मन्त्र तथा साधनाएं
एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
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17 मार्च 2026
निखिलेश्वरानंद स्तवन
22 फ़रवरी 2026
शूकर दंत : तांत्रिक अभिचार और वशीकरण कर्म की काट
शूकर दंत : तांत्रिक अभिचार और वशीकरण कर्म की काट
तंत्र शास्त्र और लोक मान्यताओं में शूकर दंत (सूअर के दांत) को सभी प्रकार के अभिचार/वशीकरण क्रियाओं की एक अत्यंत शक्तिशाली 'काट' के रूप में देखा जाता है।
विशेष रूप से इस्लामिक तंत्र से की गयी क्रियाओं का प्रभाव इससे नष्ट हो जाता है । संभवतः इसका प्रमुख कारण यह है कि इस्लामिक मान्यताओं में सूअर को 'नजिस' (अपवित्र) माना गया है। तंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत 'विषस्य विषमौषधम्' (अर्थात - जहर ही जहर की दवा है) पर काम करता है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि जिस ऊर्जा या शक्ति का आधार विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं पर टिका हो, वह उस वस्तु के संपर्क में आते ही अपनी शक्ति खो देती है जिसे उस धर्म में वर्जित माना गया है। इसी कारण, कई तांत्रिक इसे 'मुस्लिम तंत्र' या 'जिन्नात' आदि के प्रभावों को निष्क्रिय करने के लिए एक अचूक अस्त्र मानते हैं।
शूकर दंत को भगवान वराह (विष्णु के अवतार) का प्रतीक माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। इसलिए यह किसी भी प्रकार के 'अभिचार कर्म' को वापस पलटने की क्षमता रखता है।
साधना विधि :-
शूकर दंत को एक स्टील के गहरे बर्तन मे अपने सामने रख लें । बर्तन इतना बड़ा हो कि लगभग आधा लीटर पानी आ जाये ।
भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का ध्यान करें ।.
वाराह स्तुति
नमस्ते देवदेवाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वताय जयाय च ।।
अर्थ - देवों के देव, ब्रह्मस्वरूप, परमेष्ठी (परम पद में स्थित रहने वाले) पुराण पुरुष, शाश्वत और जयस्वरूप, आपके लिए नमस्कार है।
नमः स्वयंभुवे तुभ्यं स्त्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने ।
नमो हिरण्यगर्भाय वेधसे परमात्मने ।।
अर्थ - स्वयंभू, सृष्टि रचयिता और सर्वार्थ को जानने वाले आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा और परमात्मा को नमस्कार है।
नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये ।
नारायणाय देवाय देवानां हितकारिणे ।।
अर्थ - वासुदेव, विष्णु, विश्वयोनि, नारायण, देवों के हितकारी देवरूप के लिए नमस्कार है।
नमोऽस्तु ते चतुर्वक्त्रे शार्ङ्गचक्रासिधारिणे ।
सर्वभूतात्मभूताय कूटस्थाय नमो नमः ।।
अर्थ - चतुर्मुख, शार्ङ्ग, चक्र तथा असि धारण करने वाले आपको नमस्कार है। समस्तभूतों के आत्मस्वरूप तथा कूटस्थ को नमस्कार है।
नमो वेदरहस्याय नमस्ते वेदयोनये ।
नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे ।।
अर्थ - वेदों के रहस्यरूप के लिए नमस्कार है। वेदयोनि को नमस्कार है। बुद्ध और शुद्ध को नमस्कार है। ज्ञानरूपी के लिए नमस्कार है।
नमोऽस्त्वानन्दरूपाय साक्षिणे जगतां नमः ।
अनन्तायाप्रमेयाय कार्याय करणाय च ।।
अर्थ - आनन्दरूप और जगत् के साक्षीरूप को नमस्कार है। अनन्त, अप्रमेय, कार्य तथा कारणरूप को नमस्कार है।
नमस्ते पञ्चभूताय पञ्चभूतात्मने नमः ।
नमो मूलप्रकृतये मायारूपाय ते नमः ।।
