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19 जनवरी 2026

गायत्री मंत्र द्वारा एक सौ आठ देवी देवताओं का पूजन साधना

 गायत्री मंत्र द्वारा एक सौ आठ देवी देवताओं का पूजन साधना 



गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा के द्वारा स्थापित गायत्री परिवार के माध्यम से संपूर्ण विश्व गायत्री मंत्र की शक्ति और क्षमता से परिचित हो चुका है और गायत्री मंत्र के महत्त्व से  सभी साधक गण अच्छी तरह से परिचित है .

यहाँ पर  मैं अपने गुरु भाई श्री राहुल कुलकर्णी जी के द्वारा प्राप्त हुई पूजन  विधि प्रस्तुत कर रहा हूं जिसके माध्यम से आप 108 देवी देवताओं का पूजन एक साथ सब बंद कर सकते हैं इसमें मुश्किल से आधा या 1 घंटे का समय लगेगा ।  

 इसमें आप मंत्र जाप करते हुए पुष्प अक्षत जल जो आपकी श्रद्धा हो उसे अपने इष्ट के विग्रह शिवलिंग आदि पर समर्पित कर सकते हैं। 

कुछ भी उपलब्ध नही हो तो भी किसी खाली  प्लेट मे एक आचमनी जल छोडते हुये संपन्न कर सकते है । 

प्रयोग के रूप में अगर आप इसे करना चाहे तो जो माला, रुद्राक्ष या रत्न आप पहनते हैं या पहनना चाहते हैं उसके ऊपर इन मंत्रों का जाप करते हुए जल अक्षत कुमकुम आदि चढ़ाकर आप उसे चैतन्य कर सकते हैं । यह आपके लिए रक्षा कवच ऐसा कार्य करेगा । 

इस पूजन में सभी प्रमुख देवी देवताओं के साथ-साथ नवग्रह का पूजन भी सम्मिलित है यही नहीं इसमें सभी दिशाओं के देवताओं का पूजन सम्मिलित होने के कारण वास्तु पूजन भी संपन्न हो जाता है एक प्रकार से यह एक बेहद सरल छोटा और अपने आप में संपूर्ण पूजन है जिसका प्रयोग आप किसी भी विशेष पूजन के अवसर पर या नित्य पूजन में भी कर सकते हैं ।  मंत्रों का उच्चारण करने में शुरू में थोड़ी दिक्कत हो सकती है लेकिन उच्चारण करते करते आप का उच्चारण होता है स्पष्ट होता जाएगा यदि किसी शब्द के उच्चारण में आपको दिक्कत है तो आप मेरे ऑडियो चैनल से इसे सुन सकते हैं जिसका लिंक नीचे दिया हुआ है :-




सर्वप्रथम हाथ जोडकर प्रणाम करे 

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: 

ॐ श्री गणेशाय नम: 

ॐ  गायत्र्यै नम: 

अब दाहिने हाथ मे जल लेकर 4 बार आचमन करे 

 ॐ  आत्मतत्वाय स्वाहा 

ॐ विद्यातत्वाय स्वाहा 

ॐ  शिवतत्वाय स्वाहा 

ॐ  सर्वतत्वाय स्वाहा 

फिर गुरु , परम गुरु और पारमेष्ठी गुरु को प्रणाम करे 

ॐ गुरुभ्यो नम: 

ॐ परम गुरुभ्यो नम: 

ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम: 

अब अपने आसन को स्पर्श कर पुष्प अक्षत अर्पण करे 

ॐ आसन देवताभ्यो नम: 

ॐ पृथिव्यै  नम: 

अब एक  कलश मे जल लेकर उसमे कपुर , चंदन , इत्र की कुछ बुंदे , तुलसी पत्र , पुष्प अक्षत डाले और कलश को तिलक करे . 

 ॐ कलश देवताभ्यो नम: 

अब अपने आप को चंदन या कुंकुम का तिलक  लगाये 

फिर दाहिने हाथ मे जल लेकर निम्न संकल्प का उच्चारण कर छोडे

मैं (अपना नाम ), गोत्र ( न मालूम हो तो भारद्वाज या कश्यप गोत्र बोल सकते हैं ), आज इस पुण्य अवसर पर अपनी मनोकामना (मन मे अपनी मनोकामना बोल दें या आध्यात्मिक उन्नती हेतु कहें ) की पूर्ति हेतु श्रद्धापूर्वक सकल देवता की कृपा हेतु अष्टोत्तर देवता गायत्री मंत्र अर्चन संपन्न कर रहा हू .

हाथ जोड़कर देवी गायत्री के स्वरूप का ध्यान करके प्रणाम कर लें । 

भगवती गायत्री का पंचोपचार पूजन करे 

ॐ भुर्भुव:  स्व: गायत्र्यै नम : गंधं समर्पयामि [कुमकुम चढ़ाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: पुष्पं समर्पयामि [फूल चढ़ाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: धूपं समर्पयामि [अगरबत्ती दिखाएँ ]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: दीपं  समर्पयामि [दीपक]

ॐ भूर्भुवः स्व:  गायत्र्यै नम: नैवेद्यं  समर्पयामि [प्रसाद ]



अब गायत्री मंत्र का 12 बार उच्चारण करे .

ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात् 

अब विविध देवताओं के गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश के जल से एक एक आचमनी जल चढ़ाएँ । या कुमकुम, पुष्प, बेलपत्र,चावल जो भी आपकी भावना हो उसे चढ़ा सकते हैं । 

विविध देवताओं के  गायत्री मंत्र 

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1) ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् 

2) ॐ गुरुदेवाय विद्महे परम गुरवे धीमहि तन्नो गुरु: प्रचोदयात् 

3) ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीश: प्रचोदयात् 

4) ॐ अनसुयासुताय विद्महे अत्रिपुत्राय धीमहि तन्नो दत्त: प्रचोदयात् 

5) ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात् 

6) ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंति प्रचोदयात् 

7) ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसरुढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् 

8) ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै च धीमहि तन्नो वाणी प्रचोदयात् 

9) ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् 

10) ॐ महालक्ष्म्यै  विद्महे विष्णुप्रियायै   धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् 

11) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् 

12) ॐ कात्यायन्यै च विद्महे कन्याकुमारी च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् 

13) ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वतीरुपाय च धीमहि तन्नो कालिका प्रचोदयात् 

14) ॐ तारायै विद्महे महोग्रायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

15) ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

16) ॐ ऐं त्रिपुरा देव्यै विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै धीमहि सौस्तन्न: क्लिन्ने प्रचोदयात् 

17) ॐ त्रिपुरसुंदर्यै च विद्महे कामेश्वर्यै धीमहि तन्नो बाला प्रचोदयात् 

18) ॐ भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

19)  ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

20) ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात् 

21) ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तंभिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

22) ॐ मातंग्यै च विद्महे उच्छिष्टचांडाल्यै  च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

23) ॐ महालक्ष्मी विद्महे विष्णुपत्नी धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् 

24) ॐ महिषमर्दिन्यै च विद्महे दुर्गादेव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

25) ॐ तुलसीदेव्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो वृंदा प्रचोदयात् 

26) ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् 

27) ॐ शैलपुत्र्यै च विद्महे काममालायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

28) ॐ ब्रह्मचारिण्यै विद्महे ज्ञानमालायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

29) ॐ चंद्रघण्टायै विद्महे अर्धचंद्राय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्

30) ॐ कुष्मांडायै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

31) ॐ कुमार्यै  च विद्महे स्कंदमातायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

32) ॐ कात्यायन्यै च विद्महे सिद्धिशक्त्यै च धीमहि तन्नो कात्यायनी प्रचोदयात् 

33) ॐ कालरात्र्यै च विद्महे सर्वभयनाशिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

34) ॐ सिद्धिदात्र्यै च विद्महे सर्वसिद्धिदायिनी च धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् 

35) ॐ महागौर्यै विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् 

36) ॐ ब्रह्ममनसायै विद्महे मंत्रअधिष्ठात्र्यै च धीमहि तन्नो मनसा प्रचोदयात् 

37) ॐ सुस्थिरयौवनायै विद्महे सर्वमंगलायै च धीमहि तन्नो मंगलचंडी प्रचोदयात् 

38) ॐ भूवाराह्यै च विद्महे रत्नेश्वर्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् 

39) ॐ वराहमुखी विद्महे आंत्रासनी च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्

40) ॐ ज्वालामालिन्यै च विद्महे महाशूलिन्यै च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्

41) ॐ भगवत्यै विद्महे महेश्वर्यै धीमहि  तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात्

42) ॐ व्यापिकायै विद्महे नानारुपायै धीमहि तन्नो योगिनी प्रचोदयात् 

43) ॐ सहस्त्रथनाय विद्महे जननीरुपायै च धीमहि तन्नो कामधेनु: प्रचोदयात् 

44) ॐ देवकीनंदनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात् 

45) ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् 

46) ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात् 

47) ॐ जनकनंदिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि तन्नो सीता प्रचोदयात्

48) ॐ दशरथसुताय विद्महे रामानुजाय धीमहि तन्नो लक्ष्मण: प्रचोदयात् 

49) ॐ अंजनीसुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमत प्रचोदयात् 

50) ॐ श्री निलयाय विद्महे व्यंकटेशाय धीमहि तन्नो हरि: प्रचोदयात् 

51) ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात् 

52) ॐ जामदग्नाय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात् 

53) ॐ धन्वंतराय विद्महे अमृतकलशहस्ताय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् 

54) ॐ सहस्त्रशीर्षाय विद्महे विष्णुतल्पाय धीमहि तन्नो शेष: प्रचोदयात् 

55) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुड: प्रचोदयात् 

56) ॐ पांचजन्याय विद्महे पवमानाय धीमहि तन्नो शंख: प्रचोदयात् 

57) ॐ सुदर्शनाय विद्महे चक्रराजाय धीमहि तन्नो चक्र: प्रचोदयात् 

58) ॐ यंत्रराजाय विद्महे वरप्रदाय धीमहि तन्नो यंत्र: प्रचोदयात् 

59) ॐ पाशुपतये विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात् 

60) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय  धीमहि तन्नो स्कंद: प्रचोदयात् 

61) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुंडाय धीमहि तन्नो नंदी: प्रचोदयात् 

