एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
Disclaimer
20 सितंबर 2024
पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा
पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा
श्राद्ध पक्ष में यथा सम्भव जाप करें ।
॥ ऊं सर्व पितरेभ्यो, मम सर्व शापं प्रशमय प्रशमय, सर्व दोषान निवारय निवारय, पूर्ण शान्तिम कुरु कुरु नमः ॥
पितृमोक्ष अमावस्या के दिन एक थाली में भोजन सजाकर सामने रखें।
108 बार जाप करें |
सभी ज्ञात अज्ञात पूर्वजों को याद करें , उनसे कृपा मागें |
ॐ शांति कहते हुए तीन बार पानी से थाली के चारों ओर गोल घेरा बनायें।
अपने पितरॊं को याद करके ईस थाली को गाय कॊ खिला दें।
इससे पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा आपकॊ प्राप्त होगी ।
पितृ स्तोत्र (गरुड पुराण)
पितृ स्तोत्र (गरुड पुराण)
अमूर्त्तानां च मूर्त्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम !
इंद्रादीनां च नेतारो दक्षमारी चयोस्तथा !!
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान नमस्यामि कामदान !
मन्वादीनां मुनींद्राणां सूर्य्यांचंद्रमसो तथा !!
तान नमस्यामि अहं सर्व्वान पितरश्च अर्णवेषु ये !
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वायु अग्नि नभ तथा !!
द्यावा पृथ्वीव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलि: !
देवर्षिणां ग्रहाणां च सर्वलोकनमस्कृतान !!
अभयस्य सदा दातृन नमस्येहं कृतांजलि:
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ! !
स्वयंभुवे नमस्यामि ब्रम्हणे योग चक्षुषे !
सोमाधारान पितृगणान योगमूर्तिधरांस्तथा !!
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम !
अग्निरुपां तथैव अन्यान नमस्यामि पितृं अहं !!
अग्निसोममयं विश्वं यत एदतशेषत:
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्य्याग्निमूर्तय:!!
जगत्स्वरुपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरुपिण:
तेभ्यो अखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानसा: !
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदंतु स्वधाभुज: !!
आप इसका उच्चारण आडिओ मे यहाँ सुन सकते हैं ।
इसे सुनकर उच्चारण करने से धीरे धीरे धीरे गुरुकृपा से आपका उच्चारण स्पष्ट होता जाएगा :-
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अगर आपको संस्कृत में उच्चारण करने में दिक्कत हो तो आप इसका भावार्थ हिंदी में भी उच्चरित कर सकते हैं जो कि निम्नानुसार है
जो अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।
इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नायक हैं, सभी कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।
मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी प्रणाम करता हूँ।
नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो प्रमुख हैं, उन पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ।
देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता, पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ।
प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा प्रणाम करता हूँ।
सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।
चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ।
सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।
अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।
जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ।
समस्त पितरो को मैं बारम्बार नमस्कार करता हुआ उनकी कृपा का आकांक्षी हूं ।
वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों। वह मुझ पर कृपालु हो और मेरे समस्त दोषों का प्रशमन करते हुए मुझे सर्व विध अनुकूलता प्रदान करें ....
विधि :-
एक थाली में भोजन तैयार करके रख ले तथा स्तोत्र का यथाशक्ति (1,3,7,9,11) पाठ करके किसी गाय को या किसी गरीब व्यक्ति को खिला दे ।
13 सितंबर 2024
गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी : एक प्रचंड तंत्र साधक
गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी : एक प्रचंड तंत्र साधक
साधना का क्षेत्र अत्यंत दुरुह तथा जटिल होता है. इसी लिये मार्गदर्शक के रूप में गुरु की अनिवार्यता स्वीकार की गई है.
गुरु दीक्षा प्राप्त शिष्य को गुरु का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है.
बाहरी आडंबर और वस्त्र की डिजाइन से गुरू की क्षमता का आभास करना गलत है.
एक सफ़ेद धोती कुर्ता पहना हुआ सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति भी साधनाओं के क्षेत्र का महामानव हो सकता है यह गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी से मिलकर मैने अनुभव किया.
भैरव साधना से शरभेश्वर साधना तक.......
कामकला काली से लेकर त्रिपुरसुंदरी तक .......
अघोर साधनाओं से लेकर तिब्बती साधना तक....
