1 सितंबर 2026

काली शाबर मंत्र साधना

 


प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली ।

ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार
तत सार मध्ये ज्योत
ज्योत मध्ये परम ज्योत
परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता 
शम्भु शिवानी काली ओ काली काली महाकाली
कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी
हाथ खप्पर खडग धारी
गले मुण्डमाला हंस मुखी । 
जिह्वा ज्वाला दन्त काली । 
मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । 
मांस खाये रक्त-पी-पीवे । 
भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई । 
सत की नाती , धर्म की बेटी । 
इन्द्र की साली , काल की काली । 
जोग की जोगीन, नागों की नागीन । 
मन माने तो संग रमाई, नहीं तो श्मशान फिरे । 
अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली । 
अजर महाकाली । 
बजर अमर काली । 
भख जून निर्भय काली । 

बला भख, दुष्ट को भख
काल भख, पापी पाखण्डी को भख । 

जती सती को रख । 

ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।



मूल मंत्र -

क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।



विधि -

  1. महाकाली की कृपा प्रदान करेगा ।
  2. अपनी क्षमतानुसार 1, 3,9,11,21,51,108 बार जाप रात्रिकाल मे करें।
  3. जन्माष्टमी/कालरात्रि/शिवरात्रि/नवरात्रि/अमावस्या मे करने से विशेष लाभदायक होगा। 
  4. धूप जलाकर रखें । 

31 अगस्त 2026

भगवती महाकाली सहस्त्राक्षरी मंत्र

 भगवती महाकाली सहस्त्राक्षरी मंत्र




ॐ क्रीं  क्रीँ  क्रीँ  ह्रीँ  ह्रीँ  हूं  हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ  ह्रीँ  ह्रीँ  हूं  हूं स्वाहा ।

शुचिजाया, महापिशाचिनी,  दुष्टचित्तनिवारिणी,
क्रीँ कामेश्वरी,  वीँ हं वाराहिके, ह्रीँ महामाये, खं खः क्रोधाधिपे !
श्रीं  महालक्ष्म्ये ! सर्वहृदय रञ्जनी । वाग्वादिनी विधे त्रिपुरे ।
हंस्त्रिँ  हसकहल ह्रीँ  हस्त्रैँ  ॐ ह्रीँ  क्लीँ  मे  स्वाहा ।
ॐ ॐ ह्रीँ  ईं स्वाहा ।
दक्षिणकालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा ।

खड्गमुण्डधरे, कुरुकुल्ले तारे, ॐ  ह्रीँ  नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन । पच पच ।  मथ मथ ।
फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान मोहय मोहय ।
हयग्रीवे, सिँहवाहिनी, सिँहस्थे, अश्वारुढे, अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून ये मां हिँसतु तान ग्रस ग्रस ।
महानीले, वलाकिनी, नीलपताके, क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे, संक्षोभिणी, उच्छिष्टचाण्डालिके,
सर्वजगद वशमानय वशमानय ।

मातंगिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातंगिनी सर्ववशंकरी नमः स्वाहा ।
विस्फारिणी । कपालधरे ।  घोरे । घोरनादिनी । भूर शत्रून् विनाशिनी । उन्मादिनी ।
रोँ  रोँ रोँ  रीँ  ह्रीँ  श्रीँ  हसौः सौँ  वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ कति कति स्वाहा |

काहि काहि कालिके ।
शम्वरघातिनी, कामेश्वरी, कामिके, ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा ।

हृदयाये ॐ ह्रीँ  क्रीँ  मे स्वाहा ।

ठः ठः ठः क्रीँ  ह्रं  ह्रीँ  चामुण्डे हृदय जनाभिअसूनव ग्रस ग्रस दुष्टजनान् ।
अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नतस्तनेविष्टंभकारिणि । विघाधिके ।  श्मशानवासिनी । कलय कलय । विकलय विकलय । कालग्राहिके । सिँहे । दक्षिणकालिके । अनिरुद्दये । ब्रूहि ब्रूहि । जगच्चित्रिरे । चमत्कारिणी । हं कालिके ।  करालिके । घोरे । कह कह । तडागे । तोये । गहने । कानने । शत्रुपक्षे । शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि । अम्बिके । तुभ्यं कल विकलायै । बलप्रमथनायै । योगमार्ग गच्छ गच्छ ।  निदर्शिके । देहिनि । दर्शनं देहि देहि । मर्दिनि महिषमर्दिन्यै । स्वाहा ।

रिपुन्दर्शने द र्शय दर्शय । सिँहपूरप्रवेशिनि । वीरकारिणि । क्रीँ  क्रीँ  क्रीँ  हूं  हूं ह्रीँ  ह्रीँ फट् स्वाहा ।

शक्तिरुपायै ।  रोँ  वा गणपायै  । रोँ  रोँ  रोँ व्यामोहिनि । यन्त्रनिके । महाकायायै ।  प्रकटवदनायै । लोलजिह्वायै । मुण्डमालिनि । महाकालरसिकायै । नमो नमः ।
ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः ।
शत्रुविग्रहकलहान्त्रिपुरभोगिन्यै । विषज्वालामालिनी । तन्त्रनिके । मेधप्रभे । शवावतंसे । हंसिके । कालि कपालिनि । कुल्ले कुरुकुल्ले । चैतन्यप्रभे प्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ  ह्रीँ  रक्ष रक्ष । ज्वाला । प्रचण्ड । चण्डिके ।  शक्ति । मार्तण्ड ।  भैरवि ।  विप्रचित्तिके । विरोधिनि । आकर्णय आकर्णय । पिशिते । पिशितप्रिये । नमो नमः ।
खः खः खः मर्दय मर्दय । शत्रून् ठः ठः ठः । कालिकायै नमो नमः ।
ब्राम्हयै नमो नमः ।
माहेश्वर्यै नमो नमः ।
कौमार्यै नमो नमः ।
वैष्णव्यै नमो नमः ।
वाराह्यै नमो नमः ।
इन्द्राण्यै नमो नमः ।
चामुण्डायै नमो नमः ।
अपराजितायै नमो नमः ।
नारसिँहिकायै नमो नमः ।
कालि । महाकालिके । अनिरुध्दके । सरस्वति फट् स्वाहा ।

पाहि पाहि ललाटं । भल्लाटनी । अस्त्रीकले । जीववहे । वाचं रक्ष रक्ष । परविद्या क्षोभय क्षोभय । आकर्षय आकर्षय । कट कट । अमुकान मोहय मोहय  महामोहिनिके । चीरसिध्दके । कृष्णरुपिणी । अंजनसिद्धके ।  स्तम्भिनि । मोहिनि । मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।



  • 108 पाठ से लाभ मिलेगा |
  • चमेली के तेल का दीपक जलाएंगे । 
  • रात्रिकालीन साधना है |
  • दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए जाप करें 
  • काला वस्त्र तथा काले कंबल का आसन रहेगा । 

29 अगस्त 2026

तंत्र साधनाओं के लिए गुरु दीक्षा कैसे प्राप्त करें ?