62) ॐ आपदुद्धारणाय विद्महे बटुकेश्वराय धीमहि तन्नो वीर:  प्रचोदयात् 

63) ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नो अनंग: प्रचोदयात् 

64) ॐ कालवर्णाय विद्महे महाकोपाय धीमहि तन्नो वीरभद्र: प्रचोदयात् 

65) ॐ शालुवेषाय विद्महे पक्षिराजाय धीमहि तन्नो शरभ: प्रचोदयात् 

66) ॐ श्वानध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नो क्षेत्रपाल: प्रचोदयात् 

67) ॐ ओंकाराय विद्महे भवताराय धीमहि तन्नो प्रणव: प्रचोदयात् 

68) ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात् 

69) ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो चंद्र: प्रचोदयात् 

70) ॐ अंगारकाय  विद्महे शक्तिहस्ताय  धीमहि तन्नो  भौम: प्रचोदयात् 

71) ॐ सौम्यरुपाय  विद्महे बाणेशाय  धीमहि तन्नो बुध: प्रचोदयात् 

72) ॐ आंगिरसाय विद्महे दिव्यदेहाय  धीमहि तन्नो जीव: प्रचोदयात् 

73) ॐ शुक्राचार्याय विद्महे गौरवर्णाय धीमहि तन्नो शुक्र: प्रचोदयात् 

74) ॐ कृष्णांगाय विद्महे रविपुत्राय धीमहि तन्नो सौरि: प्रचोदयात् 

75) ॐ कृष्णवर्णाय विद्महे रौद्ररुपाय धीमहि तन्न: शनैश्चर: प्रचोदयात् 

76) ॐ शिरोरुपाय  विद्महे अमृतेशाय  धीमहि तन्न: राहु: प्रचोदयात् 

77) ॐ पद्मपुत्राय  विद्महे अमृतेशाय  धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात् 

78) ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्रमूर्त्यै च धीमहि तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात् 

79) ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्नि: प्रचोदयात् 

80) ॐ जलबिंबाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो अंबु  प्रचोदयात् 

81) ॐ विश्वपुरुषाय विद्महे शिवापत्ये च धीमहि तन्नो पवन: प्रचोदयात् 

82) ॐ सर्वव्यापकाय विद्महे गगनाय च धीमहि तन्नो आकाश: प्रचोदयात् 

83) ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्न: इंद्र: प्रचोदयात् 

84) ॐ वैश्वानराय विद्महे सप्तजिव्हाय धीमहि तन्नो अग्नि: प्रचोदयात् 

85) ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम: प्रचोदयात् 

86) ॐ ज्वालामुखाय विद्महे उष्ट्रवाहनाय धीमहि निऋति: प्रचोदयात् 

87) ॐ पश्चिमेशाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नो वरुण: प्रचोदयात् 

88) ॐ ध्वजहस्ताय विद्महे प्राणाधिपाय धीमहि तन्नो वायु: प्रचोदयात् 

89) ॐ यक्षराजाय विद्महे पुलस्त्य पुत्राय धीमहि तन्नो कुबेर: प्रचोदयात् 

90) ॐ अर्धदेवाय विद्महे व्यंतरदेवत्रे च धीमहि तन्नो यक्ष: प्रचोदयात् 

91) ॐ गीतवीणायै विद्महे कामरुपिण्यै धीमहि तन्नो गंधर्व: प्रचोदयात् 

92) ॐ कामदेवप्रियायै विद्महे सौंदर्यमूर्तये धीमहि तन्नो अप्सरा प्रचोदयात् 

93) ॐ सहस्त्रफणाय विद्महे वासुकिराजाय धीमहि तन्नो नाग: प्रचोदयात्

94) ॐ पितृवंशाय विद्महे प्रपितामहाय धीमहि तन्नो पितर: प्रचोदयात् 

95) ॐ नागपृष्ठाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नो वास्तु प्रचोदयात् 

96) ॐ पाराशरगोत्राय विद्महे नानापुराणाय धीमहि तन्नो व्यास: प्रचोदयात् 

97) ॐ आदिऋष्यै विद्महे रामायणाय धीमहि तन्नो वाल्मिकि: प्रचोदयात् 

98) ॐ ब्रह्ममानसपुत्राय विद्महे पुराणेतिहासकाराय धीमहि तन्नो वसिष्ठ: प्रचोदयात् 

99) ॐ शक्तिपुत्राय विद्महे पापानिती निवारणाय धीमहि तन्नो पराशर: प्रचोदयात् 

100) ॐ गाधिपुत्राय विद्महे गायत्रीमंत्रप्रवर्तकाय च धीमहि तन्नो विश्वामित्र: प्रचोदयात् 