महाकाल से लेकर महासुदर्शन साधना तक सब कुछ अपने आप में समेटे हुए निखिल तत्व के जाज्वल्यमान पुंज स्वरूप...
गुरुदेव स्वामी सुदर्शननाथ जी
महाविद्या त्रिपुर सुंदरी के सिद्धहस्त साधक हैं.वर्तमान में बहुत कम महाविद्या सिद्ध साधक इतनी सहजता से साधकों के मार्गदर्शन के लिये उपलब्ध हैं.
आप चाहें तो उनसे संपर्क करके मार्गदर्शन ले सकते हैं :-
साधना सिद्धि विज्ञान
जास्मीन - 429
न्यू मिनाल रेजीडेंसी
जे. के. रोड , भोपाल [म.प्र.]
दूरभाष : (0755)
4269368,4283681,4221116
वेबसाइट:-
यूट्यूब चेनल :-
https://www.youtube.com/@MahavidhyaSadhakPariwar
7 सितंबर 2024
श्री विघ्नराज गणपति का हवन
गणपति विसर्जन से पहले सबकी इच्छा होती है कि गणपति हवन हो जाता तो अच्छा होता |
यदि किसी कारणवश आप किसी साधक /पंडित से हवन ना करवा सकें तो आपके लिए एक सरल हवन विधान प्रस्तुत है जो आप आसानी से स्वयम कर सकते हैं ।
किसी कुंड या बर्तन मे आप लकड़ी डालकर आग जला लें । बर्तन या कुंड को ईंट या रेत के ऊपर रखें
ऊं अग्नये नमः ।
7 बार इस मन्त्र का जाप करें तथा आग जला लें ।
ऊं परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।
21 बार इस मन्त्र का जाप करें ।
अग्नि जल जाए तब घी/ दशांग (हवन सामग्री ) से आहुति डालें |
ऊं अग्नये स्वाहा ......
7 आहुति अग्नि मे डालें
ऊं गं स्वाहा .....
1 आहुति अग्नि मे डालें
ऊं भैरवाय स्वाहा .....
11 आहुति अग्नि मे डालें
ऊं परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः स्वाहा .....
21 आहुति अग्नि मे डालें
ॐ प्रचंड चंडिकायै स्वाहा –
9 बार अपने मस्तक को स्पर्श करते हुए आहुति डालें ।
अब अपनी मनोकामना भगवान् गणपति के समक्ष निवेदन मन में या बोलकर करें
ऊं गं गणपतये स्वाहा .....
108 बार ह्रदय को स्पर्श करते हुए आहुति डालें
अन्त में कहें कि गणपति भगवान की कृपा मुझे प्राप्त हो....
दोनों कान पकड़कर सभी गलतियों के लिये क्षमा मांगे.....
तीन बार पानी छिडककर शांति शांति शांति ऊं कहें.....
संभव हो तो किसी गरीब बच्चे को भोजन/मिठाई/दान अवश्य दें
6 सितंबर 2024
लघु गणेश पूजन
लघु गणेश पूजन
यह एक छोटा गणेश भगवान का पूजन है जिसे आप लगभग 10 मिनट मे सम्पन्न कर सकते हैं
पहले गुरु स्मरण ,गणेश भैरव महालक्ष्मी स्मरण करे ..
ॐ गुं गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ भ्रम भैरवाय नमः
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः
अब आप 4 बार आचमन करे दाए हाथ में पानी लेकर पिए
गं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं शिव तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
अब आप घंटा नाद करे और उसे पुष्प अक्षत अर्पण करे
घंटा देवताभ्यो नमः
अब आप जिस आसन पर बैठे है उस पर पुष्प अक्षत अर्पण करे
आसन देवताभ्यो नमः
अब आप दीपपूजन करे उन्हें प्रणाम करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे
दीप देवताभ्यो नमः
अब आप कलश का पूजन करे ..उसमेगंध ,अक्षत ,पुष्प ,तुलसी,इत्र ,कपूर डाले ..उसे तिलक करे .