  


मैंने देवी देवताओं तथा उनकी मंत्र साधना से संबन्धित कई लेख प्रकाशित किए हैं । जिन्हे पढ़कर कई पाठकों और पाठिकाओं ने साधना की है या करने की इच्छा व्यक्त की है । मैंने जो विधियाँ प्रकाशित की हैं, वे सरल हैं और उन्हे किसी भी आयु का स्त्री या पुरुष जो सनातन धर्म मे आस्था रखता हो वह सम्पन्न कर सकता है ।  

साधना के मार्ग मे गुरु दीक्षा का बड़ा महत्व होता है । गुरु की देह को गुरु मानने की गलती हम सभी कर बैठते हैं । वास्तव में गुरु के अंदर जो भगवान शिव का ज्ञान या जो शिव तत्व होता है, वही वास्तविक गुरु होता है । तंत्र के अधिपति भगवान शिव सभी साधनाओं के मूल हैं और वही मंत्रों और साधनाओं को शक्ति और चैतन्यता प्रदान करते हैं । 

इसे मैं एक सरल उदाहरण से समझाऊं तो मान लीजिए कि आप अपने घर में एक ट्यूबलाइट जलाना चाहते हैं । इसके दो तरीके हो सकते हैं । पहला तो यह कि आप अपना खुद का बिजली पैदा करने का कोई यंत्र या जनरेटर बना ले और उससे ट्यूबलाइट को जोड़ दें तो ट्यूब लाइट जलने लगेगी । खुद से मंत्र जाप करना कुछ कुछ वैसा ही है । जैसे-जैसे आप जाप करते जाते हैं धीरे-धीरे आपके अंदर ऊर्जा बनने लगती है या आपका खुद का जनरेटर चालू होने लगता है । जब उसकी बिजली पर्याप्त हो जाती है, तब ट्यूब लाइट जलता है । 

दूसरा तरीका यह है कि जो बिजली की सप्लाई लाइन आपके इलाके में आई हुई है, उसके तार से अपने घर में एक कनेक्शन ले ले । उस कनेक्शन के माध्यम से ट्यूबलाइट को जोड़ दें, तब भी वह ट्यूबलाइट चल जाएगी । गुरु दीक्षा कुछ-कुछ वैसा ही कनेक्शन है, जो आपकी ट्यूबलाइट को जल्दी चालू कर सकता है । 

जब आप किसी गुरु से दीक्षा लेते हैं, जो कि स्वयं सिद्ध हो, तो उसकी जो गुरु परंपरा होती है, वह पीछे की ओर जाने पर भगवान शिव से जाकर मिलती है । यानी यह समझ लीजिए कि मेन पावर स्टेशन पर जाकर मिलती है, जहां से सभी साधनाओं का प्रारंभ होता है । जब यह लिंक दीक्षा के माध्यम से जुड़ती है तो आपके अंदर जो शिव तत्व है, जो आपके मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के बीच में लगभग लिंग आकार स्वरूप में स्थित होता है, उसकी चैतन्यता बढ़ती है । उसी के माध्यम से मंत्रों की शक्ति जागृत होती है और आपको अपना अभीष्ट प्राप्त होता है ।

अब मन मे यह सवाल उठता है कि दीक्षा कैसे प्राप्त करें ? 

सबसे बढ़िया स्थिति तो यह है कि आप गुरु के पास जाकर दीक्षा प्राप्त करें !

उनके पास व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हो और उनसे निवेदन करके अपनी इच्छित दीक्षा प्राप्त करें !!

इसके लिए आप भोपाल मध्य प्रदेश जा सकते हैं, और गुरु माता डॉ.  साधना सिंह जी से दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं । 




साधना सिद्धि विज्ञान 
जास्मीन - 429
न्यू मिनाल रेजीडेंसी 
जे. के. रोड , भोपाल  [म.प्र.]


दूरभाष : (0755) --- 4269368,4283681,4221116

टेरो कार्ड रीडिंग सीखें : सुमन जी से



टैरो कार्ड रीडिंग वर्तमान ऊर्जा, अवचेतन मन की स्थिति और संभावित परिणामों को समझने का एक माध्यम है। यह मुख्य रूप से कार्ड पर बने प्रतीकों, चित्रों, रीडर के अंतर्ज्ञान के आधार पर वर्तमान स्थितियों का आकलन करने की एक प्रक्रिया है । इसे आप ज्योतिष की ही एक शाखा के रूप मे देख सकते हैं । 

सुमन जी पिछले कई वर्षों से कार्ड रीडिंग कर रही हैं । मैं उनके सौ से ज्यादा क्लाइंट्स के अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूँ कि, गुरुकृपा और महामाया के आशीर्वाद से उनकी रीडिंग काफी अच्छी है । 

अब उन्होंने कार्ड रीडिंग सिखाने का कार्य प्रारंभ किया है अगर आप इच्छुक हों तो जॉइन कर सकते हैं । अपनी अन्तः प्रेरणा को विकसित करने की विधियाँ सीख सकते हैं । निरंतर अभ्यास साधना के माध्यम से एक अच्छे कार्ड रीडर बन सकते हैं ।   



27 अगस्त 2026

चंद्रग्रहण : पति से संबंध अनुकूल बनाने का मंत्र

  

चंद्रग्रहण : पति से संबंध अनुकूल बनाने का मंत्र

यदि आपका पति आपसे विरक्त हो गया हो लगातार झगड़ा होता रहता हो  बेवजह दूरियां बन गई हो तो इस साधना से अनुकूलता मिलेगी |



विधि :-
कामिया सिन्दूर मिल जाये तो उसे सामने रख लें.
ना मिले तो जिस कुमकुम से आप बिंदी लगाती हैं वह ...... या फिर स्टिकर बिंदी का प्रयोग करती हैं तो स्टीकर बिंदी के पैकेट को अपने सामने लाल कपड़े में रख लेंगे । जाप करने के बाद उस लाल कपड़े में लपेटकर रख लेंगे अगले दिन फिर उसे खोल कर जाप करना है । यदि लाल कपडे में रखने में दिक्कत हो तो ऐसे भी पूजा स्थान में रखकर कर सकते हैं ,. 

