31 जुलाई 2020

भगवती महाकाली सहस्त्राक्षरी मंत्र


भगवती महाकाली सहस्त्राक्षरी मंत्र



ॐ क्रीं  क्रीँ  क्रीँ  ह्रीँ  ह्रीँ  हूं  हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ  ह्रीँ  ह्रीँ  हूं  हूं स्वाहा ।

शुचिजाया, महापिशाचिनी,  दुष्टचित्तनिवारिणी,
क्रीँ कामेश्वरी,  वीँ हं वाराहिके, ह्रीँ महामाये, खं खः क्रोधाधिपे !
श्रीं  महालक्ष्यै ! सर्वहृदय रञ्जनी । वाग्वादिनी विधे त्रिपुरे ।
हंस्त्रिँ  हसकहल ह्रीँ  हस्त्रैँ  ॐ ह्रीँ  क्लीँ  मे  स्वाहा । 

ॐ ॐ ह्रीँ  ईं स्वाहा । 

दक्षिणकालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा ।

खड्गमुण्डधरे, कुरुकुल्ले तारे, ॐ  ह्रीँ  नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन । पच पच ।  मथ मथ ।
फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान मोहय मोहय ।
हयग्रीवे, सिँहवाहिनी, सिँहस्थे, अश्वारुढे, अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून ये मां हिँसतु तान ग्रस ग्रस ।
महानीले, वलाकिनी, नीलपताके, क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे, संक्षोभिणी, उच्छिष्टचाण्डालिके, सर्वजगद वशमानय वशमानय ।
मातंगिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातंगिनी सर्ववशंकरी नमः स्वाहा ।

विस्फारिणी । कपालधरे ।  घोरे । घोरनादिनी । भूर शत्रून् विनाशिनी । उन्मादिनी ।
रोँ  रोँ रोँ  रीँ  ह्रीँ  श्रीँ  हसौः सौँ  वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ कति कति स्वाहा |

काहि काहि कालिके ।
शम्वरघातिनी, कामेश्वरी, कामिके, ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा ।

हृदयाये ॐ ह्रीँ  क्रीँ  मे स्वाहा ।

ठः ठः ठः क्रीँ  ह्रं  ह्रीँ  चामुण्डे हृदय जनाभिअसूनव ग्रस ग्रस दुष्टजनान् ।
अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नतस्तनेविष्टंभकारिणि । विघाधिके ।  श्मशानवासिनी । कलय कलय । विकलय विकलय । कालग्राहिके । सिँहे । दक्षिणकालिके । अनिरुद्दये । ब्रूहि ब्रूहि । जगच्चित्रिरे । चमत्कारिणी । हं कालिके ।  करालिके । घोरे । कह कह । तडागे । तोये । गहने । कानने । शत्रुपक्षे । शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि । अम्बिके । तुभ्यं कल विकलायै । बलप्रमथनायै । योगमार्ग गच्छ गच्छ ।  निदर्शिके । देहिनि । दर्शनं देहि देहि । मर्दिनि महिषमर्दिन्यै । स्वाहा ।

रिपुन्दर्शने द र्शय दर्शय । सिँहपूरप्रवेशिनि । वीरकारिणि । क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ  हूं  हूं ह्रीँ  ह्रीँ फट् स्वाहा ।

शक्तिरुपायै ।  रोँ  वा गणपायै  । रोँ  रोँ  रोँ व्यामोहिनि । यन्त्रनिके । महाकायायै ।  प्रकटवदनायै । लोलजिह्वायै । मुण्डमालिनि । महाकालरसिकायै । नमो नमः ।

ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः ।

शत्रुविग्रहकलहान्त्रिपुरभोगिन्यै । विषज्वालामालिनी । तन्त्रनिके । मेधप्रभे । शवावतंसे । हंसिके । कालि कपालिनि । कुल्ले कुरुकुल्ले । चैतन्यप्रभे प्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ  ह्रीँ  रक्ष रक्ष । ज्वाला । प्रचण्ड । चण्डिके ।  शक्ति । मार्तण्ड ।  भैरवि ।  विप्रचित्तिके । विरोधिनि । आकर्णय आकर्णय । पिशिते । पिशितप्रिये । नमो नमः ।

