नवग्रह शांति के लिए इस श्लोक का रोज11 बार पाठ करें ➖
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी भानु शशि भूमि सुतो बुधश्च
गुरुश्च शुक्रः शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकराः भवन्तु ....
एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी भानु शशि भूमि सुतो बुधश्च
गुरुश्च शुक्रः शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकराः भवन्तु ....
पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा
श्राद्ध पक्ष में यथा सम्भव जाप करें ।
॥ ऊं सर्व पितरेभ्यो, मम सर्व शापं प्रशमय प्रशमय, सर्व दोषान निवारय निवारय, पूर्ण शान्तिम कुरु कुरु नमः ॥
पितृमोक्ष अमावस्या के दिन एक थाली में भोजन सजाकर सामने रखें।
108 बार जाप करें |
सभी ज्ञात अज्ञात पूर्वजों को याद करें , उनसे कृपा मागें |
ॐ शांति कहते हुए तीन बार पानी से थाली के चारों ओर गोल घेरा बनायें।
अपने पितरॊं को याद करके ईस थाली को गाय कॊ खिला दें।
इससे पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा आपकॊ प्राप्त होगी ।
लक्ष्मी प्राप्ति हेतु गणपति साधना
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपीत्थ जम्बू फल चारू भक्षितम ।
उमासुतम शोक विनाशकारणम नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम ।
गज के समान मुख वाले, भूतादि गण जिनकी सेवा करते हैं ऐसे विविध भोज्य पदार्थों के प्रेमी तथा बाधओं को दूर करने वाले देवी जगदम्बा के प्रियपुत्र भगवान गणेश के चरण कमलों को मैं सादर प्रणाम करता हूं ।
कलियुग में फलदायक साधनाओं के विषय में कहा गया है कि:-
‘कलौ चण्डी विनायकौ’
अर्थात कलियुग में चण्डी तथा गणपति साधनायें ज्यादा फलप्रद होंगी।
गणपति साधना को प्रारंभिक तथा अत्यंत लाभप्रद साधनाओं में गिना जाता है। योगिक विचार में मूलाधार चक्र को कुण्डली का प्रारंभ माना जाता है तथा गणपति उसके स्वामी माने जाते हैं। साथ ही शिव शक्ति के पुत्र होने के कारण दोनों की संयुक्त कृपा प्रदान करते हैं।
भगवती लक्ष्मी को चंचला कहा गया है । चंचला अर्थात जो एक स्थान पर ज्यादा देर तक न रह सकती हो । केवल लक्ष्मी का पूजन तथा साधना यद्यपि फलदायक होती है मगर अल्पकालिक होती है । लक्ष्मी के साथ गणपति का पूजन लक्ष्मी को स्थायित्व प्रदान करता है।
आगे की पंक्तियों में भगवान गणपति का एक स्तोत्र प्रस्तुत है। इस स्तोत्र का नित्य पाठ करना लाभप्रद होता है। यद्यपि यह कहना उचित नही होगा कि इस स्तोत्र के पाठ से आप धनवान बन जायेंगें, परंतु धनागमन के नए मार्गों के संबंध में नए विचार उपाय आदि आपके मस्तिष्क में उत्पन्न होंगें, जिनका सही प्रयोग कर आप धन प्राप्ति कर सकेंगें।
गणपति स्तोत्र
ऊं नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्य प्रदायिने ।