अगर आपका कोई गुरु हो या किसी देवता को गुरु मानते हो तो उनके मंत्र का तीन बार जाप कर लें
यदि गुरु नहीं हो तो निम्नलिखित गुरु मंत्र का 3 बार जाप कर ले
ॐ श्री गुरु मण्डलाय नमः

इसके बाद अपने दाएं हाथ में एक चम्मच पानी रख लें और अपनी इच्छा (अर्थात मेरा और मेरे पति के बीच में संबंध अच्छा बना रहे ) ऐसी भावना करके उस जल को जमीन पर छोड़ देंगे

उसके बाद निम्नलिखित मंत्र का जाप करेंगे

"हथेली में हनुमन्त बसै, भैरु बसे कपार।

नरसिंह की मोहिनी, मोहे सब संसार।

मोहन रे मोहन्ता वीर, सब वीरन में तेरा सीर।

सबकी नजर बाँध दे, तेल सिन्दूर चढ़ाऊँ तुझे।

तेल सिन्दूर कहाँ से आया ?

कैलास-पर्वत से आया।

कौन लाया, अञ्जनी का हनुमन्त,गौरी का गनेश लाया।

काला, गोरा, तोतला-तीनों बसे कपार।

बिन्दा तेल सिन्दूर का, दुश्मन गया पाताल।

दुहाई कमिया सिन्दूर की, हमें देख शीतल हो जाए भरतार ।

सत्य नाम, आदेश गुरु की।


28 अगस्त 2026 को पूर्णिमा भी है चंद्र ग्रहण भी है उस दिन भी आप इसको १०८ बार या जितनी आपकी क्षमता हो उतनी बार कर सकते हैं . उसके बाद अगली पूर्णिमा तक इसे नित्य कम से कम ११ बार करें . 

इसके आलावा आप निम्नलिखित समय में भी इस कर सकते हैं ;-


.....1....
इस मन्त्र को रोज 11 बार जाप होलिका दहन की रात्रि से प्रारंभ कर रामनवमी तक करें ।

हनुमान जयंती वाले दिन हनुमान मंदिर में एक नारियल और 21 रुपये या जितनी आपकी शक्ति हो उतना चढ़ा दें ।

हनुमान जयंती के बाद किसी भी दिन से इसका टीका [बिंदी] लगाकर पति के पास जाएँ. मन में हमेशा भाव रखें कि सब अच्छा हो जाएगा ।

...,........2.....,
नित्य 108 जाप रोज  पूरी नवरात्री में करें . आखिरी दिन हनुमान मंदिर में एक नारियल और 21 रुपये या जितनी आपकी शक्ति हो उतना चढ़ा दें ।

इसका टीका [बिंदी] लगाकर पति के पास जाएँ. मन में हमेशा भाव रखें कि सब अच्छा हो जाएगा ।

.,........3......

यदि होली,नवरात्रि में ना कर पाएं तो किसी भी पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक रोज 11 बार जाप कर सकते हैं। आखिरी दिन हनुमान मंदिर में एक नारियल और 21 रुपये या जितनी आपकी शक्ति हो उतना चढ़ा दें ।
बिंदी या कुमकुम रखने में दिक्कत हो तो माता गौरी के भगवान शिव के साथ वाले स्वरूप का ध्यान करके जाप कर लेंगे । टीका या बिंदी लगाते समय इस मंत्र का जाप करते हुए टीका लगा लेंगे ।
.....,

ऐसा नित्य करें तो पति धीरे धीरे अनुकूल होने लगता है.

क्रोध करने से बचें और बेवजह का प्रलाप या बकवास ना करें

यह केवल आपके स्वयं के विवाहित पति के लिए काम करेगा .

प्रेमी के लिए काम नहीं करेगा .

चन्द्र ग्रहण में गुरु साधना

    



|| ॐ गुं गुरुभ्यो नमः ||

  • चन्द्र ग्रहण में गुरु साधना करनी चाहिये.जो दीक्षित हैं वे गुरु प्रदत्त गुरु मंत्र जाप करें 
  • अप्सरा साधना, लक्ष्मी साधना के लिये यह सबसे श्रेष्ठ मुहुर्त होता है.
  • सम्मोहन/वशीकरण साधना के लिये यह उपयुक्त समय होता है.

ग्रहण काल में किये गये मंत्र जाप का १००० गुना फ़ल मिलता है.

चन्द्र ग्रहण विशेष : आर्थिक लाभ हेतु शाबर मंत्र

  आर्थिक लाभ हेतु शाबर मंत्र 

शाबर मंत्र सामान्य जन की भाषा में लिखे हुए मंत्र होते हैं और उसमें व्याकरण की त्रुटि या शब्दों का अर्थ निकालने का प्रयास नहीं करना चाहिए और वे जैसे हैं वैसे ही पाठ कर लेना चाहिए ।
इसमें अलग-अलग स्रोतों के हिसाब से शब्दों में फर्क पड़ सकता है जो कि अलग-अलग साधकों के द्वारा अपने ढंग से प्रस्तुत किए जाते हैं लेकिन सभी सुखद परिणाम देते हैं।
पढ़ने में सरल होते हैं इसलिए कोई भी व्यक्ति से कर सकता है ।
इन मंत्रों का प्रयोग पुरुष या स्त्री कोई भी कर सकता है ।