कलश देवताभ्यो नमः
अब आप अपने आप को तिलक करे
फिर संक्षिप्त गुरु पुजन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: ।
ॐ परम गुरुभ्यो नम: ।
ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम: ।
उसके बाद गणपति का ध्यान करे
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येशु सर्वदा
उनका आह्वान करें अर्थात बुलाएं
श्री महागणपति आवाहयामि
मम पूजन स्थाने रिद्धि सिद्धि सहित शुभ लाभ सहित स्थापयामि नमः
उनका स्वागत करें , फूल आदि चढ़ाएं
त्वां चरणे गन्धाक्षत पुष्पं समर्पयामि ।
पंचोपचार पूजन करें
ॐ गं " लं" पृथ्वी तत्वात्मकं गंधं समर्पयामि ।
कुमकुम,चन्दन अष्टगंध चढ़ाएँ ।
ॐ गं " हं" आकाश तत्वात्मकं पुष्पम समर्पयामि ।
फूल चढ़ाएँ ।
ॐ गं " यं " वायु तत्वात्मकं धूपं समर्पयामि ।
धूप या अगरबत्ती दिखाएँ ।
ॐ गं " रं" अग्नी तत्वात्मकं दीपं समर्पयामि ।
दीपक दिखाएँ ।
ॐ गं " वं " जल तत्वात्मकं नैवेद्यं समर्पयामि ।
प्रसाद चढ़ाएँ ।
अब गणेशजी को अर्घ्य प्रदान करे, एक चम्मच जल चढ़ाएं
एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात
भगवान गणेश जी के 16 नाम से दूर्वा या पुष्प अक्षत या जल अर्पण करे
1. ॐ गं सुमुखाय नम: ।
2. ॐ गं एकदंताय नमः।
3. ॐ गं कपिलाय नमः।
4. ॐ गं गजकर्णकाय नमः।
5. ॐ गं लंबोदराय नमः।
6. ॐ गं विकटाय नम: ।
7. ॐ गं विघ्नराजाय नमः।
8. ॐ गं गणाधिपाय नम: ।
9. ॐ गं धूम्रकेतवे नम : ।
10 . ॐ गं गणाध्यक्षाय नमः।
11. ॐ गं भालचंद्राय नमः।
12. ॐ गं गजाननाय नम: ।
13. ॐ गं वक्रतुंडाय नमः।
14. ॐ गं शूर्पकर्णाय नमः।
15. ॐ गं हेरंबाय नमः।
16. ॐ गं स्कंदपूर्वजाय नमः।
अब एक आचमनी जल लेकर पूजा स्थान पर छोड़े
अनेन महागणपति षोडश नाम पूजनेन श्री भगवान महागणपति प्रीयन्तां न मम .
हाथ जोड़ कर भगवान गणेश जी से प्रार्थना करे
विस्तृत गणेश पूजन विधि
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः
गं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं शिव तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
गं सर्व तत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा
घंटा देवताभ्यो नमः
आसन देवताभ्यो नमः
दीप देवताभ्यो नमः
ॐ परम गुरुभ्यो नम:
ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम:
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येशु सर्वदा
कपित्थ जंबूफलसारभक्षितं
उमासुतं शोकविनाशकारकं
नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं
श्री महागणपति आवाहयामि
मम पूजन स्थाने रिद्धि सिद्धि सहित शुभ लाभ सहित स्थापयामि नमः
त्वां चरणे गन्धाक्षत पुष्पं समर्पयामि
( स्नान कराते समय आप जल से या दुध से या पंचामृत से गणपति अथर्वशीर्ष या अन्य स्तोत्रोसे अभिषेक कर सकते है )
फिर एक आचमनी जल अर्पण करे
(फिर एक आचमनी जल अर्पण करे )
समर्पयामि
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अब गणेश जी के एक एक अंग का स्मरण करते हुये पुष्प अक्षत अर्पण करे )
गं गणेशाय नम: गुल्फौ पूजयामि
गं जगद्धात्रे नम: जंघे पूजयामि
गं जगद्वल्लभाय नम: जानुनि पूजयामि
गं उमापुत्राय नम: उरु पूजयामि
गं विकटाय नम: कटिं पूजयामि
गं गुहाग्रजाय नम: गुह्यं पूजयामि
गं महत्तमाय नम: मेढ्रं पूजयामि
गं नाथाय नम: नाभिं पूजयामि
गं उत्तमाय नम: उदरं पूजयामि
गं विनायकाय नम: वक्षस्थलं पूजयामि
गं पाशच्छिदे नम: पार्श्वौ पूजयामि
गं हेरंबाय नम: हृदयम पूजयामि
गं कपिलाय नम: कण्ठं पूजयामि
गं स्कंदाग्रजाय नम: स्कंधौ पूजयामि
गं हरसुताय नम: हस्तान पूजयामि
गं ब्रह्मचारिणे नम: बाहून पूजयामि
गं सुमुखाय नम: मुखं पूजयामि
गं एकदंताय नम: दंतौ पूजयामि
गं विघ्नहंत्रे नम: नेत्रे पूजयामि
गं शूर्पकर्णाय नम: कर्णौ पूजयामि
गं भालचंद्राय नम: भालं पूजयामि
गं नागाभरणाय नम: नासिकां पूजयामि
गं चिरंतनाय नम: चिबुकं पूजयामि
गं स्थूलौष्ठाय नम: औष्ठौ पूजयामि
गं गलन्मदाय नम: कण्ठं पूजयामि
गं कपिलाय नम: कचान पूजयामि
गं शिवप्रियाय नम: शिर: पूजयामि
गं सर्वमंगलासुताय नम: सर्वांगे पूजयामि
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अगर आपके पास गणेश जी को अर्पण करने की 21 पत्री उपलब्ध है तो उसे अर्पण करे .. नही तो पुष्प अक्षत अर्पण करे .