दुष्टारिष्ट विनाशाय पराय परात्मने ।
लम्बोदरं महावीर्यं नागयज्ञोपशोभितं ।
अर्धचंद्रधरं देवं विघ्न व्यूह विनाशनम ।
ॐ हृॉं हृीं ह्रूँ हृैं हृौं हृः हेरम्बाय नमः ।
सर्व सिद्धिप्रदो सि त्वं सिद्धिबुद्धिप्रदो भवतः ।
चिंतितार्थ प्रदस्त्वं हि सततं मोदकप्रियः ।
सिंदूरारूण वस्त्रेश्च पूजितो वरदायकः ।
फलश्रुति:-
इदं गणपति स्तोत्रं यः पठेद भक्तिमान नरः ।
तस्य देहं च गेहं च लक्ष्मीर्न मुश्चति ।
इस स्तोत्र का 108 पाठ करें। इससे पहले भगवान गणपति के सामने अपनी इच्ठा या मनोकामना रखें तथा इसका पाठ प्रारंभ करें । भगवान गणपति की कृपा से आपको अपनी इच्ठा की पूर्ति में अवश्य सहायता मिलेगी।
संतान/पुत्र प्राप्ति गणेश स्तोत्र
नमोस्तु गणनाथाय सिद्धि बुद्धि युताय च।
सर्वेश्वर्यप्रदाय देवाय पुत्र वृद्धि प्रदाय च ।
गुरुवराय पुरवे गोप्त्रे गुहयासिताय ते ।
गोप्याय गोपिता शेष भुवनाय चिदात्मने ।
विश्वमूलाय भव्याय विश्वसृष्टिकराय ते ।
नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुंडिने ।
एकदंताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः ।
प्रपन्न जन पालाय प्रणतार्ति विनाशिने ।
शरणम भव देवेश संततिम सुदृढ़म कुरु ।
भविष्यन्ती च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक ।
ते सर्वे तव पूजार्थ निरताः स्युर्वरो मत: ।
पुत्रप्रदमिदम स्तोत्रम सर्वसिध्धी प्रदायकम ॥
विधि :-
भगवान गणेश का ध्यान पूजन करके नित्य क्षमतानुसार 1,3,5,11 बार इस स्तोत्र का पाठ करें तो संतान/पुत्र प्राप्ति मे आने वाले विघ्नों को विघ्नकर्ता महागणपती हटाकर अनुकूलता प्रदान करते हैं .....
श्री गणेश अष्टोत्तर शत नाम
अष्टोत्तर शतनाम का मतलब होता है, गणेश भगवान के 108 नाम के साथ उनका प्रणाम करते हुए पूजन करना जो कि सरल है और हर कोई कर सकता है ।
आप इन नाम का उच्चारण करने के बाद हर बार नम: बोलते समय अपनी श्रद्धा अनुसार
फूल,
चावल के दाने,
अष्टगंध,
दूर्वा ,
चंदन या जो आपकी श्रद्धा हो वह चढ़ा सकते हैं ।
इस प्रकार से बेहद सरलता से आप गणेश भगवान का पूजन संपन्न कर पाएंगे ।
1 गं विनायकाय नम: ॥
2 गं द्विजप्रियाय नम: ॥
3 गं शैलेंद्र तनुजोत्संग खेलनोत्सुक मानसाय नम: ॥
4 गं स्वलावण्य सुधा सार जित मन्मथ विग्रहाय नम: ॥
5 गं समस्तजगदाधाराय नम: ॥
6 गं मायिने नम: ॥
7 गं मूषकवाहनाय नम: ॥
8 गं हृष्टाय नम: ॥
9 गं तुष्टाय नम: ॥
10 गं प्रसन्नात्मने नम: ॥
11 गं सर्व सिद्धि प्रदायकाय नम: ॥
12 गं अग्निगर्भच्छिदे नम: ॥
13 गं इंद्रश्रीप्रदाय नम: ॥
14 गं वाणीप्रदाय नम: ॥
15 गं अव्ययाय नम: ॥
16 गं सिद्धिरूपाय नम: ॥
17 गं शर्वतनयाय नम: ॥
18 गं शर्वरीप्रियाय नम: ॥
19 गं सर्वात्मकाय नम: ॥
20 गं सृष्टिकत्रै नम: ॥
21 गं विघ्नराजाय नम: ॥
22 गं देवाय नम: ॥
23 गं अनेकार्चिताय नम: ॥