मंत्र

ॐ नमो आदेश गुरु को |
नमो सिद्ध गणपति प्रसादात विघ्न हर्तुम गणपत गणपत वसो मसाण |
जो फल चाहूं सो फल आण , पञ्च लाडूँ , सिर सिन्दूर , रिद्धि सिद्धि आण |
गौरी का पुत्र सिंहासन बैठा |
राजा काम्पै प्रजा काम्पै दृष्टे राजा सिम चाम्पे| पञ्च कोष पूर्व पश्चिम से आण उत्तर से आण दक्षिण से आण |
इतनी कर रिद्धि सिद्धि मेरे घर द्वार आण|
राजा प्रजा अभी मेरो पड़े पाँव न पड़े तो लाजे मैया गौरी |
जो मै देखूं गणेश बाला कर मंत्र का सत की फट फट स्वाहा |


विधि

भोजपत्र पर इस मंत्र को लिख कर उसके सामने जाप करें
ग्रहण काल मे 108 बार जाप करें । ज्यादा कर पाएँ तो और अच्छा । 
जाप के समय गुग्गुल का धुप जलता रहे तो अच्छा है.
जाप के बाद ताबीज में भरकर पहन लें या धन रखने के स्थान में रख लें.
दूकान हो तो वहां गल्ले में भी रख सकते हैं.

चन्द्र ग्रहण :- देवराज इंद्रकृत सहस्राक्षरी लक्ष्मी स्तोत्र

  चन्द्र ग्रहण :- देवराज इंद्रकृत सहस्राक्षरी लक्ष्मी स्तोत्र





देवराज इंद्रकृत सहस्राक्षरी लक्ष्मी स्तोत्र अपने आप में अत्यंत ही प्रभावशाली तथा शीघ्र फलप्रदायक है.

यह स्तोत्र लक्ष्मी जी के यंत्र चित्र या मूर्ति के सामने करना चाहिए.

पहले लघु पूजन करें. तदुपरांत स्तोत्र का पाठ करें.

महालक्ष्मी पूजनः-


ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः गंधम समर्पयामि । (इत्र कुंकुम चढायें)

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः पुष्पम समर्पयामि । (फूल चढायें )

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः धूपम समर्पयामि । (अगरबत्ती दिखायें)

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः दीपम समर्पयामि । (दीपक दिखायें )

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यम समर्पयामि । (प्रसाद चढायें )


क्षमतानुसार 1,3,5,7,9,11,21,51 या 108 बार सहस्राक्षरी स्तोत्र मंत्र का पाठ करेंः-


(हाथ में जल लेकर)विनियोगः-

ऊँ अस्य श्री सर्व महाविद्या महारात्रि गोपनीय मंत्र रहस्याति रहस्यमयी पराशक्ति श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी सहस्राक्षरी सहस्र रूपिणि महाविद्याया श्री इंद्र ऋषिं गायत्रयादि नाना छंदांसि नवकोटि शक्तिरूपा श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी देवता श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी प्रसादादखिलेष्टार्थ (यहाँ अपनी मनोकामना बोल देंगे ) जपे पाठे विनियोगः । (जल जमीन पर छोड़ दें )

अपने हाथ मे एक पुष्प रखें ।

एक पाठ पूरा हो जाने पर उसे देवी के चरणों मे चढ़ा दें और उनकी कृपा प्राप्ति की प्रार्थना करें ।.


स्तोत्र मंत्र :-

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं हसौं श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं सौः सौः ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं जय जय महालक्ष्मी, जगदाद्ये,विजये सुरासुर त्रिभुवन निदाने दयांकुरे सर्व तेजो रूपिणी विरंचि संस्थिते, विधि वरदे सच्चिदानंदे विष्णु देहावृते महामोहिनी नित्य वरदान तत्परे महासुधाब्धि वासिनी महातेजो धारिणी सर्वाधारे सर्वकारण कारिणे अचिंत्य रूपे इंद्रादि सकल निर्जर सेविते सामगान गायन परिपूर्णोदय कारिणी विजये जयंति अपराजिते सर्व सुंदरि रक्तांशुके सूर्य कोटि संकाशे चंद्र कोटि सुशीतले अग्निकोटि दहनशीले यम कोटि वहनशीले ऊँकार नाद बिंदु रूपिणी निगमागम भाग्यदायिनी त्रिदश राज्य दायिनी सर्व स्त्री रत्न स्वरूपिणी दिव्य देहिनि निर्गुणे सगुणे सदसद रूप धारिणी सुर वरदे भक्त त्राण तत्परे बहु वरदे सहस्राक्षरे अयुताक्षरे सप्त कोटि लक्ष्मी रूपिणी अनेक लक्षलक्ष स्वरूपे अनंत कोटि ब्रहमाण्ड नायिके चतुर्विंशति मुनिजन संस्थिते चतुर्दश भुवन भाव विकारिणे गगन वाहिनी नाना मंत्र राज विराजिते सकल सुंदरी गण सेविते चरणारविंद्र महात्रिपुर सुंदरी कामेश दायिते करूणा रस कल्लोलिनी कल्पवृक्षादि स्थिते चिंतामणि द्वय मध्यावस्थिते मणिमंदिरे निवासिनी विष्णु वक्षस्थल कारिणे अजिते अमले अनुपम चरिते मुक्तिक्षेत्राधिष्ठायिनी प्रसीद प्रसीद सर्व मनोरथान पूरय पूरय सर्वारिष्टान छेदय छेदय सर्वग्रह पीडा ज्वराग्र भय विध्वंसय विध्वंसय सर्व त्रिभुवन जातं वशय वशय मोक्ष मार्गाणि दर्शय दर्शय ज्ञानमार्ग प्रकाशय प्रकाशय अज्ञान तमो नाशय नाशय धनधान्यादि वृद्धिं कुरूकुरू सर्व कल्याणानि कल्पय कल्पय माम रक्ष रक्ष सर्वापदभ्यो निस्तारय निस्तारय वज्र शरीरं साधय साधय ह्रीं सहस्राक्षरी सिद्ध लक्ष्मी महाविद्यायै नमः ।


इसे आप चन्द्र ग्रहण/शरद पूर्णिमा/दीपावली/पूर्णिमा/ या किसी भी दिन कर सकते हैं । 

22 अगस्त 2026

बालकों के डरने से बचाव मे सहायक : छह मुखी रुद्राक्ष

  

  1. बालकों को नींद मे घबराकर उठने की दिक्कत हो या बेवजह डरता हो तो यह रुद्राक्ष सहायक होता है । 
  2. छह मुखी रुद्राक्ष साक्षात् कार्तिकेय भगवान् का प्रतीक है.
  3. यह शत्रुओं के निवारण के लिए अति लाभ दायक होने के कारण शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहलाता है .