101) ॐ अक्षुणोत्पत्ताय विद्महे ब्रह्मपुत्राय धीमहि तन्नो अत्रि: प्रचोदयात् 

102) ॐ कर्दमसुतायै विद्महे अत्रिभार्यायै धीमहि तन्नो अनसुया प्रचोदयात् 

103) ॐ सप्तर्षाय विद्महे मानसीसृष्टाय धीमहि तन्नो गौतम: प्रचोदयात् 

104) ॐ मृकुण्डुपुत्राय विद्महे योगज्ञानाय च धीमहि तन्नो मार्कंडेय: प्रचोदयात् 

105 ) ॐ शिवतत्त्वाय विद्महे योगांतराय धीमहि तन्नो पतंजली प्रचोदयात् 

106) ॐ त्रिपथगामिनी विद्महे रुद्रपत्न्यै च धीमहि तन्नो गंगा प्रचोदयात् 

107) ॐ यमुनादेव्यै च विद्महे तीर्थवासिनी च धीमहि तन्नो यमुना प्रचोदयात्

108) ॐ रुद्रदेहायै विद्महे मेकलकन्यकायै धीमहि तन्नो रेवा प्रचोदयात्

अब एक आचमनी जल निम्न मंत्र बोलते हुये अर्पण करे 

अनेन अष्टोत्तर देवता गायत्री मंत्र पूजनेन भगवती  गायत्री सह सकल देवतां प्रीयतां न मम .. 

अब क्षमा प्रार्थना करे .

आवाहनं न जानामि , न जानामि विसर्जनं 

पूजां चैव न जानामि , क्षम्यतां परमेश्वरी 

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी 

यत पूजितं मया परिपूर्णं तदस्तु मे 

देव देव गुरुदेव पूजां प्राप्य करोतु यत 

त्राहि त्राहि कृपासिंधु पूजा पूर्णतरां कुरु 

ॐ तत्सत ब्रह्मार्पणं अस्तु


नवरात्रि में देवी का विस्तृत पूजन

  नवरात्रि में देवी का विस्तृत पूजन



नवरात्रि में सभी की इच्छा रहती है कि देवी का विस्तृत पूजन किया जाए । नीचे की पंक्तियों में एक सरल पूजन विधि प्रस्तुत है ।


इसमें मेरी आराध्य महामाया देवी महाकाली का पूजन किया गया है उनके पूजन में सभी देवियों का पूजन संपन्न हो जाता है .  लेकिन अगर आप देवी के किसी और स्वरूप का पूजन करना चाहते हैं तो भी आप इसी विधि से पूजन संपन्न कर सकते हैं । फर्क सिर्फ इतना होगा कि जहां पर (क्रीं महाकाल्यै नमः) लिखा है उस स्थान पर देवी के दूसरे स्वरूप का मंत्र आ जाएगा ।

उदाहरण के लिए अगर आप दुर्गा देवी की साधना कर रहे हैं तो वहां पर आप (दुँ दुर्गायै नमः ) बोलकर पूरा पूजन सम्पन्न कर सकते हैं ।
काली :-
ध्यान
देवी काली का ध्यान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ध्यानम समर्पयामि )

दुर्गा :-
ध्यान
देवी दुर्गा का ध्यान करें
( दुँ दुर्गायै नमः ध्यानम समर्पयामि )

इस तरह से आप किसी भी देवी का पूजन कर सकते हैं ....

इसके अलावा आप यदि किसी मंत्र का जाप कर रहे हो उस मंत्र को बोलकर भी पूरा पूजन संपन्न कर सकते हैं ।
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माता महाकाली का पूजन


महाकाली का पूजन प्रस्तुत है जो कि बेहद सरल है ।


ध्यान
देवी काली का ध्यान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ध्यानम समर्पयामि )

यदि पढ़ सकते हो तो नीचे लिखा हुआ ध्यान भी पढ़ सकते हैं ।

करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ॥
सद्यः छिन्नशिरः खड्गवामाधोर्ध्व कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदञ्चैव दक्षिणोर्ध्वाध: पाणिकाम् ॥
महामेघ प्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डाली गलद्‌रुधिर चर्चिताम् ॥
कर्णावतंसतानीत शवयुग्म भयानकां ।
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ॥
शवानां कर संघातैः कृतकाञ्ची हसन्मुखीम् ।
सृक्कद्वयगलद् रक्तधारां विस्फुरिताननाम् ॥
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालय वासिनीम् ।
बालर्क मण्डलाकार लोचन त्रितयान्विताम् ॥
दन्तुरां दक्षिण व्यापि मुक्तालम्बिकचोच्चयाम् ।
शवरूप महादेव ह्रदयोपरि संस्थिताम् ॥
शिवाभिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ।
महाकालेन च समं विपरीत रतातुराम् ॥
सुक प्रसन्नावदनां स्मेरानन सरोरुहाम् ।
एवं सञ्चियन्तयेत् काली सर्वकाम समृद्धिदां ॥

पुष्प समर्पण :-
अब फूल चढ़ाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पम समर्पयामि )

आसन :-
आसन के लिए महाकाली के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः आसनं समर्पयामि )

पाद्य :-
जल से चरण धोएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः पाद्यं समर्पयामि )

उद्वर्तन :-
चरणों में सुगन्धित तेल समर्पित करे ।
( क्रीं महाकाल्यै नमः उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

आचमन :-
पीने के लिए जल प्रदान करें ।
( क्रीं महाकाल्यै नमः आचमनीयम् समर्पयामि )

स्नान :-
सामान्य जल या सुगन्धित पदार्थों से युक्त जल से स्नान करवाएं (जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें )
( क्रीं महाकाल्यै नमः स्नानं निवेदयामि )