अर्थ - पञ्चभूतरूप आपको नमस्कार। पञ्चभूतात्मा को, मूलप्रकृतिरूप मायारूप आपको नमस्कार है।
नमोऽस्तु ते वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे ।
नमो योगाधिगम्याय नमः सकर्षणाय ते ।।
अर्थ - वराह रूपधारी को नमस्कार है। मत्स्यरूपी को नमस्कार है। योग के द्वारा ही जानने योग्य को नमस्कार है तथा संकर्षण! आपको नमस्कार है।
नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे ।
नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभागिने ।।
अर्थ - त्रिमूर्ति के लिए नमस्कार है। दिव्य तेज वाले विधामा, सिद्ध, पूज्य और तीनों गुणों का विभाग करने वाले आपको नमस्कार है।
तमोऽस्त्वादित्यवर्णाय नमस्ते पद्मयोनये ।
नमोऽमूर्त्ताय मूर्ताय माधवाय नमो नमः ।।
अर्थ - आदित्यरूप को नमस्कार है। पद्मयोनि को नमस्कार है। अमूर्त, मूर्त तथा माधव को नमस्कार है।
त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव लयमेष्यति ।
पालयैतज्जगत् सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः ।।
अर्थ - आपने ही अखिल जगत् को सृष्टि की है। आप में ही सकल विश्व स्थित है। आप इस सम्पूर्ण जगत् का पालन करें। आप ही रक्षक एवं शरणागति हैं।
वराह स्तुति करके प्रभु को प्रणाम करके प्रार्थना कर लेंगे की उनकी रक्षाकारक शक्ति इस शूकर दंत मे समाहित होकर रक्षा करें ।.
उसके बाद इस मंत्र का 1008 बार जाप करें ।
॥ ॐ वज्र वाराह्ये नमः ॥
हर बार नमः के साथ उसके ऊपर एक चम्मच जल डालते जाएँगे । इस प्रकार से आपका पानी अभिमंत्रित हो जाएगा ।
जब पूरा हो जाये तो उस शूकर दंत सहित उस पानी को बोतल मे डालकर रख लें ।
पानी को प्रयोग करना है । खतम हो जाये तो इसी प्रयोग को उसी शूकर दंत पर पुनः करके फिर अभिमंत्रित पानी बना सकते हैं ।
प्रयोग विधि :-
1) अगर किसी के ऊपर वशीकरण या तांत्रिक प्रयोग होने का शक हो तो इस जल की कुछ बूंदें उसे पिला दें । ऐसा तीन दिनों तक करें ।. प्रभाव दिखाई देने लगेगा ।
2) घर मे किसी क्रिया का अभास हो तो इसी जल को पूरे घर मे छिड़क सकते हैं ।
17 फ़रवरी 2026
सूर्यग्रहण विशेष - तारा शाबर मंत्र
- रात्री काल मे जाप करें । ग्रहण काल मे जाप करने से विशेष लाभदायक है ।
- अपनी क्षमतानुसार 1,11,21,51,108 बार ।
- व्यापार और आर्थिक समृद्धि के लिए लाभदायक ।
- जप काल मे किसी स्त्री का अपमान न करें ।
सूर्यग्रहण विशेष - तंत्र रक्षा नारियल
सूर्यग्रहण विशेष - तंत्र रक्षा नारियल
सूर्यग्रहण के अवसर पर अपने घर मे गृह शांति और रक्षा के लिए एक विधि प्रस्तुत है जिसके द्वारा आप अपने घर पर पूजन करके नारियल बाँध सकते हैं.
आवश्यक सामग्री :-
लाल कपडा सवा मीटर
नारियल
सामान्य पूजन सामग्री
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यदि आर्थिक रूप से सक्षम हों तो इसके साथ रुद्राक्ष/ गोरोचन/केसर भी डाल सकते हैं.
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वस्त्र/आसन लाल रंग का हो तो पहन लें यदि न हो तो जो हो उसे पहन लें.
सबसे पहले शुद्ध होकर आसन पर बैठ जाएँ. हाथ में जल लेकर कहें " मै [अपना नाम ] अपने घर की रक्षा और शांति के लिए यह पूजन कर रहा हूँ मुझपर कृपा करें और मेरा मनोरथ सिद्ध करें."
इतना बोलकर हाथ में रखा जल जमीन पर छोड़ दें. इसे संकल्प कहते हैं.
नारियल पर मौली धागा [अपने हाथ से नापकर तीन हाथ लम्बा तोड़ लें.] लपेट लें.