खः खः खः मर्दय मर्दय । शत्रून् ठः ठः ठः । कालिकायै नमो नमः ।

ब्राम्हयै नमो नमः ।
माहेश्वर्यै नमो नमः ।
कौमार्यै नमो नमः ।
वैष्णव्यै नमो नमः ।
वाराह्यै नमो नमः ।
इन्द्राण्यै नमो नमः ।
चामुण्डायै नमो नमः ।
अपराजितायै नमो नमः ।
नारसिँहिकायै नमो नमः ।

कालि । महाकालिके । अनिरुध्दके । सरस्वति फट् स्वाहा ।

पाहि पाहि ललाटं । भल्लाटनी । अस्त्रीकले । जीववहे । वाचं रक्ष रक्ष । परविद्या क्षोभय क्षोभय । आकर्षय आकर्षय । कट कट । अमुकान मोहय मोहय  महामोहिनिके । चीरसिध्दके । कृष्णरुपिणी । अंजनसिद्धके ।  स्तम्भिनि । मोहिनि । मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।



महाकाली की कृपा प्रदान करता है । नित्य पाठ करें ।
सर्वविध रक्षा के लिए उपयोगी है । 


आप इसका उच्चारण आडिओ मे यहाँ सुन सकते हैं । 
इसे सुनकर उच्चारण करने से धीरे धीरे धीरे गुरुकृपा से आपका उच्चारण स्पष्ट होता जाएगा :-

 

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30 जुलाई 2020

स्वयंसिद्ध महाकाली सर्व रक्षा मन्त्र




:: हुं हुं ह्रीं ह्रीं कालिके घोर दन्ष्ट्रे प्रचन्ड चन्ड नायिके दानवान दारय हन हन शरीरे महाविघ्न छेदय छेदय स्वाहा हुं फट ::


  1. स्वयंसिद्ध मन्त्र है.
  2. तंत्र बाधा की काट , भूत बाधा आदि में लाभ प्रद है .
  3. शमशान या किसी विशेष तांत्रिक क्रिया में रक्षा के लिए उपयोग कर सकते हैं .
  4. १०८ या १००८ की संख्या में जाप करके इसका प्रयोग करें .
  5. इस मन्त्र का जाप करके रक्षा सूत्र बान्ध सकते हैं. 
  6. विभिन्न प्रकार के रक्षा घेरे के निर्माण मे भी सहायक सिद्ध मन्त्र है


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मातंगी साधना




॥ ह्रीं क्लीं हुं मातंग्यै फ़ट स्वाहा ॥


  • मातंगी साधना संपूर्ण गृहस्थ सुख प्रदान करती है.
  • यह साधना जीवन में रस प्रदान करती है.
  • रुद्राक्ष माला से मन्त्र जाप करें.
  • सवा लाख मन्त्र जाप का पुरस्चरण होगा |
उसके बाद 1250 बार