मधुपर्क :-
गाय का शुद्ध, दूध , दही , घी , चीनी , शहद मिलाकर चढ़ाएं या शहद चढ़ाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः मधुपर्कं समर्पयामि )

चन्दन :-
सफ़ेद चन्दन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः चन्दनं समर्पयामि )

रक्त चन्दन :-
लाल चन्दन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः रक्त चन्दनं समर्पयामि )

सिन्दूर :-
सिन्दूर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि )

कुंकुम :-
कुंकुम समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कुंकुमं समर्पयामि )

अक्षत :-
चावल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः अक्षतं समर्पयामि )

पुष्प :-
पुष्प समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पं समर्पयामि )

विल्वपत्र :-
बिल्वपत्र समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि )

पुष्प माला :-
फूलों की माला समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पमालां समर्पयामि )

वस्त्र :-
वस्त्र समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि )

धूप :-
सुगन्धित धुप समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः धूपं समर्पयामि )

दीप :-
दीपक समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः दीपं दर्शयामि )

सुगंधि द्रव्य :-
इत्र समर्पित करे
( क्रीं महाकाल्यै नमः सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

कर्पूर दीप :-
कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कर्पूर दीपम दर्शयामि )

नैवेद्य :-
प्रसाद समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः नैवेद्यं समर्पयामि )

ऋतु फल :-
फल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ऋतुफलं समर्पयामि )

जल :-
जल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः जलम समर्पयामि )

करोद्वर्तन जल :-
हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

आचमन :-
जल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

ताम्बूल :-
पान समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि )

काजल :-
काजल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कज्जलं समर्पयामि )

महावर :-
महावर समर्पित करे
( क्रीं महाकाल्यै नमः महावरम समर्पयामि )

चामर :-
चामर / पंखा झलना होता है
( क्रीं महाकाल्यै नमः चामरं समर्पयामि )

घंटा वादनम :-
घंटी बजाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः घंटा वाद्यं समर्पयामि )

दक्षिणा :-
दक्षिणा/ धन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः दक्षिणाम समर्पयामि )

पुष्पांजलि :-
दोनों हाथों मे फूल या फूल की पंखुड़ियाँ भरकर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पांजलिं समर्पयामि )

नीराजन :-
कपूर से आरती
( क्रीं महाकाल्यै नमः नीराजनं समर्पयामि )

क्षमा प्रार्थना :-
( क्रीं महाकाल्यै नमः क्षमा प्रार्थनाम समर्पयामि )


दोनों हाथों से कानों को पकड़कर पूजन मे हुईं किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए कृपा की याचना करें ।

अगर पढ़ सकते हैं तो इसे भी पढ़ सकते हैं

ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते

ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः ।।

आरती :-
अंत मे आरती करें

19 सितंबर 2025

नवरात्रि : अखंड ज्योति तथा दुर्गा पूजन की सरल विधि

       

नवरात्रि : अखंड ज्योति तथा दुर्गा पूजन की सरल विधि

 




यह विधि सामान्य गृहस्थों के लिए है जो ज्यादा पूजन नहीं जानते । 

जो साधक हैं वे प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर विस्तृत पूजन क्षमतानुसार सम्पन्न करें . 

 

यह पूजन आप देवी के चित्रमूर्ति या यंत्र के सामने कर सकते हैं । 

यदि आपके पास इनमे से कुछ भी नही तो आप शिवलिंगरत्न या रुद्राक्ष पर भी पूजन कर सकते हैं । 

अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार घी या तेल का दीपक जलाये। धुप अगरबत्ती जलाये।

 

अगर अखंड दीपक जलाना चाहते हैं तो बड़ा दीपक और लंबी बत्ती रखें । इसे बुझने से बचाने के लिए काँच की चिमनी का प्रयोग कर सकते हैं । पूजा करते समय आपका मुंह उत्तर या पूर्व की ओर देखता हुआ हो तो बेहतर है । दीपक की लौ को उत्तर या पूर्व की ओर रखें ।

 

बैठने के लिए लाल या काले कम्बल या मोटे कपडे का आसन हो।

जाप के लिए रुद्राक्ष माला का उपयोग कर सकते हैं।

 

इसके अलावा आपको निम्नलिखित वस्तुओं की आवश्यकता पड़ेगी :-

एक बड़ा पीतल,तांबा,मिट्टी का कलश,

जल पात्र,

हल्दी, कुंकुमचन्दन, अष्टगंध,

अक्षत(बिना टूटे चावल),

पुष्प ,

फल,

मिठाई / प्रसाद .