लपेटते समय निम्नलिखित मंत्र का जाप करें." ॐ श्री विष्णवे नमः"
अब अपने सामने लाल कपडे पर नारियल रख दें. उसका पूजन करें.
लोबान का धुप या अगरबत्ती जलाएं .
नारियल के सामने निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें ।
"ॐ नमो आदेश गुरून को इश्वर वाचा अजरी बजरी बाडा बज्जरी मैं बज्जरी को बाँधा, दशो दुवार छवा और के ढालों तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे, पहली चौकी गणपति दूजी चौकी में भैरों, तीजी चौकी में हनुमंत,चौथी चौकी देत रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देव जी शब्द सांचा पिंड कांचा फुरो मंत्र इश्वरी वाचा"
अब इस नारियल को अन्य पूजन सामग्री के साथ लाल कपडे में लपेट ले. आपका रक्षा नारियल तय्यार है. इसे आप दशहरा, दीपावली, पूर्णिमा, अमावस्या या अपनी सुविधानुसार किसी भी दिन घर की छत में हुक हो तो उसपर बांधकर लटका दें. यदि न हो तो पूजा स्थान में रख लें. नित्य पूजन के समय इसे भी अगरबत्ती दिखाएँ.
धनिष्ठा नक्षत्र का सूर्य ग्रहण : 17 फरवरी 2026 : समय
इस बार का सूर्यग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा । लेकिन हर खगोलीय घटना की तरह ही इसका प्रभाव हमारी पूरी पृथ्वी पर पड़ेगा ।
इसका भारतीय समय इस प्रकार है:
ग्रहण का प्रारंभ - दोपहर 03:26 बजे
मध्यम/चरम अवस्था - शाम 05:42 बजे ।
ग्रहण का समापन - रात 07:57 बजे
इस अवसर पर विशेष भाग्योदय साधना का विशेष महत्व होता है ।
अगर पाठक चाहें तो तो गुरुमाता डॉ साधना सिंह जी द्वारा फोटो के माध्यम से दी जा रही "भाग्योदय दीक्षा पूजन" मे भाग ले सकते हैं । यह ग्रहण धनिष्ठा नक्षत्र मे लग रहा है इसलिए धनिष्ठा नक्षत्र मे जन्मे जातक के लिए यह भाग्योदय दीक्षा विशेष लाभप्रद रहेगी ।
संपर्क :-
श्री प्रशांत पांडे
8800458271
14 फ़रवरी 2026
मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं
महामृत्युंजय स्तोत्र
मार्कण्डेय मुनि द्वारा वर्णित “महामृत्युंजय स्तोत्र” मृत्यु के भय को मिटाने वाला स्तोत्र है ।
इसका आप नित्य पाठ कर सकते हैं ।
ॐ रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकंठमुमापतिम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १ ॥
नीलकंठं कालमूर्तिं कालज्ञं कालनाशनम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ २ ॥
नीलकंठं विरूपाक्षं निर्मलं निलयप्रदम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ३ ॥
वामदॆवं महादॆवं लॊकनाथं जगद्गुरुम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ४ ॥
दॆवदॆवं जगन्नाथं दॆवॆशं वृषभध्वजम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ५ ॥
गंगाधरं महादॆवं सर्पाभरणभूषितम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ६ ॥
त्र्यक्षं चतुर्भुजं शांतं जटामुकुटधारणम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ७ ॥
भस्मॊद्धूलितसर्वांगं नागाभरणभूषितम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ८ ॥
अनंतमव्ययं शांतं अक्षमालाधरं हरम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ९ ॥
आनंदं परमं नित्यं कैवल्यपददायिनम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १० ॥
अर्धनारीश्वरं दॆवं पार्वतीप्राणनायकम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ११ ॥
प्रलयस्थितिकर्तारं आदिकर्तारमीश्वरम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १२ ॥
व्यॊमकॆशं विरूपाक्षं चंद्रार्द्ध कृतशॆखरम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १३ ॥
गंगाधरं शशिधरं शंकरं शूलपाणिनम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १४ ॥
अनाथं परमानंदं कैवल्यपददायिनम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १५ ॥
स्वर्गापवर्ग दातारं सृष्टिस्थित्यांतकारिणम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १६ ॥
कल्पायुर्द्दॆहि मॆ पुण्यं यावदायुररॊगताम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १७ ॥
शिवॆशानां महादॆवं वामदॆवं सदाशिवम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १८ ॥