गं हेरंबाय नम: बृहतीपत्रं समर्पयामि
गं लंबोदराय नम: बिल्वपत्रं समर्पयामि
गं द्विरदाननाय नम: दूर्वापत्रं समर्पयामि
गं धूम्रकेतवे नम: दुर्धूरपत्रं समर्पयामि
गं बृहते नम: बदरीपत्रं समर्पयामि
गं अपवर्गदाय नम: अपामार्गपत्रं समर्पयामि
गं द्वैमातुराय नम: तुलसीपत्रं समर्पयामि
गं चिरंतनाय नम: चूतपत्रं समर्पयामि
गं कपिलाय नम: करवीरपत्रं समर्पयामि
गं विष्णुस्तुताय नम: विष्णुक्रांतपत्रं समर्पयामि
गं अमलाय नम: आमलकीपत्रं समर्पयामि
गं महते नम: मरुवकपत्रं समर्पयामि
गं सिंधुराय नम: सिंधूरपत्रं समर्पयामि
गं गजाननाय नम: जातीपत्रं समर्पयामि
गं गण्डगलन्मदाय नम: गण्डलीपत्रं समर्पयामि
गं शंकरीप्रियाय नम: शमीपत्रं समर्पयामि
गं भृंगराजत्कटाय नम: भृंगराजपत्रं समर्पयामि
गं अर्जुनदंताय नम: अर्जुनपत्रं समर्पयामि
गं अर्कप्रभाय नम: अर्कपत्रं समर्पयामि
गं एकदंताय नम: दाडिमीपत्रं समर्पयामि
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अब आप 21 दूर्वा अर्पण करे [दूब चढ़ाएँ]
२) गं पाशांकुशधराय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
3) गं आखुवाहनाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
४) गं विनायकाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
५) गं ईशपुत्राय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
६) गं सर्वसिद्धिप्रदाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
७) गं एकदंताय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
८) गं इभवक्त्राय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
९) गं मूषकवाहनाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१०) गं कुमारगुरवे नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
११) गं कपिलवर्णाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१२) गं ब्रह्मचारिणे नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१३) गं मोदकहस्ताय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१४) गं सुरश्रेष्ठाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१५) गं गजनासिकाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१६) गं कपित्थफलप्रियाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१७) गं गजमुखाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१८) गं सुप्रसन्नाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
१९) गं सुराग्रजाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
२०) गं उमापुत्राय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
२१) गं स्कंदप्रियाय नम: दूर्वायुग्मं समर्पयामि
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गं ऐं ह्रीं श्रीं मयूर आरुढाय सिंधुदैत्यविनाशाय श्री मयूरेश्वराय नम:
2) चिंतामणी
गं ऐं ह्रीं श्रीं कपिलऋषी सुपुज्याय चिंतामणि प्रदानाय श्री चिंतामणि गणेशाय नम:
3) महागणपति
गं ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरासुरवध कारणाय शिवसुपूजिताय श्रीमहागणपतये नम:
4) सिद्धिविनायक
गं ऐं ह्रीं श्रीं विष्णुपूजिताय मधुकैटभवध कारणाय दक्षिणशुंडधारणाय समस्त सिद्धिप्रदानाय श्रीसिद्धिविनायकाय नम:
5) विघ्नेश्वर
गं ऐं ह्रीं श्रीं इंद्रसुपूजिताय विघ्नासुरप्राण हरणाय श्रीविघ्नेश्वराय नम:
6) गिरिजात्मक
गं ऐं ह्रीं श्रीं गिरिजासुपुजिताय शक्तिपुत्राय श्रीगिरिजात्मकाय नम:
7) बालेश्वर
गं ऐं ह्रीं श्रीं बाल्यस्वरुपाय भक्तप्रियाय श्रीबालेश्वराय नम:
8) वरदविनायक
गं ऐं ह्रीं श्रीं वरदहस्ताय सर्वबाधा प्रशमनाय श्रीवरदविनायकाय नम:
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२) गं ॐ नमो भगवते मदासुरहंताय मूषकवाहनाय एकदंताय नम:
३) गं ॐ नमो भगवते मोहासुरहंताय ज्ञानदाताय मूषकवाहनाय महोदराय नम:
४) गं ॐ नमो भगवते लोभासुरहंताय सांख्यसिद्धिप्रदानाय मूषकवाहनाय गजाननाय नम:
५) गं ॐ नमो भगवते क्रोधासुरहंताय मूषकवाहनाय लंबोदराय नम:
६) गं ॐ नमो भगवते कामासुरहंताय मयूरवाहनाय विकटनाय नम:
७) गं ॐ नमो भगवते मयासुर प्रहर्ताय शेष वाहनाय विघ्नराजाय नम:
८) गं ॐ नमो भगवते अहंतासुर हंताय मूषकवाहनाय धूम्रवर्णाय नम:
2. ॐ गं एकदंताय नमः।
3. ॐ गं कपिलाय नमः।
4. ॐ गं गजकर्णकाय नमः।
5. ॐ गं लंबोदराय नमः।
6. ॐ गं विकटाय नम: !
7. ॐ गं विघ्नराजाय नमः।
8. ॐ गं गणाधिपाय नम: !
9. ॐ गं धूम्रकेतवे नम : ।
10 . ॐ गं गणाध्यक्षाय नमः।
11. ॐ गं भालचंद्राय नमः।
12. ॐ गं गजाननाय नम: !
13. ॐ गं वक्रतुंडाय नमः।
14. ॐ गं शूर्पकर्णाय नमः।
15. ॐ गं हेरंबाय नमः।
16. ॐ गं स्कंदपूर्वजाय नमः।
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ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ऐं ग्लौं ॐ ह्रीं क्रौं गं ॐ नमो भगवते महागणपतये स्मरणमात्रसंतुष्टाय सर्वविद्याप्रकाशकाय सर्वकामप्रदाय भवबंधविमोचनाय ह्रीं सर्वभूतबंधनाय क्रों साध्याकर्षणाय क्लीं जगतत्रयवशीकरणाय सौ: सर्वमनक्षोभणाय श्रीं महासंपत्प्रदाय ग्लौं भूमंडलाधिपत्यप्रदाय महाज्ञानप्रदाय चिदानंदात्मने गौरीनंदनाय महायोगिने शिवप्रियाय सर्वानंदवर्धनाय सर्वविद्याप्रकाशनप्रदाय द्रां चिरंजिविने ब्लूं सम्मोहनाय ॐ मोक्षप्रदाय ! फट वशी कुरु कुरु! वौषडाकर्षणाय हुं विद्वेषणाय विद्वेषय विद्वेषय ! फट उच्चाटय उच्चाटय ! ठ: ठ: स्तंभय स्तंभय ! खें खें मारय मारय ! शोषय शोषय ! परमंत्रयंत्रतंत्राणि छेदय छेदय ! दुष्टग्रहान निवारय निवारय ! दु:खं हर हर ! व्याधिं नाशय नाशय ! नम: संपन्नय संपन्नय स्वाहा ! सर्वपल्लवस्वरुपाय महाविद्याय गं गणपतये स्वाहा !