"ह्रीं 
क्लीं हुं मातंग्यै फ़ट स्वाहा" मन्त्र से आहुतियाँ देनी चाहिए |
.
.
साधना में गुरु की आवश्यकता
Y   मंत्र साधना के लिए गुरु धारण करना श्रेष्ट होता है.
Y   साधना से उठने वाली उर्जा को गुरु नियंत्रित और संतुलित करता है, जिससे साधना में जल्दी सफलता मिल जाती है.
Y   गुरु मंत्र का नित्य जाप करते रहना चाहिए. अगर बैठकर ना कर पायें तो चलते फिरते भी आप मन्त्र जाप कर सकते हैं.
Y   रुद्राक्ष या रुद्राक्ष माला धारण करने से आध्यात्मिक अनुकूलता मिलती है .
Y   रुद्राक्ष की माला आसानी से मिल जाती है आप उसी से जाप कर सकते हैं.
Y   गुरु मन्त्र का जाप करने के बाद उस माला को सदैव धारण कर सकते हैं. इस प्रकार आप मंत्र जाप की उर्जा से जुड़े रहेंगे और यह रुद्राक्ष माला एक रक्षा कवच की तरह काम करेगा.
गुरु के बिना साधना
Y   स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
Y   जिन मन्त्रों में 108 से ज्यादा अक्षर हों उनकी साधना बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
Y   शाबर मन्त्र तथा स्वप्न में मिले मन्त्र बिना गुरु के जाप कर सकते हैं .
Y   गुरु के आभाव में स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ करने से पहले अपने इष्ट या भगवान शिव के मंत्र का एक पुरश्चरण यानि १,२५,००० जाप कर लेना चाहिए.इसके अलावा हनुमान चालीसा का नित्य पाठ भी लाभदायक होता है.
Y    
मंत्र साधना करते समय सावधानियां
Y   मन्त्र तथा साधना को गुप्त रखें, ढिंढोरा ना पीटें, बेवजह अपनी साधना की चर्चा करते ना फिरें .
Y   गुरु तथा इष्ट के प्रति अगाध श्रद्धा रखें .
Y   आचार विचार व्यवहार शुद्ध रखें.
Y   बकवास और प्रलाप न करें.
Y   किसी पर गुस्सा न करें.
Y   यथासंभव मौन रहें.अगर सम्भव न हो तो जितना जरुरी हो केवल उतनी बात करें.
Y   ब्रह्मचर्य का पालन करें.विवाहित हों तो साधना काल में बहुत जरुरी होने पर अपनी पत्नी से सम्बन्ध रख सकते हैं.
Y   किसी स्त्री का चाहे वह नौकरानी क्यों न हो, अपमान न करें.
Y   जप और साधना का ढोल पीटते न रहें, इसे यथा संभव गोपनीय रखें.
Y   बेवजह किसी को तकलीफ पहुँचाने के लिए और अनैतिक कार्यों के लिए मन्त्रों का प्रयोग न करें.
Y   ऐसा करने पर परदैविक प्रकोप होता है जो सात पीढ़ियों तक अपना गलत प्रभाव दिखाता है.
Y   इसमें मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म , लगातार गर्भपात, सन्तान ना होना , अल्पायु में मृत्यु या घोर दरिद्रता जैसी जटिलताएं भावी पीढ़ियों को झेलनी पड सकती है |
Y   भूत, प्रेत, जिन्न,पिशाच जैसी साधनाए भूलकर भी ना करें , इन साधनाओं से तात्कालिक आर्थिक लाभ जैसी प्राप्तियां तो हो सकती हैं लेकिन साधक की साधनाएं या शरीर कमजोर होते ही उसे असीमित शारीरिक मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है | ऐसी साधनाएं करने वाला साधक अंततः उसी योनी में चला जाता है |
गुरु और देवता का कभी अपमान न करें.
मंत्र जाप में दिशा, आसन, वस्त्र का महत्व
Y   साधना के लिए नदी तट, शिवमंदिर, देविमंदिर, एकांत कक्ष श्रेष्ट माना गया है .
Y   आसन में काले/लाल कम्बल का आसन सभी साधनाओं के लिए श्रेष्ट माना गया है .
Y   अलग अलग मन्त्र जाप करते समय दिशा, आसन और वस्त्र अलग अलग होते हैं .
Y   इनका अनुपालन करना लाभप्रद होता है .
Y   जाप के दौरान भाव सबसे प्रमुख होता है , जितनी भावना के साथ जाप करेंगे उतना लाभ ज्यादा होगा.
Y   यदि वस्त्र आसन दिशा नियमानुसार ना हो तो भी केवल भावना सही होने पर साधनाएं फल प्रदान करती ही हैं .
Y   नियमानुसार साधना न कर पायें तो जैसा आप कर सकते हैं वैसे ही मंत्र जाप करें , लेकिन साधनाएं करते रहें जो आपको साधनात्मक अनुकूलता के साथ साथ दैवीय कृपा प्रदान करेगा |

29 जुलाई 2020

भैरव प्रयोग



  • सभी प्रकार की तंत्र बाधाओं के शमन मे उपयोगी है । 
  • अमावस्या, कृष्ण पक्ष मे अष्टमी/ त्रयोदशी/चतुर्दशी  या सावन माह की किसी भी रात्रि करें|
  • अपने सामने एक सूखा नारियल , एक कपूर की डली , 11 लौंग 11 इलायची, 1 डली लोबान या धुप रखें |
  • सरसों के तेल का दीपक जलाएं |
  • हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें | नारियल सामने रखें |
  • दक्षिण दिशा कीओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जाप करें |
  • अगले दिन जल प्रवाह करें । 





|| ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रः | ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रः |ख्रां ख्रीं ख्रूं ख्रः|घ्रां घ्रीं घ्रूं घ्र: | म्रां म्रीं म्रूं म्र: | म्रों म्रों म्रों म्रों | क्लों   क्लों क्लों क्लों |श्रों श्रों श्रों श्रों | ज्रों ज्रों  ज्रों ज्रों | हूँ हूँ हूँ हूँ| हूँ हूँ हूँ हूँ | फट | सर्वतो रक्ष रक्ष रक्ष रक्ष भैरव नाथ हूँ फट ||