इसके लिए निर्धारित शुल्क दो सौ पचास रुपये [जिसमे रुद्राक्ष का मूल्य, पूजन सामग्री का व्यय, पूजन शुल्क, पेकेजिंग तथा पोस्टेज व्यय शामिल है ] भेजकर आप इसे प्राप्त कर सकते हैं ।
शुल्क आप फोन पे, पे टी एम, गूगल पे, भीम पे से मेरे मोबाइल नंबर पर भेज सकते हैं :-
मेरा मोबाइल नंबर - 7000630499

इस क्यूआर कोड से भी भेज सकते हैं 





छह मुखी रुद्राक्ष प्राप्त करने के लिए मुझे निम्नलिखित चीजें इस नंबर पर व्हाट्सप्प कर देंगे :-

१) निर्धारित शुल्क के ऑनलाइन पेमेंट की रसीद ।
२) बच्चे का नाम , जन्म तिथि,स्थान,समय ।[ यदि मालूम हो ]
३) गोत्र (यदि मालूम हो )
४) बच्चे की ताजा फोटो जिसमे  चेहरा और आँखें स्पष्ट दिखती हों । चश्मा लगाते हों तो बिना चश्मे के फोटो भेजेंगे । यह फोटो उसके प्रतीक रूप में पूजन के समय रखी जाएगी . 
५) आपका पूरा पोस्टल एड्रेस पिन कोड सहित भेजेंगे । साथ मे वह मोबाइल नंबर भी भेजेंगे जिसपर पोस्टमेन आवश्यकता पड़ने पर आपसे पार्सल की डिलिवरी के समय संपर्क कर सके ।

19 अगस्त 2026

रुद्राष्टकम

   रुद्राष्टकम



नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरूपम्।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्॥


निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।

करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्॥


तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥


चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम्।

मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि॥



प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्।

त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥


कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥


न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।

न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥


न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्।

जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥



रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥


18 अगस्त 2026

सर्व बाधा निवारक : सदाशिव रक्षा कवच

      सर्व बाधा निवारक : सदाशिव रक्षा कवच 




[प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय सदगुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी]

ॐ नमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्वात्मकाय सर्वमन्त्रस्वरूपाय सर्वयन्त्राधिष्ठिताय सर्वतन्त्रस्वरूपाय सर्वतत्वविदूराय ब्रह्मरुद्रावतारिणे नीलकण्ठाय पार्वतीमनोहरप्रियाय सोमसूर्याग्निलोचनाय भस्मोद्धूलितविग्रहाय महामणि मुकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय सृष्टिस्थितिप्रलयकाल- रौद्रावताराय दक्षाध्वरध्वंसकाय महाकालभेदनाय मूलधारैकनिलयाय तत्वातीताय गङ्गाधराय सर्वदेवाधिदेवाय षडाश्रयाय वेदान्तसाराय त्रिवर्गसाधनाय अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय अनन्त वासुकि तक्षक- कर्कोटक शङ्ख कुलिक- पद्म महापद्मेति- अष्टमहानागकुलभूषणाय प्रणवस्वरूपाय चिदाकाशाय आकाश दिक् स्वरूपाय ग्रहनक्षत्रमालिने सकलाय कलङ्करहिताय सकललोकैककर्त्रे सकललोकैकभर्त्रे सकललोकैकसंहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवेदान्तपारगाय सकललोकैकवरप्रदाय सकललोकैकशङ्कराय सकलदुरितार्तिभञ्जनाय सकलजगदभयङ्कराय शशाङ्कशेखराय शाश्वतनिजवासाय निराकाराय निराभासाय निरामयाय निर्मलाय निर्मदाय निश्चिन्ताय निरहङ्काराय निरङ्कुशाय निष्कलङ्काय निर्गुणाय  निष्कामाय निरूपप्लवाय निरुपद्रवाय निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय निरातङ्काय निष्प्रपञ्चाय निस्सङ्गाय निर्द्वन्द्वाय निराधाराय नीरागाय निष्क्रोधाय निर्लोपाय निष्पापाय निर्भयाय निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियाय निस्तुलाय निःसंशयाय निरञ्जनाय निरुपमविभवाय नित्यशुद्धबुद्धमुक्तपरिपूर्ण- सच्चिदानन्दाद्वयाय परमशान्तस्वरूपाय परमशान्तप्रकाशाय तेजोरूपाय तेजोमयाय तेजो‌sधिपतये जय जय रुद्र महारुद्र महारौद्र भद्रावतार महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वाङ्ग चर्मखड्गधर पाशाङ्कुश- डमरूशूल चापबाणगदाशक्तिभिन्दिपाल- तोमर मुसल मुद्गर पाश परिघ- भुशुण्डी शतघ्नी चक्राद्यायुधभीषणाकार- सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदन विकटाट्टहास विस्फारित ब्रह्माण्डमण्डल नागेन्द्रकुण्डल नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्रचर्मधर नागेन्द्रनिकेतन मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्वरूप विरूपाक्ष विश्वेश्वर वृषभवाहन विषविभूषण विश्वतोमुख सर्वतोमुख माम# रक्ष रक्ष ज्वलज्वल प्रज्वल प्रज्वल महामृत्युभयं शमय शमय अपमृत्युभयं नाशय नाशय रोगभयम् उत्सादयोत्सादय विषसर्पभयं शमय शमय चोरान् मारय मारय मम# शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय त्रिशूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खड्गेन छिन्द्दि छिन्द्दि खट्वाङ्गेन विपोधय विपोधय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय बाणैः सन्ताडय सन्ताडय यक्ष रक्षांसि भीषय भीषय अशेष भूतान् विद्रावय विद्रावय कूष्माण्डभूतवेतालमारीगण- ब्रह्मराक्षसगणान् सन्त्रासय सन्त्रासय मम# अभयं कुरु कुरु मम# पापं शोधय शोधय वित्रस्तं माम्# आश्वासय आश्वासय नरकमहाभयान् माम्# उद्धर उद्धर अमृतकटाक्षवीक्षणेन माम# आलोकय आलोकय सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृष्णार्तं माम्# आप्यायय आप्यायय दुःखातुरं माम्# आनन्दय आनन्दय शिवकवचेन माम्# आच्छादय आच्छादय हर हर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक सदाशिव परमशिव नमस्ते नमस्ते नमः ॥
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विधि :-
  1. भस्म से  माथे पर  तीन लाइन वाला तिलक त्रिपुंड बनायें.
  2. हाथ में पानी लेकर भगवान  शिव से रक्षा की प्रार्थना करें , जल छोड़ दें.
  3. एक माला गुरुमंत्र की करें . अगर गुरु न बनाया हो तो भगवान् शिव को गुरु मानकर "ॐ नमः शिवाय" मन्त्र का जाप कर लें.
  4. यदि अपने लिए पाठ नहीं कर रहे हैं तो # वाले जगह पर उसका नाम लें जिसके लिए पाठ कर रहे हैं |
  5. रोगमुक्ति, बधामुक्ति, मनोकामना के लिए ११ पाठ ११ दिनों तक करें . अनुकूलता प्राप्त होगी.
  6. रक्षा कवच बनाने के लिए एक पंचमुखी रुद्राक्ष ले लें. उसको दूध,दही,घी,शक्कर,शहद,से स्नान करा लें |अब इसे गंगाजल से स्नान कराकर बेलपत्र चढ़ाएं | ५१ पाठ शिवरात्रि/होली/अष्टमी/अमावस्या/नवरात्री/दीपावली/दशहरा/ग्रहण कि रात्रि करें पाठ के बाद इसे धारण कर लें |