यन्मंत्रे क्षितलांछिताभमनघं मृत्युश्च वज्राशिषो भूतप्रेतपिशाचका: प्रतिहता निर्घातपातादिव ! उत्पन्नं च समस्तदु:खदुरितं उच्चाटनोत्पादकं वंदेsभीष्टगणाधिपं भयहरं विघ्नौघनाशं परम ! ॐ गं गणपतये नम:
ॐ नमो महागणपतये , महावीराय , दशभुजाय , मदनकाल विनाशन , मृत्युं
हन हन , यम यम , मद मद , कालं संहर संहर , सर्व ग्रहान चूर्णय चूर्णय , नागान मूढय मूढय , रुद्ररूप, त्रिभुवनेश्वर , सर्वतोमुख हुं फट स्वाहा !
ॐ नमो गणपतये , श्वेतार्कगणपतये , श्वेतार्कमूलनिवासाय , वासुदेवप्रियाय , दक्षप्रजापतिरक्षकाय , सूर्यवरदाय , कुमारगुरवे , ब्रह्मादिसुरावंदिताय , सर्पभूषणाय , शशांकशेखराय , सर्पमालालंकृतदेहाय , धर्मध्वजाय , धर्मवाहनाय , त्राहि त्राहि , देहि देहि , अवतर अवतर , गं गणपतये , वक्रतुंडगणपतये , वरवरद , सर्वपुरुषवशंकर , सर्वदुष्टमृगवशंकर , सर्वस्ववशंकर , वशी कुरु वशी कुरु , सर्वदोषान बंधय बंधय , सर्वव्याधीन निकृंतय निकृंतय , सर्वविषाणि संहर संहर , सर्वदारिद्र्यं मोचय मोचय , सर्वविघ्नान छिंदि छिंदि , सर्ववज्राणि स्फोटय स्फोटय , सर्वशत्रून उच्चाटय उच्चाटय , सर्वसिद्धिं कुरु कुरु , सर्वकार्याणि साधय साधय , गां गीं गूं गैं गौं गं गणपतये हुं फट स्वाहा !
ॐ नमो गणपते महावीर दशभुज मदनकालविनाशन मृत्युं हन हन , कालं संहर संहर , धम धम , मथ मथ , त्रैलोक्यं मोहय मोहय , ब्रह्मविष्णुरुद्रान मोहय मोहय , अचिंत्य बलपराक्रम , सर्वव्याधीन विनाशाय , सर्वग्रहान चूर्णय चूर्णय , नागान मोटय मोटय , त्रिभुवनेश्वर सर्वतोमुख हुं फट स्वाहा !
लंबोदराय सकलाय जगद्धिताय
नागाननाय श्रूतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते !!
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय
विद्याधराय विकटाय च वामनाय
भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते !!
नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णुरुपाय ते नम:
नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नम:
विश्वरुपस्वरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे
भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक !!
लंबोदर नमस्त्युभ्यं सततं मोदकप्रियं
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा !!
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवंति
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव !!
गणेशपूजने कर्म यन्नूनमधिकं कृतं
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोsस्तु सदा मम !!
श्री गणेश अष्टोत्तर शत नाम
श्री गणेश अष्टोत्तर शत नाम
‘कलौ चण्डी-विनायकौ’-कलियुग में ‘चण्डी’ और ‘गणेश’ की साधना ही श्रेयस्कर है।
मेरे गुरुदेव ने बताया था कि कलयुग में चंडी अर्थात भगवती जगदंबा की साधना और विनायक अर्थात गणेश भगवान की साधना या पूजा करने से ज्यादा लाभप्रद होता है ।