 

अगर यह सामग्री नहीं है या नहीं ले सकते हैं तो अपने मन में देवी को इन सामग्रियों का समर्पण करने की भावना रखते हुए अर्थात मन से उनको समर्पित करते हुए मानसिक पूजन करे । 

 

सबसे पहले गुरु का स्मरण करे। अगर आपके गुरु नहीं है तो ब्रह्माण्ड के समस्त गुरु मंडल का स्मरण करे या जगद्गुरु भगवान् शिव का ध्यान कर लें ।

 

ॐ गुं गुरुभ्यो नमः।

 

श्री गणेश का स्मरण करे

 

ॐ श्री गणेशाय नमः।

 

भैरव बाबा का स्मरण करें

ॐ भ्रं भैरवाय नमः।

 

शिव शक्ति का स्मरण करें

ॐ साम्ब सदाशिवाय नमः।

 

चमच से चार बार बाए हाथ से दाहिने हाथ पर पानी लेकर पिए। एक मन्त्र के बाद एक बार पानी पीना है।

 

ॐ आत्मतत्वाय स्वाहा । 

ॐ विद्या तत्वाय स्वाहा । 

ॐ शिव तत्वाय स्वाहा । 

ॐ सर्व तत्वाय स्वाहा । 

 

गुरु सभी पूजन का आधार है इसलिए उनके लिए पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे। नमः बोलकर सामग्री को छोड़ते हैं।

 

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः

 

हम पृथ्वी के ऊपर बैठकर पूजन कर रहे हैं इसलिए उनको प्रणाम करके उनकी अनुमति मांग के पूजन प्रारंभ किया जाता है जिसे पृथ्वी पूजन कहते हैं।

 

अपने आसन को उठाकर उसके नीचे कुमकुम से एक त्रिकोण बना दें उसे प्रणाम करें और निम्नलिखित मंत्र पढ़े और पुष्प अक्षत अर्पण करे।

 

ॐ पृथ्वी देव्यै नमः । 

 

देह न्यास :-

 

किसी भी पूजन को संपन्न करने से पहले संबंधित देवी या देवता को अपने शरीर में स्थापित होने और रक्षा करने के लिए प्रार्थना की जाती है इसके निमित्त तीन बार सर से पाँव तक हाथ फेरे। इस दौरान निम्नलिखित मंत्र का जाप करते रहे।

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः ।

 

कलश स्थापना :-

कलश को अमृत की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। हमें जीवित रहने के लिए अमृत तत्व की आवश्यकता होती है। जो भी भोजन हम ग्रहण करते हैं उसका सार या अमृत जिसे आज वैज्ञानिक भाषा में विटामिन और प्रोटीन कहा जाता है वह जब तक हमारा शरीर ग्रहण न कर ले तब तक हम जीवित नहीं रह सकते। कलश की स्थापना करने का भाव यही है कि हम समस्त प्रकार के अमृत तत्व को अपने पास स्थापित करके उसकी कृपा प्राप्त करें और वह अमृत तत्व हमारे जीवन में और हमारे शरीर में स्थापित हो ताकि हम स्वस्थ निरोगी रह सकें।

 

कलश स्थापना के लिए निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करके मन में उपरोक्त भावना रखकर कलश की स्थापना कर सकते हैं।

 

ॐ अमृत कलशाय नमः । 

उसपर पुष्प,अक्षत,पानी छिड़के । ऐसी भावना करें कि जितनी पवित्र नदियां हैं उनका अमृततुल्य जल कलश मे समाहित हो रहा है ।  

 

संकल्प :-(यह सिर्फ पहले दिन करना है )

संकल्प का तात्पर्य होता है कि आप महामाया के सामने एक प्रकार से एक एग्रीमेंट कर रहे हैं कि हे माता मैं आपके चरणों में अपने अमुक कार्य के लिए इतने मंत्र जाप का संकल्प लेता हूं और आप मुझे इस कार्य की सफलता का आशीर्वाद दें।

 

दाहिने हाथ में जल पुष्प अक्षत लेकर संकल्प (सिर्फ पहले दिन) करे।

“ मैं (अपना नाम और गोत्र 

[गोत्र न मालूम हो तो भारद्वाज गोत्र कह सकते हैं ]) 

इस नवरात्री पर्व मे

भगवती दुर्गा की कृपा प्राप्त होने हेतु /अपनी समस्या निवारण हेतु /अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु 

यहाँ समस्या या मनोकामना बोलेंगे ) 

यथा शक्ति (अगर रोज निश्चित संख्या मे नहीं कर सकते तो, अगर आप निश्चित संख्या में करेंगे तो वह संख्या यहाँ बोल सकते हैं जैसे 11 या 21 माला नित्य जाप )

करते हुए आपकी साधना नवरात्रि मे कर रहा हूँ। आप मेरी मनोकामना पूर्ण करें ”

इतना बोलकर जल छोड़े

(यह सिर्फ पहले दिन करना है )

 

अब गणेशजी का ध्यान करे

 

वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

 

फिर भैरव जी का स्मरण करे

 

तीक्ष्ण दंष्ट्र  महाकाय कल्पांत दहनोपम 

भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि 

 

अब भगवती का ध्यान करे।

 

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते

 

इसके बाद आप अखंड ज्योति या दीपक जला सकते हैं ।

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कृपालिनी

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

 

अब भगवती को अपने पूजा स्थल मे आमंत्रित करें :-

ॐ दुँ दुर्गा देव्यै नमः ध्यायामि आवाहयामि स्थापयामि

 

पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे ऐसी भावना करे की भगवती वहाँ साक्षात् उपस्थित है और आप उन्हें सारे उपचार अर्पण कर रहे है ।

 

भगवती का स्वागत कर पंचोपचार पूजन करे ,

अगर आपके पास सामग्री नहीं है तो मानसिक रूप से यानि उस वस्तु की भावना करते हुए पूजन करे।