17 अगस्त 2026

अभिमंत्रित पारद शिवलिंग

     पारद शिवलिंग के विषय मे कहा गया है कि,

मृदः कोटि गुणं स्वर्णम, स्वर्णात्कोटि गुणं मणिः
 मणेः कोटि गुणं बाणो, बाणात्कोटि गुणं रसः
रसात्परतरं लिंगं   भूतो भविष्यति
अर्थात मिटृी से बने शिवलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल 
सोने से बने शिवलिंग के पूजन से
स्वर्ण से करोड गुणा ज्यादा फल 
मणि से बने शिवलिंग के पूजन से, 
मणि से करोड गुणा ज्यादा फल 
बाणलिंग के पूजन से 
तथा 
बाणलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल 
रस अर्थात पारे से बने शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है।


आज तक पारे से बने शिवलिंग से श्रेष्ठ शिवलिंग तो बना है और ही बन सकता है। 


पारद शिवलिंग घर मे पॉज़िटिव एनर्जी लाता है और उसके घर मे रहने से तंत्र बाधा तथा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा भी करता है । 

पारद काफी महंगा होता है । जो लगभग 25 हजार से 40 हजार रुपये किलो मे आता है । 


काफी पाठकों ने पारद शिवलिंग के विषय मे जिज्ञासा दिखाई थी । इसे देखते हुये कुछ छोटे पारद शिवलिंग जो 20 से 25 ग्राम के बीच हैं वे आपके नाम से पूजन आदि करके आपको लगभग 1100 रुपये मे उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर रहा हूँ । अगर आप इच्छुक हैं तो  निम्नलिखित जानकारियाँ मुझे मेरे नंबर 7000630499 पर शुल्क के साथ व्हात्सप्प कर सकते हैं :-

नाम , 
जन्म तिथि, समय स्थान ,गोत्र (मालूम हो तो )  । 
अपनी एक ताजा फोटो । 
शुल्क फोन पे करने के बाद उसकी रसीद । 
अपना पूरा पोस्टल एड्रेस और मोबाइल नंबर । 

शुल्क पेमेंट के लिए किसी भी यूपीआई एप्प जैसे फोन पे पर इस क्यूआर कोड़ का प्रयोग कर सकते हैं । 



16 अगस्त 2026

नाग पंचमी : सर्प दोष निवारण का मुहूर्त

  नाग पंचमी : सर्प दोष निवारण का मुहूर्त


अधिकांश जातक अपनी कुंडली में कालसर्प दोष को लेकर चिंतित रहते हैं और उसके निवारण का उपाय खोजते रहते हैं ।
कालसर्प दोष पिछले कुछ समय से बहुत ज्यादा प्रचार में आया है और इसके नाम पर कई प्रकार के पूजन अनुष्ठान भी प्रचलित है ।
बैंगलोर के प्रख्‍यात ज्‍योतिषी वेंकट रमन ने ज्‍योतिषीय योगों पर किए अपने अध्‍ययन में पाया, कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में कहीं भी कालसर्प योग का उल्‍लेख नहीं है। केवल एक जगह एक सामान्‍य सर्प योग के बारे में जानकारी है ।

प्राचीन ग्रंथों में इतना ही बताया गया है कि राहू और केतु के मध्‍य सभी ग्रह होने पर सर्प योग बनता है।  मेष में राहू है और तुला में केतु इसके साथ सारे ग्रह मेष से तुला या तुला से मेष के बीच हों तो इसे सर्प योग कहा जाएगा।

कालसर्प योग के विषय में यह कहा जाता है कि राहु और केतु के मध्य सभी 7 ग्रहों के आने से कालसर्प योग बनता है। जब राहु से केतु के मध्य अन्य ग्रह होते हैं तो उदित और जब केतु से राहु के मध्य ग्रह होते हैं तो अनुदित काल सर्प योग की रचना होती है।
कुछ ज्योतिषियों के अनुसार यह भी एक ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि सूर्य की गति के कारण कालसर्प योग कभी भी 6 माह से अधिक अवधि के लिए नहीं आता है। इस 6 माह में भी चंद्रमा की गति के कारण 2 सप्ताह यह योग रहता है और 2 सप्ताह नहीं रहता है, जबकि कभी चंद्रमा धुरी से बाहर हो जाता है तो आंशिक कालसर्प योग होता है।

इस विषय पर ज्योतिषियों के बीच में मत भिन्नता रही है । पिछली सदी के प्रसिद्ध ज्योतिषी स्वर्गीय डॉक्टर बीवी रमन, ने कालसर्प योग को सिरे से नकार दिया था। वह 60 वर्ष तक एस्ट्रोलॉजिकल-मैगजीन के संपादक रहे थे।

खैर....... 