उत्पत्ति स्थितिसंहार कर्तारमीश्वरं गुरुम् ।
नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १९ ॥
फलश्रुति
मार्कंडॆय कृतं स्तॊत्रं य: पठॆत् शिवसन्निधौ ।
तस्य मृत्युभयं नास्ति न अग्निचॊरभयं क्वचित् ॥ २० ॥
शतावृतं प्रकर्तव्यं संकटॆ कष्टनाशनम् ।
शुचिर्भूत्वा पठॆत् स्तॊत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २१ ॥
मृत्युंजय महादॆव त्राहि मां शरणागतम् ।
जन्ममृत्यु जरारॊगै: पीडितं कर्मबंधनै: ॥ २२ ॥
तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्व च्चित्तॊऽहं सदा मृड ।
इति विज्ञाप्य दॆवॆशं त्र्यंबकाख्यममं जपॆत् ॥ २३ ॥
नम: शिवाय सांबाय हरयॆ परमात्मनॆ ।
प्रणतक्लॆशनाशाय यॊगिनां पतयॆ नम: ॥ २४ ॥
॥ इति श्री मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं संपूर्णम् ॥
रुद्राष्टकम
रुद्राष्टकम
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्॥
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥
चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम्।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्।
त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥
कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।
न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्।
जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥
रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥
13 फ़रवरी 2026
भगवान् शिव का विविध वस्तुओं से अभिषेक : सरल विधि
भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय मानी जाने वाली क्रिया है ‘अभिषेक’. अभिषेक का शाब्दिक तात्पर्य होता है श्रृंगार करना तथा शिवपूजन के संदर्भ में इसका तात्पर्य होता है किसी पदार्थ से शिवलिंग को पूर्णतः आच्ठादित कर देना. समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ गया. उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा प्रारंभ हुयी. जो आज भी चली आ रही है.
शिव पूजन में सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति शिवलिंग पर जल या दूध चढाता है. शिवलिंग पर इस प्रकार द्रवों का अभिषेक ‘धारा’ कहलाता है. जल तथा दूध की धारा भगवान शिव को अत्यंत ही प्रिय है. शिवलिंग को स्नान कराने के विषय में कहा गया है कि :-
पंचामृतेन वा गंगोदकेन वा अभावे गोक्षीर युक्त कूपोदकेन च कारयेत
अर्थात पंचामृत से या फिर गंगा जल से भगवान शिव को धारा का अर्पण किया जाना चाहिये इन दोनों के अभाव में गाय के दूध को कूंए के जल के साथ मिश्रित कर के स्नान करवाना चाहिये.
हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक पूजन क्रिया को एक विशिष्ठ मंत्र के साथ करने की व्यवस्था है, इससे पूजन का महत्व कई गुना बढ जाता है. शिवलिंग पर अभिषेक या धारा चढाने के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है वह हैः-
।ऊं हृं हृं जूं सः पशुपतये नमः ।
। ऊं नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।
इन मंत्रों का सौ बार जाप करके जल चढाना शतधारा तथा एक हजार बार जाप करके जल चढाना सहस्रधारा कहलाता है.
जलधारा चढाने के लिए विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अलावा आप चाहें तो भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हें. पंचाक्षरी मंत्र का तात्पर्य है ‘ ऊं नमः शिवाय ’ मंत्र .
विविध कार्यों के लिए विविध सामग्रियों या द्रव्यों की धाराओं का शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है. तंत्र में सकाम अर्थात किसी कामना की पूर्ति की इच्ठा के साथ पूजन के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग करने का प्रावधान रखा गया है. इनमें से कुछ का वर्णन आगे प्रस्तुत हैः-
जल की धारा सर्वसुख प्रदायक होती है.
घी की सहस्रधारा से वंश का विस्तार होता है.
दूध की धारा गृहकलह की शांति के लिए देना चाहिए.
दूध में शक्कर मिलाकर धारा देने से बुद्धि का विकास होता है.
गंगाजल का अभिषेक पुत्रप्रदायक माना गया है.