24 गं शिवाय नम: ॥
25 गं शुद्धाय नम: ॥
26 गं बुद्धिप्रियाय नम: ॥
27 गं शांताय नम: ॥
28 गं ब्रह्मचारिणे नम: ॥
29 गं गजाननाय नम: ॥
30 गं द्वैमातुराय नम: ॥
31 गं मुनिस्तुत्याय नम: ॥
32 गं गौरीपुत्राय नम: ॥
33 गं भक्त विघ्न विनाशनाय नम: ॥
34 गं एकदंताय नम: ॥
35 गं चतुर्बाहवे नम: ॥
36 गं चतुराय नम: ॥
37 गं शक्ति संयुक्ताय नम: ॥
38 गं लंबोदराय नम: ॥
39 गं शूर्पकर्णाय नम: ॥
40 गं हस्त्ये नम: ॥
41 गं ब्रह्मविदुत्तमाय नम: ॥
42 गं कालाय नम: ॥
43 गं गणेश्वराय नम: ॥
44 गं ग्रहपतये नम: ॥
45 गं कामिने नम: ॥
46 गं सोम सूर्याग्नि लोचनाय नम: ॥
47 गं पाशांकुश धराय नम: ॥
48 गं चण्डाय नम: ॥
49 गं गुणातीताय नम: ॥
50 गं निरंजनाय नम: ॥
51 गं अकल्मषाय नम: ॥
52 गं स्वयं सिद्धाय नम: ॥
53 गं सिद्धार्चित पदांबुजाय नम: ॥
54 गं स्कंदाग्रजाय नम: ॥
55 गं बीजापूर फलासक्ताय नम: ॥
56 गं वरदाय नम: ॥
57 गं शाश्वताय नम: ॥
58 गं कृतिने नम: ॥
59 गं सर्व प्रियाय नम: ॥
60 गं वीतभयाय नम: ॥
61 गं गतिने नम: ॥
62 गं चक्रिणे नम: ॥
63 गं इक्षु चाप धृते नम: ॥
64 गं श्री प्रदाय नम: ॥
65 गं अव्यक्ताय नम: ॥
66 गं अजाय नम: ॥
67 गं उत्पल कराय नम: ॥
68 गं श्री पतये नम: ॥
69 गं स्तुति हर्षिताय नम: ॥
70 गं कुलाद्रिभेत्रे नम: ॥
71 गं जटिलाय नम: ॥
72 गं कलि कल्मष नाशनाय नम: ॥
73 गं चंद्रचूडामणये नम: ॥
74 गं कांताय नम: ॥
75 गं पापहारिणे नम: ॥
76 गं भूताय नम: ॥
77 गं समाहिताय नम: ॥
78 गं आश्रिताय नम: ॥
79 गं श्रीकराय नम: ॥
80 गं सौम्याय नम: ॥
81 गं भक्त वांछित दायकाय नम: ॥
82 गं शांतमानसाय नम: ॥
83 गं कैवल्य सुखदाय नम: ॥
84 गं सच्चिदानंद विग्रहाय नम: ॥
85 गं ज्ञानिने नम: ॥
86 गं दयायुताय नम: ॥
87 गं दक्षाय नम: ॥
88 गं दांताय नम: ॥
89 गं ब्रह्मद्वेष विवर्जिताय नम: ॥
90 गं प्रमत्त दैत्य भयदाय नम: ॥
91 गं श्रीकण्ठाय नम: ॥
92 गं विबुधेश्वराय नम: ॥
93 गं रामार्चिताय नम: ॥
94 गं विधये नम: ॥
95 गं नागराज यज्ञोपवितवते नम: ॥
96 गं स्थूलकण्ठाय नम: ॥
97 गं स्वयंकर्त्रे नम: ॥
98 गं अध्यक्षाय नम: ॥
99 गं साम घोष प्रियाय नम: ॥
100 गं परस्मै नम: ॥
101 गं स्थूल तुंडाय नम: ॥
102 गं अग्रण्यै नम: ॥
103 गं धीराय नम: ॥
104 गं वागीशाय नम: ॥
105 गं सिद्धि दायकाय नम: ॥
106 गं दूर्वा बिल्व प्रियाय नम: ॥
107 गं अव्यक्त मूर्तये नम: ॥
108 गं अद्भुत मूर्ति मते नम: ॥
अंत में हाथ जोड़कर प्रणाम करें और दोनों कान पकड़कर किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए भगवान गणेश से अपने इच्छित मनोकामना को पूर्ण करने की याचिका करें ।
लघु गणेश पूजन
यह एक छोटा गणेश भगवान का पूजन है जिसे आप लगभग 10 मिनट मे सम्पन्न कर सकते हैं
पहले गुरु स्मरण ,गणेश भैरव महालक्ष्मी स्मरण करे ..