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः गन्धम् समर्पयामि

(हल्दी कुमकुम चन्दन अष्टगंध अर्पण करे )

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः पुष्पम समर्पयामि

(फूल चढ़ाएं )

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः धूपं समर्पयामि

(अगरबत्ती या धुप दिखाएं )

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः दीपं समर्पयामि

(दीपक दिखाएँ )

 

ॐ दुँ दुर्गायै नमः नैवेद्यम समर्पयामि

(मिठाई दूध या फल अर्पण करे )

 

मां दुर्गा के 108 नाम से पूजन करें :-

·        आप इनके सामने नमः लगाकर फूल,चावल,कुमकुम,अष्टगंधहल्दी, सिंदूर जो आप चढ़ाना चाहें चढ़ा सकते हैं ।

·        यदि कुछ न हो तो पानी चढ़ा सकते हैं ।

·        वह भी न हो तो प्रणाम कर सकते हैं ।  

(  हर एक नाम मे  "-"  के बाद उस नाम का अर्थ लिखा हुआ है । आप केवल नाम का उच्चारण करके नमः लगा लेंगे । जैसे सती नमः साध्वी नमः ..... )

 

1.               सती- जो दक्ष यज्ञ की अग्नि में जल कर भी जीवित हो गई

2.             साध्वी- सरल

3.             भवप्रीता- भगवान शिव पर प्रीति रखने वाली

4.             भवानी- ब्रह्मांड में निवास करने वाली

5.             भवमोचनी- भव अर्थात संसारिक बंधनों से मुक्त करने वाली

6.             आर्या- देवी

7.              दुर्गा- अपराजेय

8.             जया- विजयी

9.             आद्य- जो सृष्टि का प्रारंभ है

10.                       त्रिनेत्र- तीन नेत्रों से युक्त

11.            शूलधारिणी- शूल नामक अस्त्र को धारण करने वाली

12.                        पिनाकधारिणी- शिव का धनुष पिनाक को धारण करने वाली

13.                        चित्रा- सुरम्य

14.                       चण्डघण्टा- प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली

15.                        सुधा- अमृत की देवी

16.                       मन- मनन-शक्ति की स्वामिनी

17.          बुद्धि- सर्वज्ञाता

18.                       अहंकारा- अभिमान करने वाली

19.                       चित्तरूपा- वह जो हमारी सोच की स्वामिनी है

20.                     चिता- मृत्युशय्या

21.                        चिति- चेतना की स्वामिनी

22.                      सर्वमन्त्रमयी- सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली

23.                      सत्ता- सत-स्वरूपाजो सब से ऊपर है

24.                     सत्यानंद स्वरूपिणी- सत्य और आनंद के रूप वाली

25.                      अनन्ता- जिनके स्वरूप का कहीं अंत नहीं

26.                     भाविनी- सबको उत्पन्न करने वाली

27.                      भाव्या- भावना एवं ध्यान करने योग्य

28.                     भव्या-जो भव्यता की स्वामिनी है

29.                     अभव्या- जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं

30.                     सदागति- हमेशा गतिशील या सक्रिय

31.                        शाम्भवी- शंभू की पत्नी

32.                      देवमाता- देवगण की माता

33.                      चिन्ता- चिन्ता की स्वामिनी

34.                     रत्नप्रिया- जो रत्नों को पसंद करती है उनकी की स्वामिनी है

35.                      सर्वविद्या- सभी प्रकार के ज्ञान की की स्वामिनी है

36.                     दक्षकन्या- प्रजापति दक्ष की बेटी

37.                      दक्षयज्ञविनाशिनी- दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली

38.                     अपर्णा- तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली

39.                     अनेकवर्णा- अनेक रंगों वाली

40.                    पाटला- लाल रंग वाली

41.                       पाटलावती- गुलाब के फूल

42.                     पट्टाम्बरपरीधाना- रेशमी वस्त्र पहनने वाली

43.                     कलामंजीरारंजिनी- पायल की ध्वनि से प्रसन्न रहने वाली

44.                     अमेय- जिसकी कोई सीमा नहीं

45.                     विक्रमा- असीम पराक्रमी

46.                     क्रूरा- कठोर

47.                      सुन्दरी- सुंदर रूप वाली

48.                     सुरसुन्दरी- अत्यंत सुंदर

49.                     वनदुर्गा- जंगलों की देवी

50.                     मातंगी- महाविद्या

51.                        मातंगमुनिपूजिता- ऋषि मतंगा द्वारा पूजनीय

52.                      ब्राह्मी- भगवान ब्रह्मा की शक्ति

53.                      माहेश्वरी- प्रभु शिव की शक्ति

54.                     इंद्री- इंद्र की शक्ति

55.                      कौमारी- किशोरी

56.                     वैष्णवी- भगवान विष्णु की शक्ति

57.                      चामुण्डा- चंडिका

58.                     वाराही- वराह पर सवार होने वाली

59.                     लक्ष्मी- ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी

60.                    पुरुषाकृति- वह जो पुरुष रूप भी धारण कर ले

61.                       विमिलौत्त्कार्शिनी- आनन्द प्रदान करने वाली

62.                     ज्ञाना- ज्ञान की स्वामिनी है

63.                     क्रिया- हर कार्य की स्वामिनी

64.                     नित्या- जो हमेशा रहे

65.                     बुद्धिदा- बुद्धि देने वाली

66.                     बहुला- विभिन्न रूपों वाली

67.                      बहुलप्रेमा- सर्व जन प्रिय

68.                     सर्ववाहनवाहना- सभी वाहन पर विराजमान होने वाली

69.                     निशुम्भशुम्भहननी- शुम्भनिशुम्भ का वध करने वाली

70.                     महिषासुरमर्दिनि- महिषासुर का वध करने वाली

71.          मधुकैटभहंत्री- मधु व कैटभ का नाश करने वाली

72.                      चण्डमुण्ड विनाशिनि- चंड और मुंड का नाश करने वाली

73.                      सर्वासुरविनाशा- सभी राक्षसों का नाश करने वाली

74.                      सर्वदानवघातिनी- सभी दानवों का नाश करने वाली

75.                      सर्वशास्त्रमयी- सभी शास्त्रों को अपने अंदर समाहित करने वाली

76.                      सत्या- जो सत्य के साथ है

77.                       सर्वास्त्रधारिणी- सभी प्रकार के अस्त्र या हथियारों को धारण करने वाली

78.                      अनेकशस्त्रहस्ता- कई शस्त्र हाथों मे रखने वाली

79.                      अनेकास्त्रधारिणी- अनेक अस्त्र या हथियारों को धारण करने वाली

80.                    कुमारी- जिसका स्वरूप कन्या जैसा है

81.                       एककन्या- कन्या जैसे स्वरूप वाली

82.                     कैशोरी- किशोरी जैसे स्वरूप वाली

83.                     युवती- युवा स्त्री जैसे स्वरूप वाली

84.                     यति- जो तपस्वीयों मे श्रेष्ठ है

85.                     अप्रौढा- जो कभी वृद्ध ना हो

86.                     प्रौढा- जो वृद्ध भी है

87.                      वृद्धमाता- जो वृद्ध माता जैसे स्वरूप वाली है

88.                     बलप्रदा- शक्ति देने वाली

89.                     महोदरी- ब्रह्मांड को संभालने वाली

90.                    मुक्तकेशी- खुले बाल वाली

91.                       घोररूपा- भयंकर रूप वाली

92.                     महाबला- अपार शक्ति वाली

93.                     अग्निज्वाला- आग की ज्वाला की तरह प्रचंड स्वरूप वाली

94.                     रौद्रमुखी- विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर स्वरूप वाली

95.                     कालरात्रि- जो काल रात्री नामक महाशक्ति है

96.                     तपस्विनी- तपस्या में लगी हुई

97.                      नारायणी- भगवान नारायण की शक्ति

98.                     भद्रकाली- काली का भयंकर रूप

99.                     विष्णुमाया- भगवान विष्णु की माया

100.                जलोदरी- जल में निवास करने वाली

101.                   शिवदूती- भगवान शिव की दूत

102.                 कराली- प्रचंड स्वरूपिणी

103.                 अनन्ता- जिसका ओर छोर नहीं है

104.                 परमेश्वरी- जो परम देवी है

105.                 कात्यायनी- महाविद्या कात्यायनी

106.                 सावित्री- देवी सावित्री स्वरूपिणी

107.                  प्रत्यक्षा- जो प्रत्यक्ष है

108.                 ब्रह्मवादिनी- ब्रह्मांड मे हर जगह वास करने वाली

 

अंत में एक आचमनी(चम्मच) जल चढ़ाये और प्रार्थना करें कि महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती स्वरूपा श्री दुर्गा जी मुझ पर कृपालु हों।

 

इसके बाद रुद्राक्ष माला से नवार्ण मन्त्र या दुर्गा मंत्र का यथाशक्ति या जो संख्या आपने निश्चित की है उतनी संख्या मे जाप करे ।

नवार्ण मंत्र :-

 

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

(ऐम ह्रीम क्लीम चामुंडायै विच्चे ऐसा उच्चारण होगा )

[Aim Hreem Kleem Chamundaaye vichche ]

 

सदगुरुदेव डा नारायण दत्त श्रीमाली जी (परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी) के अनुसार इसके प्रारम्भ में प्रणव अर्थात ॐ लगाने की जरुरत नहीं है ।

दुर्गा मंत्र:-

ॐ ह्रींम दुं दुर्गायै नम:

[Om Hreem doom durgaaye namah ]

रोज एक ही संख्या में जाप करे।

एक माला जाप की संख्या 100 मानी जाती है । माला में 108 दाने होते हैं । शेष 8 मंत्रों को उच्चारण त्रुटि या अन्य गलतियों के निवारण के लिए छोड़ दिया जाता है ।

अपनी क्षमतानुसार 1/3/5/7/11/21/33/51 या 108  माला जाप करे।

 

जब जाप पूरा हो जाये तो अपने दोनों कान पकड़कर किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करे .

उसके बाद भगवती का थोड़ी देर तक आँखे बंद कर ध्यान करे और वहीँ 5 मिनट बैठे रहें।

अंत मे आसन को प्रणाम करके उठ जाएँ।

 

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