28 जुलाई 2020

भुवनेश्वरी महाविद्या






॥ ह्रीं ॥
  भुवनेश्वरी महाविद्या समस्त सृष्टि की माता हैं
  हमारे जीवन के लिये आवश्यक अमृत तत्व वे हैं.
  इस मन्त्र का नित्य जाप आपको उर्जावान बनायेगा.
  जिनका पाचन संबंधी शिकायत है उनको लाभ मिलेगा.
  समस्त प्रकार के रोगियों को बल प्रदान करता है |
  मृत्युंजय मन्त्र के समान लाभ दायक है 
  प्रातः काल ४ से ६ बजे तक जाप करें.
  सफ़ेद वस्त्र और आसन होगा.
  दिशा उत्तर या पूर्व .
  ब्रह्मचर्य का पालन करें.
  आचार विचार व्यवहार सात्विक रखें.----
साधना में गुरु की आवश्यकता
ॐ        मंत्र साधना के लिए गुरु धारण करना श्रेष्ट होता है.
ॐ        साधना से उठने वाली उर्जा को गुरु नियंत्रित और संतुलित करता है, जिससे साधना में जल्दी सफलता मिल जाती है.
ॐ        गुरु मंत्र का नित्य जाप करते रहना चाहिए. अगर बैठकर ना कर पायें तो चलते फिरते भी आप मन्त्र जाप कर सकते हैं.
गुरु के बिना साधना
ॐ        स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
ॐ        जिन मन्त्रों में 108 से ज्यादा अक्षर हों उनकी साधना बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
ॐ        शाबर मन्त्र तथा स्वप्न में मिले मन्त्र बिना गुरु के जाप कर सकते हैं .
ॐ        गुरु के आभाव में स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ करने से पहले अपने इष्ट या भगवान शिव के मंत्र का एक पुरश्चरण यानि १,२५,००० जाप कर लेना चाहिए.इसके अलावा हनुमान चालीसा का नित्य पाठ भी लाभदायक होता है.
    