गणेश भगवान की साधना सरल है और उसमें बहुत ज्यादा विधि-विधान और जटिलता की आवश्यकता नहीं है इसीलिए सर्वसामान्य में गणेश भगवान की पूजन का बहुत ज्यादा प्रचलन है जो हम गणेशोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष देखते हैं ।
गणेश भगवान के पूजन के लिए आप पंचोपचार व षोडशोपचार जैसे पूजन विधान का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन उसमें संस्कृत श्लोकों का ज्यादा प्रयोग होता है जो पढ़ने में सामान्य जन को थोड़ी दिक्कत होती है ।
अष्टोत्तर शतनाम का मतलब होता है गणेश भगवान के 108 नाम के साथ उनका प्रणाम करते हुए पूजन करना जोकि सरल है और हर कोई कर सकता है ।
आप इन नाम का उच्चारण करने के बाद हर बार नम: बोलते समय अपनी श्रद्धा अनुसार
फूल,
चावल के दाने,
अष्टगंध,
दूर्वा ,
चंदन या जो आपकी श्रद्धा हो वह चढ़ा सकते हैं ।
इस प्रकार से बेहद सरलता से आप गणेश भगवान का पूजन संपन्न कर पाएंगे ।
1 गं विनायकाय नम: ॥
2 गं द्विजप्रियाय नम: ॥
3 गं शैलेंद्र तनुजोत्संग खेलनोत्सुक मानसाय नम: ॥
4 गं स्वलावण्य सुधा सार जित मन्मथ विग्रहाय नम: ॥
5 गं समस्तजगदाधाराय नम: ॥
6 गं मायिने नम: ॥
7 गं मूषकवाहनाय नम: ॥
8 गं हृष्टाय नम: ॥
9 गं तुष्टाय नम: ॥
10 गं प्रसन्नात्मने नम: ॥
11 गं सर्व सिद्धि प्रदायकाय नम: ॥
12 गं अग्निगर्भच्छिदे नम: ॥
13 गं इंद्रश्रीप्रदाय नम: ॥
14 गं वाणीप्रदाय नम: ॥
15 गं अव्ययाय नम: ॥
16 गं सिद्धिरूपाय नम: ॥
17 गं शर्वतनयाय नम: ॥
18 गं शर्वरीप्रियाय नम: ॥
19 गं सर्वात्मकाय नम: ॥
20 गं सृष्टिकत्रै नम: ॥
21 गं विघ्नराजाय नम: ॥
22 गं देवाय नम: ॥
23 गं अनेकार्चिताय नम: ॥
24 गं शिवाय नम: ॥
25 गं शुद्धाय नम: ॥
26 गं बुद्धिप्रियाय नम: ॥
27 गं शांताय नम: ॥
28 गं ब्रह्मचारिणे नम: ॥
29 गं गजाननाय नम: ॥
30 गं द्वैमातुराय नम: ॥
31 गं मुनिस्तुत्याय नम: ॥
32 गं गौरीपुत्राय नम: ॥
33 गं भक्त विघ्न विनाशनाय नम: ॥
34 गं एकदंताय नम: ॥
35 गं चतुर्बाहवे नम: ॥
36 गं चतुराय नम: ॥
37 गं शक्ति संयुक्ताय नम: ॥
38 गं लंबोदराय नम: ॥
39 गं शूर्पकर्णाय नम: ॥
40 गं हस्त्ये नम: ॥
41 गं ब्रह्मविदुत्तमाय नम: ॥
42 गं कालाय नम: ॥
43 गं गणेश्वराय नम: ॥
44 गं ग्रहपतये नम: ॥
45 गं कामिने नम: ॥
46 गं सोम सूर्याग्नि लोचनाय नम: ॥
47 गं पाशांकुश धराय नम: ॥
48 गं चण्डाय नम: ॥
49 गं गुणातीताय नम: ॥
50 गं निरंजनाय नम: ॥
51 गं अकल्मषाय नम: ॥
52 गं स्वयं सिद्धाय नम: ॥
53 गं सिद्धार्चित पदांबुजाय नम: ॥
54 गं स्कंदाग्रजाय नम: ॥
55 गं बीजापूर फलासक्ताय नम: ॥
56 गं वरदाय नम: ॥
57 गं शाश्वताय नम: ॥
58 गं कृतिने नम: ॥
59 गं सर्व प्रियाय नम: ॥
60 गं वीतभयाय नम: ॥
61 गं गतिने नम: ॥
62 गं चक्रिणे नम: ॥
63 गं इक्षु चाप धृते नम: ॥
64 गं श्री प्रदाय नम: ॥
65 गं अव्यक्ताय नम: ॥
66 गं अजाय नम: ॥
67 गं उत्पल कराय नम: ॥
68 गं श्री पतये नम: ॥
69 गं स्तुति हर्षिताय नम: ॥
70 गं कुलाद्रिभेत्रे नम: ॥
71 गं जटिलाय नम: ॥