ॐ गुं गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ भ्रम भैरवाय नमः
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः
अब आप 4 बार आचमन करे दाए हाथ में पानी लेकर पिए
गं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं शिव तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
अब आप घंटा नाद करे और उसे पुष्प अक्षत अर्पण करे
घंटा देवताभ्यो नमः
अब आप जिस आसन पर बैठे है उस पर पुष्प अक्षत अर्पण करे
आसन देवताभ्यो नमः
अब आप दीपपूजन करे उन्हें प्रणाम करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे
दीप देवताभ्यो नमः
अब आप कलश का पूजन करे ..उसमेगंध ,अक्षत ,पुष्प ,तुलसी,इत्र ,कपूर डाले ..उसे तिलक करे .
कलश देवताभ्यो नमः
अब आप अपने आप को तिलक करे
फिर संक्षिप्त गुरु पुजन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: ।
ॐ परम गुरुभ्यो नम: ।
ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम: ।
उसके बाद गणपति का ध्यान करे
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येशु सर्वदा
उनका आह्वान करें अर्थात बुलाएं
श्री महागणपति आवाहयामि
मम पूजन स्थाने रिद्धि सिद्धि सहित शुभ लाभ सहित स्थापयामि नमः
उनका स्वागत करें , फूल आदि चढ़ाएं
त्वां चरणे गन्धाक्षत पुष्पं समर्पयामि ।
पंचोपचार पूजन करें
ॐ गं " लं" पृथ्वी तत्वात्मकं गंधं समर्पयामि ।
कुमकुम,चन्दन अष्टगंध चढ़ाएँ ।
ॐ गं " हं" आकाश तत्वात्मकं पुष्पम समर्पयामि ।
फूल चढ़ाएँ ।
ॐ गं " यं " वायु तत्वात्मकं धूपं समर्पयामि ।
धूप या अगरबत्ती दिखाएँ ।
ॐ गं " रं" अग्नी तत्वात्मकं दीपं समर्पयामि ।
दीपक दिखाएँ ।
ॐ गं " वं " जल तत्वात्मकं नैवेद्यं समर्पयामि ।
प्रसाद चढ़ाएँ ।
अब गणेशजी को अर्घ्य प्रदान करे, एक चम्मच जल चढ़ाएं
एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात
भगवान गणेश जी के 16 नाम से दूर्वा या पुष्प अक्षत या जल अर्पण करे
1. ॐ गं सुमुखाय नम: ।
2. ॐ गं एकदंताय नमः।
3. ॐ गं कपिलाय नमः।
4. ॐ गं गजकर्णकाय नमः।
5. ॐ गं लंबोदराय नमः।
6. ॐ गं विकटाय नम: ।
7. ॐ गं विघ्नराजाय नमः।
8. ॐ गं गणाधिपाय नम: ।
9. ॐ गं धूम्रकेतवे नम : ।
10 . ॐ गं गणाध्यक्षाय नमः।
11. ॐ गं भालचंद्राय नमः।
12. ॐ गं गजाननाय नम: ।
13. ॐ गं वक्रतुंडाय नमः।
14. ॐ गं शूर्पकर्णाय नमः।
15. ॐ गं हेरंबाय नमः।
16. ॐ गं स्कंदपूर्वजाय नमः।
अब एक आचमनी जल लेकर पूजा स्थान पर छोड़े
अनेन महागणपति षोडश नाम पूजनेन श्री भगवान महागणपति प्रीयन्तां न मम .
हाथ जोड़ कर भगवान गणेश जी से प्रार्थना करे
भगवती महाकाली सहस्त्राक्षरी मंत्र
ॐ क्रीं क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं स्वाहा ।
शुचिजाया, महापिशाचिनी, दुष्टचित्तनिवारिणी,
क्रीँ कामेश्वरी, वीँ हं वाराहिके, ह्रीँ महामाये, खं खः क्रोधाधिपे !