मंत्र साधना करते समय सावधानियां
Y      मन्त्र तथा साधना को गुप्त रखें, ढिंढोरा ना पीटें, बेवजह अपनी साधना की चर्चा करते ना फिरें .
Y      गुरु तथा इष्ट के प्रति अगाध श्रद्धा रखें .
Y      आचार विचार व्यवहार शुद्ध रखें.
Y      बकवास और प्रलाप न करें.
Y      किसी पर गुस्सा न करें.
Y      यथासंभव मौन रहें.अगर सम्भव न हो तो जितना जरुरी हो केवल उतनी बात करें.
Y      ब्रह्मचर्य का पालन करें.विवाहित हों तो साधना काल में बहुत जरुरी होने पर अपनी पत्नी से सम्बन्ध रख सकते हैं.
Y      किसी स्त्री का चाहे वह नौकरानी क्यों न हो, अपमान न करें.
Y      जप और साधना का ढोल पीटते न रहें, इसे यथा संभव गोपनीय रखें.
Y      बेवजह किसी को तकलीफ पहुँचाने के लिए और अनैतिक कार्यों के लिए मन्त्रों का प्रयोग न करें.
Y      ऐसा करने पर परदैविक प्रकोप होता है जो सात पीढ़ियों तक अपना गलत प्रभाव दिखाता है.
Y      इसमें मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म , लगातार गर्भपात, सन्तान ना होना , अल्पायु में मृत्यु या घोर दरिद्रता जैसी जटिलताएं भावी पीढ़ियों को झेलनी पड सकती है |
Y      भूत, प्रेत, जिन्न,पिशाच जैसी साधनाए भूलकर भी ना करें , इन साधनाओं से तात्कालिक आर्थिक लाभ जैसी प्राप्तियां तो हो सकती हैं लेकिन साधक की साधनाएं या शरीर कमजोर होते ही उसे असीमित शारीरिक मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है | ऐसी साधनाएं करने वाला साधक अंततः उसी योनी में चला जाता है |
गुरु और देवता का कभी अपमान न करें.
मंत्र जाप में दिशा, आसन, वस्त्र का महत्व
Y      साधना के लिए नदी तट, शिवमंदिर, देविमंदिर, एकांत कक्ष श्रेष्ट माना गया है .
Y      आसन में काले/लाल कम्बल का आसन सभी साधनाओं के लिए श्रेष्ट माना गया है .
Y      अलग अलग मन्त्र जाप करते समय दिशा, आसन और वस्त्र अलग अलग होते हैं .
Y      इनका अनुपालन करना लाभप्रद होता है .
माला तथा जप संख्या
Y      रुद्राक्ष या रुद्राक्ष माला धारण करने से आध्यात्मिक अनुकूलता मिलती है .
Y      रुद्राक्ष की माला आसानी से मिल जाती अगर अलग से निर्देश न हो तो सभी साधनाओं में रुद्राक्ष माला से मन्त्र जाप कर सकते हैं .
Y      एक साधना के लिए एक माला का उपयोग करें |
Y      सवा लाख मन्त्र जाप का पुरश्चरण होगा |
Y      गुरु मन्त्र का जाप करने के बाद उस माला को सदैव धारण कर सकते हैं. इस प्रकार आप मंत्र जाप की उर्जा से जुड़े रहेंगे और यह रुद्राक्ष माला एक रक्षा कवच की तरह काम करेगा.
सामान्य हवन विधि
Y      जाप पूरा होने के बाद किसी गोल बर्तन, हवनकुंड में हवन अवश्य करें | इससे साधनात्मक रूप से काफी लाभ होता है जो आप स्वयं अनुभव करेंगे |
Y      अग्नि जलाने के लिए माचिस का उपयोग कर सकते हैं | इसके साथ घी में डूबी बत्तियां तथा कपूर रखना चाहिए
Y      जलाते समय “ॐ अग्नये नमः” मन्त्र का कम से काम 7 बार जाप करें | जलना प्रारंभ होने पर इसी मन्त्र में स्वाहा लगाकर घी की 7 आहुतियाँ देनी चाहिए |
Y      बाजार में उपलब्ध हवन सामग्री का उपयोग कर सकते हैं |
Y      हवन में 1250 बार या जितना आपने जाप किया है उसका सौवाँ भाग हवन करें | मन्त्र के पीछे “स्वाहा” लगाकर हवन सामग्री को अग्नि में डालें |
भावना का महत्व
Y      जाप के दौरान भाव सबसे प्रमुख होता है , जितनी भावना के साथ जाप करेंगे उतना लाभ ज्यादा होगा.
Y      यदि वस्त्र आसन दिशा नियमानुसार ना हो तो भी केवल भावना सही होने पर साधनाएं फल प्रदान करती ही हैं .
Y      नियमानुसार साधना न कर पायें तो जैसा आप कर सकते हैं वैसे ही मंत्र जाप करें , लेकिन साधनाएं करते रहें जो आपको साधनात्मक अनुकूलता के साथ साथ दैवीय कृपा प्रदान करेगा |
Y      देवी या देवता माता पिता तुल्य होते हैं उनके सामने शिशुवत जाप करेंगे तो किसी प्रकार का दोष नहीं लगेगा |

गणपति प्रातः स्मरण

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः | 
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः| 
द्वादशैती नामानि पठेद्श्रुणुयादपि | 

विद्यारंभे विवाहे च संग्रामे संकटे तथा विघ्नस्तस्य न जायते ||

27 जुलाई 2020

श्री गणेश अष्टोत्तर शत नाम


श्री गणेश अष्टोत्तर शत नाम
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"गं" गणेश भगवान का बीज मंत्र है । 
गणेश भगवान की मूर्ति या यंत्र को सामने रख लें ।
अगर मूर्ति मिट्टी की है तो उसपर जल न चढ़ाएँ , सामने एक बर्तन रखके उसमे चढ़ाएँ , वरना आपकी मूर्ति गीली हो जाएगी ।  