72 गं कलि कल्मष नाशनाय नम: ॥
73 गं चंद्रचूडामणये नम: ॥
74 गं कांताय नम: ॥
75 गं पापहारिणे नम: ॥
76 गं भूताय नम: ॥
77 गं समाहिताय नम: ॥
78 गं आश्रिताय नम: ॥
79 गं श्रीकराय नम: ॥
80 गं सौम्याय नम: ॥
81 गं भक्त वांछित दायकाय नम: ॥
82 गं शांतमानसाय नम: ॥
83 गं कैवल्य सुखदाय नम: ॥
84 गं सच्चिदानंद विग्रहाय नम: ॥
85 गं ज्ञानिने नम: ॥
86 गं दयायुताय नम: ॥
87 गं दक्षाय नम: ॥
88 गं दांताय नम: ॥
89 गं ब्रह्मद्वेष विवर्जिताय नम: ॥
90 गं प्रमत्त दैत्य भयदाय नम: ॥
91 गं श्रीकण्ठाय नम: ॥
92 गं विबुधेश्वराय नम: ॥
93 गं रामार्चिताय नम: ॥
94 गं विधये नम: ॥
95 गं नागराज यज्ञोपवितवते नम: ॥
96 गं स्थूलकण्ठाय नम: ॥
97 गं स्वयंकर्त्रे नम: ॥
98 गं अध्यक्षाय नम: ॥
99 गं साम घोष प्रियाय नम: ॥
100 गं परस्मै नम: ॥
101 गं स्थूल तुंडाय नम: ॥
102 गं अग्रण्यै नम: ॥
103 गं धीराय नम: ॥
104 गं वागीशाय नम: ॥
105 गं सिद्धि दायकाय नम: ॥
106 गं दूर्वा बिल्व प्रियाय नम: ॥
107 गं अव्यक्त मूर्तये नम: ॥
108 गं अद्भुत मूर्ति मते नम: ॥
अंत में हाथ जोड़कर प्रणाम करें और दोनों कान पकड़कर किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए भगवान गणेश से अपने इच्छित मनोकामना को पूर्ण करने की याचिका करें ।
वक्रतुंडस्तोत्रम
वक्रतुंडस्तोत्रम
ॐ ॐ ॐकाररुपं त्र्यहमिति च परं यत्स्वरुपं तुरियं
त्रैगुण्यातीतनीलं कलयति मनसतेजसिंदूरमूर्तिम !
योगींन्द्रैब्रह्मरंध्रे सकलगुणमयं श्रीहरेंन्द्रेण संगं
गं गं गं गं गणेशं गजमुखमभितो व्यापकं चिंतयंति !!
वं वं वं विघ्नराजं भजति निजभुजे दक्षिणेन्यस्तशुंडं
क्रं क्रं क्रं क्रोधमुद्रादलितरिपुबलं कल्पवृक्षस्य मूले !
दं दं दं दन्तमेकं दधत मुनिमुखं कामधेन्वा निषेव्यं !
धं धं धं धारयंतं धनदमतिधियं सिद्धि बुद्धिद्वितियं !!
तुं तुं तुं तुंगरुपं गगनपथि गतं व्याप्नुवंतं दिगंतान
क्लीं क्लीं क्लींकारनाथं गलित मदमिल्ल लोलमत्तालिमालं !
ह्रीं ह्रीं ह्रींकारपिंगं सकलमुनिवर ध्येयमुंडं च शुंडम !
श्रीं श्रीं श्रीं श्रयंतं निखिलनिधिकुलं नौमि हेरंबबिंबं !
लौं लौं लौं लौकारमाद्यं प्रणवमिव पदं मंत्रमुक्तावलीनां शुद्धं विघ्नेशबीजं शशिकरसदृशं योगिनांध्यानगम्यं !
डं डं डं डामरुपं दलितभवभयं सूर्यकोटिप्रकाशं !
यं यं यं यज्ञनाथं जपति मुनिवरो बाह्यभ्यंतरं च !!
हुं हुं हुं हेमवर्णं श्रूतिगणितगुणं शूर्पकर्णं कृपालुं
ध्येयं सूर्यस्यबिंबं उरसि च विलसत सर्पयज्ञोपवितं !
स्वाहा हुं फट नमों अंतैष्ठ
ठ ठ ठ सहितै: पल्लवै: सेव्यमानं मंत्राणां सप्तकोटि प्रगुणित महिमाधारमीशं प्रपद्ये !!
- नित्य पूजन मे उपयोग कर सकते हैं ।
- नवरात्रि मे पाठ से विशेष लाभ होगा ।
- मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प लेकर 1008 पाठ करें ।
- उतना न कर पाएं तो जितना कर सकें उतना करें ।
इसे सुनकर उच्चारण करने से धीरे धीरे धीरे गुरुकृपा से आपका उच्चारण स्पष्ट होता जाएगा :-





