्तर शतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यथा ।

त्रिसन्ध्यं मोक्षमाप्नोति बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०२॥


दन्तिकोटि सहस्राणां भूः हिरण्य सहस्रकम्

सर्वक्रतुमयं पुण्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम्   ॥१०३॥


पुत्र पौत्रादिकं भोगं भुक्त्वा चात्र यथेप्सितम् ।

अन्ते च शिव सायुज्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०४॥


विप्र कोटि सहस्राणां वित्तदानाच्च यत्फलम् ।

तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०५॥


त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वं तव पादाम्बु यः पिबेत्

जीवन्मुक्तो भवेन्नित्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०६॥


अनेक दान फलदं अनन्त सुकृतादिकम् ।

तीर्थयात्राखिलं पुण्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०७॥


त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यान कृतं तव ।

भवनं शाङ्करं नित्यं बिल्वपत्रम शिवार्पणम् ॥१०८॥


क्षणे क्षणे कृतम पापम स्मरणेन विनश्यती ।  

पुस्तकम धारयेद देहि आरोग्यम दुख नाशनम ॥





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