जब कालसर्प योग को ज्योतिषियों ने मानना शुरु कर दिया तो इस कालसर्प योग पर आधारित कई ज्योतिषीय किताबें भी प्रकाशित हुईं । इनमें कालसर्प दोष की व्याख्या करते हुए इसे 12 तरह का बताया गया।

जो कि क्रमशः अनन्‍त, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर और शेषनाग नाम के कालसर्प योग हैं।

कालसर्प योग जिस व्यक्ति की कुंडली में रहता है वह अपने भविष्य को लेकर इस प्रकार से चिंतित रहता है जैसे उसे किसी सांप ने डस लिया हो या किसी अजगर ने उसे चारों तरफ से घेर लिया ।

कई बार उनके इस डर का श्रेय उन ज्योतिषियों को भी जाता है जो कालसर्प दोष के नाम पर जातक को डराने में किसी प्रकार की कमी नहीं रखते । जो व्यक्ति किसी समस्या से पीड़ित रहता है वह यह सारी बातें सुनकर बुरी तरह प्रभावित और भयभीत हो जाता है । उसे लगता है कि यह कालसर्प दोष ही सारी समस्या की जड़ में है ......
वास्तव में कालसर्प योग कई प्रकार की सफलताओं को भी प्रदान करने वाला भी माना गया है । अनेक विश्व विख्यात और सफल व्यक्तियों के जीवन में कालसर्प योग मौजूद रहा है ।
विख्यात ज्योतिषी के एन राव के अनुसार मुगल सम्राट अकबर, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंग्लैंड की प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर, अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को काल सर्प दोष था, लेकिन इन्होंने सफलता के नए सोपान अर्जित किए।

ग्वालियर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य सीताराम सिंह ने स्व. विजयाराजे सिंधिया की जन्मकुंडली का विश्लेषण करते हुए एक लेख में लिखा है कि उनकी कुंडली में महापदम नामक कालसर्प योग था । जिसके कारण वह जनता की परमप्रिय नेता बनीं । स्व. धीरूभाई अंबानी की कुंडली में वासुकी नामक कालसर्प योग था । इसमें ग्रहों की दशा के कारण गजकेसरी योग बना । फिल्म अभिनेता रजनीकांत की कुंडली में भी कर्कोटक नामक कालसर्प दोष है । वह आज दक्षिणी फिल्म जगत में सुप्रसिद्व सुपरस्टार हैं।

आचार्य किशोर यश शर्मा ने अपने एक लेख में उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की कुंडली का विशलेषण करते हुए लिखा है कि उनकी कुंडली में कालसर्प दोष था, जिसमें उनके ग्रहों की दशा के कारण राजयोग बना और वह उत्तरप्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री बन गईं ।

अब आप अपने विवेक से कालसर्प दोष के अच्छा या बुरा होने या ना होने पर निर्णय ले सकते हैं ।

सर्प दोष के निवारण के लिए नागपंचमी को एक श्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है । यदि आपको स्वप्न में बार-बार सर्प दिखाई देते हो और आपको इससे डर लगता हो तो इस अवसर पर निम्नलिखित पूजन संपन्न कर सकते हैं । पूजन आपको सर्प की प्रसन्नता प्रदान करने वाले हैं ।

सर्प सूक्त के विषय में मैंने पहले लिखा है आप उसका पाठ नागपंचमी के दिन कर सकते हैं । यह पाठ आप एक बार या एक से अधिक बार अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार कर सकते हैं ।


नाग पंचमी के दिन आप किसी ऐसे शिव मंदिर में जहां पर शिवलिंग के ऊपर नाग ना बना हो वहां पर नाग का दान कर सकते हैं यह भगवान शिव और सर्प दोनों की कृपा प्रदायक है ।

यदि आप दान आदि में विश्वास रखते हैं तो किसी गरीब ब्राह्मण को चांदी का बना हुआ सांप का जोड़ा भी दान कर सकते हैं ।

यदि दान पर आपका विश्वास नहीं है तो तांबे या चांदी से बना हुआ सर्प का जोड़ा आप किसी शिव मंदिर में या नाग देवता के मंदिर में अर्पित कर सकते हैं , यदि यह दोनों उपलब्ध नहीं हो तो आप किसी नदी या तालाब में भी इसे प्रवाह दे सकते हैं इससे भी आपको अनुकूलता प्राप्त होगी ।



महा मृत्युंजय स्तॊत्रं

    



महामृत्युंजय स्तोत्र

मार्कण्डेय मुनि द्वारा वर्णित “महामृत्युंजय स्तोत्र” मृत्यु के भय को मिटाने वाला स्तोत्र है । 

इसका आप नित्य पाठ कर सकते हैं । 


ॐ रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकंठमुमापतिम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १ ॥


नीलकंठं कालमूर्तिं कालज्ञं कालनाशनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ २ ॥


नीलकंठं विरूपाक्षं निर्मलं निलयप्रदम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ३ ॥


वामदॆवं महादॆवं लॊकनाथं जगद्गुरुम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ४ ॥


दॆवदॆवं जगन्नाथं दॆवॆशं वृषभध्वजम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ५ ॥

गंगाधरं महादॆवं सर्पाभरणभूषितम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ६ ॥


त्र्यक्षं चतुर्भुजं शांतं जटामुकुटधारणम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ७ ॥


भस्मॊद्धूलितसर्वांगं नागाभरणभूषितम्‌ ।

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ८ ॥


अनंतमव्ययं शांतं अक्षमालाधरं हरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ९ ॥


आनंदं परमं नित्यं कैवल्यपददायिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १० ॥


अर्धनारीश्वरं दॆवं पार्वतीप्राणनायकम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ११ ॥


प्रलयस्थितिकर्तारं आदिकर्तारमीश्वरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १२ ॥


व्यॊमकॆशं विरूपाक्षं चंद्रार्द्ध कृतशॆखरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १३ ॥


गंगाधरं शशिधरं शंकरं शूलपाणिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १४ ॥


अनाथं परमानंदं कैवल्यपददायिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १५ ॥


स्वर्गापवर्ग दातारं सृष्टिस्थित्यांतकारिणम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १६ ॥


कल्पायुर्द्दॆहि मॆ पुण्यं यावदायुररॊगताम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १७ ॥