श्रीं महालक्ष्म्ये ! सर्वहृदय रञ्जनी । वाग्वादिनी विधे त्रिपुरे ।
हंस्त्रिँ हसकहल ह्रीँ हस्त्रैँ ॐ ह्रीँ क्लीँ मे स्वाहा ।
ॐ ॐ ह्रीँ ईं स्वाहा ।
दक्षिणकालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा ।
खड्गमुण्डधरे, कुरुकुल्ले तारे, ॐ ह्रीँ नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन । पच पच । मथ मथ ।
फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान मोहय मोहय ।
हयग्रीवे, सिँहवाहिनी, सिँहस्थे, अश्वारुढे, अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून ये मां हिँसतु तान ग्रस ग्रस ।
महानीले, वलाकिनी, नीलपताके, क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे, संक्षोभिणी, उच्छिष्टचाण्डालिके,
सर्वजगद वशमानय वशमानय ।
मातंगिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातंगिनी सर्ववशंकरी नमः स्वाहा ।
विस्फारिणी । कपालधरे । घोरे । घोरनादिनी । भूर शत्रून् विनाशिनी । उन्मादिनी ।
रोँ रोँ रोँ रीँ ह्रीँ श्रीँ हसौः सौँ वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ क्रीँ क्रीँ कति कति स्वाहा |
काहि काहि कालिके ।
शम्वरघातिनी, कामेश्वरी, कामिके, ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा ।
हृदयाये ॐ ह्रीँ क्रीँ मे स्वाहा ।
ठः ठः ठः क्रीँ ह्रं ह्रीँ चामुण्डे हृदय जनाभिअसूनव ग्रस ग्रस दुष्टजनान् ।
अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नतस्तनेविष्टंभकारिणि । विघाधिके । श्मशानवासिनी । कलय कलय । विकलय विकलय । कालग्राहिके । सिँहे । दक्षिणकालिके । अनिरुद्दये । ब्रूहि ब्रूहि । जगच्चित्रिरे । चमत्कारिणी । हं कालिके । करालिके । घोरे । कह कह । तडागे । तोये । गहने । कानने । शत्रुपक्षे । शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि । अम्बिके । तुभ्यं कल विकलायै । बलप्रमथनायै । योगमार्ग गच्छ गच्छ । निदर्शिके । देहिनि । दर्शनं देहि देहि । मर्दिनि महिषमर्दिन्यै । स्वाहा ।
रिपुन्दर्शने द र्शय दर्शय । सिँहपूरप्रवेशिनि । वीरकारिणि । क्रीँ क्रीँ क्रीँ हूं हूं ह्रीँ ह्रीँ फट् स्वाहा ।
शक्तिरुपायै । रोँ वा गणपायै । रोँ रोँ रोँ व्यामोहिनि । यन्त्रनिके । महाकायायै । प्रकटवदनायै । लोलजिह्वायै । मुण्डमालिनि । महाकालरसिकायै । नमो नमः ।
ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः ।
शत्रुविग्रहकलहान्त्रिपुरभोगिन्यै । विषज्वालामालिनी । तन्त्रनिके । मेधप्रभे । शवावतंसे । हंसिके । कालि कपालिनि । कुल्ले कुरुकुल्ले । चैतन्यप्रभे प्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ ह्रीँ रक्ष रक्ष । ज्वाला । प्रचण्ड । चण्डिके । शक्ति । मार्तण्ड । भैरवि । विप्रचित्तिके । विरोधिनि । आकर्णय आकर्णय । पिशिते । पिशितप्रिये । नमो नमः ।
खः खः खः मर्दय मर्दय । शत्रून् ठः ठः ठः । कालिकायै नमो नमः ।
ब्राम्हयै नमो नमः ।
माहेश्वर्यै नमो नमः ।
कौमार्यै नमो नमः ।
वैष्णव्यै नमो नमः ।
वाराह्यै नमो नमः ।
इन्द्राण्यै नमो नमः ।
चामुण्डायै नमो नमः ।
अपराजितायै नमो नमः ।
नारसिँहिकायै नमो नमः ।
कालि । महाकालिके । अनिरुध्दके । सरस्वति फट् स्वाहा ।
पाहि पाहि ललाटं । भल्लाटनी । अस्त्रीकले । जीववहे । वाचं रक्ष रक्ष । परविद्या क्षोभय क्षोभय । आकर्षय आकर्षय । कट कट । अमुकान मोहय मोहय महामोहिनिके । चीरसिध्दके । कृष्णरुपिणी । अंजनसिद्धके । स्तम्भिनि । मोहिनि । मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।