सरसों के तेल की धारा से शत्रु का विनाश होता है.
सुगंधित द्रव्यों यथा इत्र, सुगंधित तेल की धारा से भोगों की प्राप्ति होती है.
इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैंः-
सहस्राभिषेकः-(एक हजार बार चढ़ाना)
एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है.
एक हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है.
एक हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है.
एक हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है.
एक हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति व विष्णुकृपा प्राप्त होती है.
एक हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है.
एक हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है.
लक्षाभिषेकः-
एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है.
एक लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.
एक लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.
एक लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.
एक लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है.
एक लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है.
एक लाख तुलसीदल चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.
एक लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है.
शिवपूजन में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-
पूजन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर करें.
माता पार्वती का पूजन अनिवार्य रुप से करना चाहिये अन्यथा पूजन अधूरा रह जायेगा. इसके लिए बहुत लम्बा विधान करने की आवश्यकता नहीं है . महामाया को प्रेम और श्रद्धा से प्रणाम कर लेंगे तो भी पर्याप्त है .
रुद्राक्ष की माला हो तो धारण करें।भस्म से तीन आडी लकीरों वाला तिलक लगाकर बैठें.
शिवलिंग पर चढाया हुआ प्रसाद ग्रहण नही किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं.
12 फ़रवरी 2026
शिव मानस पूजा स्तोत्र
हमारी पूजन पद्धति में एक ऐसी विधि भी है जिसके तहत आप बिना किसी सामग्री के भी पूजन कर सकते हैं ।
इसे मानसिक पूजन कहते हैं ।.
मानसिक पूजन में जिन जिन सामग्रियों को चढ़ाना होता है उसके विषय में हम मानसिक रूप से कल्पना करते हैं कि हमने उन चीजों को अपने इष्ट देवता को समर्पित किया है । उदाहरण के लिए अगर आप उनके चरणों में जल समर्पित कर रहे हैं तो मन ही मन ऐसी भावना करेंगे कि वह आपके सामने साक्षात उपस्थित हैं और आप अपने हाथों से उनके चरणों में जल चढ़ा रहे हैं ।
इसी प्रकार से पुष्प धूप तथा अन्य सामग्रियों को भी मानसिक रूप से चढ़ाया जाता है अर्थात मन में उसके बिंब को साकार कर के अपने इष्ट को समर्पित किया जाता है ।
इसी प्रकार का एक मानसिक पूजन स्तोत्र भगवान शिव के लिए भी बनाया गया है जो आप अपने पूजन में प्रयोग कर सकते हैं । इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव का पूजन संपन्न हो जाता है ।.
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं,
नानारत्नविभूषितं मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम्।
जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥
रत्न से जडा हुआ आसन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्न से विभूषित दिव्य वस्त्र, मृग के मद अर्थात कस्तूरि आदि गन्ध से समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप , हे देव , हे दयानिधि, हे पशुपति , यह सब मैं अपने हृदय से कल्पना करता हुआ मानसिक रूप से आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया आप इस मानसिक पूजन को ग्रहण कीजिये।
सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं रम्भाफलं पानकम्।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥
मैंने नौ रत्नों से जड़ित सोने के पात्र में घी से युक्त खीर, दूध और दधि सहित पांच प्रकार का भोग व्यंजन, केले (कदली) का फल, शरबत, अनेकों शाक, तथा कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा पान आदि मानसिक रूप से बनाकर प्रस्तुत किये हैं। हे प्रभो, आप स्वीकार कीजिये।
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला गीतं च नृत्यं तथा।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥
मैं मानसिक रूप से भावना करता हुआ आपको ... छत्र, चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, के साथ साथ वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी जैसे वाद्य यंत्रों के साथ साथ गान और नृत्य आपकी सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ । आपके श्री चरणों मे मैं अपना साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति आदि मानसिक रूप से ही संकल्प करता हुआ आपको समर्पण करता हूँ। आप इसे ग्रहण कीजिये।
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधि-स्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥
हे देवधिदेव शिव , मेरी आत्मा आप हो, मेरी बुद्धि पार्वतीजी हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, मेरा यह शरीर आपका मन्दिर है,
सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है, मेरी निद्रा ही मेरी समाधि है, मेरा चलना-फिरना ही आपकी परिक्रमा है तथा
मेरे मुख से निकले शब्द ही आपके पूजन के स्तोत्र हैं। इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब हे शंभू ,आपकी आराधना ही है।
कर-चरण-कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥
मैंने अपने हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, जिनके विषय मे मुझे पता हो या न पता हो , उन सबको हे करुणा के सागर महादेव शम्भो। आप क्षमा कर कीजिये। हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।
11 फ़रवरी 2026
बालकों के लिए रक्षा कारक : छह मुखी रुद्राक्ष
बालकों के लिए रक्षा कारक : छह मुखी रुद्राक्ष
छह मुखी रुद्राक्ष साक्षात् कार्तिकेय भगवान् का प्रतीक है, जो देव सेना के सेनापति हैं , देवधिदेव महादेव के पुत्र हैं । इन्हे षण्मुख और स्कन्द भी कहा जाता है ।
यह शत्रुओं के निवारण के लिए अति लाभ दायक होने के कारण शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहलाता है
यह बच्चों को नजर तथा नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाने मे सहायक होता है ।
जिन बच्चों को डरावने सपने आते हैं या नींद से डरकर जाग जाते हैं उनके लिए लाभकारी है
धारण करने के नियम :-
मेरी बुद्धि के अनुसार भगवान शिव किसी बंधन मे नहीं हैं तो उनका अंश रुद्राक्ष धारण करने के लिए भी किसी नियम की आवश्यकता नहीं है ।
बालकों को वैसे भी छूट रहती है इसलिए इसे कोई भी पहन सकता है, जिसे भगवान शिव और जगदंबा पर पूर्ण विश्वास हो ।
शुद्धि अशुद्धि के विषय मे बेवजह चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है ।
शुद्धि अशुद्धि के विषय मे अगर आपको बहुत चिंता हो तो गंगा जल या शुद्ध जल से भरी कटोरी मे रुद्राक्ष रखकर 108 बार "ॐ नमः शिवाय " मंत्र पढ़ लेंगे तो शुद्ध हो जाएगा फिर उसे पहन सकते हैं ।
विशेष :-
किसी प्रकार का संकट आने या कोई तंत्र प्रयोग या नकारात्मक शक्ति के आपसे टकराने की स्थिति मे रुद्राक्ष फट जाता है और आपकी रक्षा करता है । ऐसी स्थिति मे रुद्राक्ष को जल मे विसर्जित कर देंगे और यथाशीघ्र नया रुद्राक्ष धारण कर लेंगे ।
यदि आप चाहें तो आपको छह मुखी रुद्राक्ष अभिमंत्रित करके हमारे संस्थान "अष्टलक्ष्मी पूजा सामग्री" द्वारा भेजा जा सकता है ।
इसका शुल्क मात्र 250=00 (रूपए दो सौ पचास मात्र ) होगा । इसमे पूजा,पेकेजिंग और पोस्टेज का खर्च शामिल है । जिसका भुगतान आप नीचे दिये QR कोड़ के माध्यम से कर सकते हैं ।
रुद्राक्ष को अभिमंत्रित करने के लिए आपको निम्नलिखित जानकारी
मोबाइल नंबर 7000630499
पर व्हात्सप्प से भेजनी होगी :-
बालक/बालिका का नाम
उसकी जन्मतिथि,स्थान,समय,गोत्र । [जो भी मालूम हो ] - इसके आधार पर रुद्राक्ष बालक/बालिका के नाम से अभिमंत्रित किया जाएगा ।
उपरोक्त जानकारी न हो तो एक लेटेस्ट फोटो, बिना चश्मे के ।
अपना पूरा डाक का पता, पिन कोड सहित ।
मोबाइल नंबर जिसपर आवश्यकता पड़ने पर पोस्टमेन आपसे संपर्क कर सके ।
पार्सल इंडिया पोस्ट के द्वारा स्पीड पोस्ट से भेजा जाएगा ।
यदि आप अन्य कूरियर सर्विस से प्राप्त करना चाहते हैं तो डिलिवरी कौरियर सर्विस से भेजा जा सकता है । उसके लिए अतिरिक्त शुल्क 100 रुपए आपको भेजना पड़ेगा ।