शिवॆशानां महादॆवं वामदॆवं सदाशिवम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १८ ॥


उत्पत्ति स्थितिसंहार कर्तारमीश्वरं गुरुम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १९ ॥


फलश्रुति

मार्कंडॆय कृतं स्तॊत्रं य: पठॆत्‌ शिवसन्निधौ । 

तस्य मृत्युभयं नास्ति न अग्निचॊरभयं क्वचित्‌ ॥ २० ॥


शतावृतं प्रकर्तव्यं संकटॆ कष्टनाशनम्‌ । 

शुचिर्भूत्वा पठॆत्‌ स्तॊत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम्‌ ॥ २१ ॥


मृत्युंजय महादॆव त्राहि मां शरणागतम्‌ । 

जन्ममृत्यु जरारॊगै: पीडितं कर्मबंधनै: ॥ २२ ॥


तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्व च्चित्तॊऽहं सदा मृड । 

इति विज्ञाप्य दॆवॆशं त्र्यंबकाख्यममं जपॆत्‌ ॥ २३ ॥


नम: शिवाय सांबाय हरयॆ परमात्मनॆ । 

प्रणतक्लॆशनाशाय यॊगिनां पतयॆ नम: ॥ २४ ॥



॥ इति श्री मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं संपूर्णम्‌ ॥


10 अगस्त 2026

सर्वरोग निवारक गोपनीय महामृत्युंजय मंत्र

 ||ॐ त्रयम्बकं यजामहे उर्वा रुकमिव स्तुता वरदा प्रचोदयंताम आयु: प्राणं प्रजां पशुं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्वा व्रजम ब्रह्मलोकं  ||


  • इस मंत्र के उच्चारण करने या श्रवण करने से समस्त बिमारियों में लाभ होता है .
  • क्षमतानुसार जाप करें.

9 अगस्त 2026

पाशुपत मंत्र

 पाशुपत मंत्र


पशुपति अर्थात पशुओं के पति....

जो पशुओं को नियंत्रित करने की क्षमता रखते हैं... 

जो अनियंत्रित पशुओं को भी नियंत्रित करने की क्षमता रखते हैं .... 

आपने चरवाहों को देखा होगा...  
गायों के और भैंसों के झुंड भी आपने देखे होंगे…

इसमें से बहुत सारे नियंत्रित होते हैं और कुछ एक ऐसे होते हैं जो अनियंत्रित होते हैं …

अपनी अलग ही चाल में चलते हैं.....

उनको नियंत्रित करने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति ही एक अच्छा चरवाहा अर्थात पशुपति बन सकता है..... 

यह संपूर्ण सृष्टि भी पशुओं से भरी हुई है.....
जिसमें सबसे विकसित पशु मनुष्य है......
अमीबा से लेकर वायरस तक सब कुछ एक किस्म का पशु ही है... 
इन सब के अधिपति इन सब को नियंत्रित करने की क्षमता रखने वाले है ..... 
पशुपति.... 
अर्थात भगवान शिव.....

उनका सबसे तेजस्वी मंत्र है पाशुपत मंत्र 

यह एक ऐसा मंत्र है जो सभी प्रकार के अनियंत्रित स्थितियों को नियंत्रित करने में मदद करता है....

विपरीत परिस्थिति में अनुकूलता लाने के लिए…
अपने परिवार की रक्षा के लिए.....
अपने समाज की रक्षा के लिए..... 
अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए..... 
मानवता की रक्षा के लिए.... 
आप पाशुपत मंत्र का प्रयोग कर सकते हैं..... 



मैं आगे की पंक्तियों में गुरुदेव  सुदर्शन नाथ जी के द्वारा प्रदान किए गए पाशुपत मंत्र का विवरण दे रहा हूं।  यह मंत्र भगवान शिव के स्वरूप आदि शंकराचार्य के द्वारा भगवान पशुपति की आराधना के लिए प्रयुक्त हुआ था .... इसलिए यह बेहद प्रभावशाली और शक्तिशाली मंत्र है । यह शिव के अवतार द्वारा अपने मूल स्वरूप को प्रसन्न करने और जागृत करने के लिए प्रयुक्त हुआ था ॥ 
यह एक ऐसा अचूक मंत्र है जो सभी प्रकार के संकटों से रक्षा करने में सहायक है.... 

इस मंत्र का जाप आप स्वयं कर सकते हैं । आपकी पत्नी कर सकती है, आपके बच्चे कर सकते हैं । आप इस मंत्र को उन सभी को बता सकते हैं जो भगवान शिव पर और सनातन धर्म में आस्था रखते हो और अपने परिवार तथा राष्ट्र की रक्षा के प्रति जागरूक हो.... 


पाशुपत मंत्र :- 
॥ ॐ श्लीं पशुं हुं फट ॥ 

इसका उच्चारण होगा :- 
( ॐ श्लीम पशुम हुम फट) 
(om shleem pashum hoom fat)

विधि :-
  • मंत्र जाप से पहले 3 या 11, 21,51 या 108 बार गुरु मंत्र का उच्चारण कर ले । 
॥ ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ॥ 
यदि आपने गुरू  बनाया हो और उन्होंने आपको कोई मंत्र दिया हो तो आप उस मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं । 
  • इसके बाद आप पशुपत मंत्र का जितना आपकी शक्ति हो उतना जाप करें ।
  • पशुपति मंत्र के जाप के लिए किसी प्रकार के आयु, जाति ,लिंग, का बंधन नहीं है।
  • भगवान पशुपति का मंत्र होने के कारण इसमें स्थान, आसन, समय, दिशा, वस्त्र आदि का बंधन भी नहीं है । अर्थात आप इस मंत्र को चलते-फिरते भी जप सकते हैं । 
  • इसका जाप आप पूजन कक्ष में बैठकर भी कर सकते हैं । नदी तट पर बैठकर भी कर सकते हैं । इसे आप मंदिर में बैठकर जप सकते हैं तो अपने ड्राइंग रूम में बैठकर भी जप सकते हैं । इसका जाप आप अपने कार्यस्थल में, अपने ऑफिस में ,अपनी रसोई में, कहीं भी कर सकते हैं, 
  • शर्त यही है कि आपकी आस्था देवाधिदेव महादेव पर हो,  बाकी वह देख लेंगे।