1) गं विनायकाय नम: 
2) गं विघ्नराजाय नम:
3) गं गौरीपुत्राय नम:
4) गं गणेश्वराय नम:
5) गं स्कंदाग्रजाय नम:
6) गं अव्ययाय नम:
7) गं भूताय नम:
8) गं दक्षाय नम:
9) गं अध्यक्षाय नम:
10) गं द्विजप्रियाय नम:
11) गं अग्निगर्भच्छिदे नम:
12) गं इंद्रश्रीप्रदाय नम:
13) गं वाणीप्रदाय नम:
14) गं अव्ययाय नम:
15) गं सर्वसिद्धिप्रदाय नम:
16) गं शर्वतनयाय नम:
17) गं शर्वरीप्रियाय नम:
18) गं सर्वात्मकाय नम:
19) गं सृष्टिकत्रै नम:
20) गं देवाय नम:
21) गं अनेकार्चिताय नम:
22) गं शिवाय नम:
23) गं शुद्धाय नम:
24) गं बुद्धिप्रियाय नम:
25) गं शांताय नम:
26) गं ब्रह्मचारिणे नम:
27) गं गजाननाय नम:
28) गं द्वैमातुराय नम:
29) गं मुनिस्तुत्याय नम:
30) गं भक्तविघ्नविनाशनाय नम:
31) गं एकदंताय नम:
32) गं चतुर्बाहवे नम:
33)गं चतुराय नम:
34) गं शक्तिसंयुताय नम:
35) गं लंबोदराय नम:
36) गं शूर्पकर्णाय नम:
37) गं हरये नम:
38) गं ब्रह्मविदुत्तमाय नम:
39) गं कालाय नम:
40) गं ग्रहपतये नम:
41) गं कामिने नम:
42) गं सोमसूर्याग्निलोचनाय नम:
43) गं पाशांकुशधराय नम:
44) गं चण्डाय नम:
45) गं गुणातीताय नम:
46) गं निरंजनाय नम:
47) गं अकल्मषाय नम:
48) गं स्वयंसिद्धाय नम:
49) गं सिद्धार्चितपदांबुजाय नम:
50) गं बीजापूरफलासक्ताय नम:
51) गं वरदाय नम:
52) गं शाश्वताय नम:
53) गं कृतिने नम:
54) गं द्विजप्रियाय नम:
55) गं वीतभयाय नम:
56) गं गतिने नम:
57) गं चक्रिणे नम:
58) गं इक्षुचापधृते नम:
59) गं श्रीदाय नम:
60) गं अजाय नम:
61) गं उत्पलकराय नम:
62) गं श्रीपतये नम:
63) गं स्तुतिहर्षिताय नम:
64) गं कुलाद्रिभेत्रे नम:
65) गं जटिलाय नम:
66) गं कलिकल्मषनाशनाय नम:
67) गं चंद्रचूडामणये नम:
68) गं कांताय नम:
69) गं पापहारिणे नम:
70) गं समाहिताय नम:
71) गं आश्रिताय नम:
72) गं श्रीकराय नम:
73) गं सौम्याय नम:
74) गं भक्तवांछितदायकाय नम:
75) गं शांताय नम:
76) गं कैवल्यसुखदाय नम:
77) गं सच्चिदानंदविग्रहाय नम:
78) गं ज्ञानिने नम:
79) गं दयायुताय नम:
80) गं दांताय नम:
81) गं ब्रह्मद्वेषविवर्जिताय नम:
82) गं प्रमत्तदैत्यभयदाय नम:
83) गं श्रीकण्ठाय नम:
84) गं विबुधेश्वराय नम:
85) गं रामार्चिताय नम:
86) गं विधये नम:
87) गं नागराजयज्ञोपवितवते नम:
88) गं स्थूलकण्ठाय नम:
89) गं स्वयंकर्त्रे नम:
90) गं सामघोषप्रियाय नम:
91) गं परस्मै नम:
92) गं स्थूलतुंडाय नम:
93) गं अग्रण्यै नम:
94) गं धीराय नम:
95) गं वागीशाय नम:
96) गं सिद्धिदायकाय नम:
97) गं दूर्वाबिल्वप्रियाय नम:
98) गं अव्यक्तमूर्तये नम:
99) गं अद्भुतमूर्तिमते नम:
100) गं शैलेंद्रतनुजोत्संगखेलनोत्सुकमानसाय नम:
101) गं स्वलावण्यसुधासारजितमन्मथविग्रहाय नम:
102) गं समस्तजगदाधाराय नम:
103) गं मायिने नम:
104) गं मूषकवाहनाय नम:
105) गं हृष्टाय नम:
106) गं तुष्टाय नम:
107) गं प्रसन्नात्मने नम:
108) गं सर्वसिद्धिप्रदायकाय नम:
हर  नमः पर एक आचमनी जल अर्पण करे 
अंत मे श्री गणेश भगवान से गलतियों के लिए क्षमा मांगे ।  

आप इसका उच्चारण आडिओ मे यहाँ सुन सकते हैं । 
इसे सुनकर उच्चारण करने से धीरे धीरे धीरे गुरुकृपा से आपका उच्चारण स्पष्ट होता जाएगा :-

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