29 जुलाई 2026

एक पत्थर की भी तकदीर बदल सकती है,

एक पत्थर की भी तकदीर बदल सकती है,


शर्त ये है कि सलीके से तराशा जाए....



रास्ते में पडा ! लोगों के पांवों की ठोकरें खाने वाला पत्थर ! जब योग्य मूर्तिकार के हाथ लग जाता है, तो वह उसे तराशकर ,अपनी सर्जनात्मक क्षमता का उपयोग करते हुये, इस योग्य बना देता है, कि वह मंदिर में प्रतिष्ठित होकर करोडों की श्रद्धा का केद्र बन जाता है। करोडों सिर उसके सामने झुकते हैं।


रास्ते के पत्थर को इतना उच्च स्वरुप प्रदान करने वाले मूर्तिकार के समान ही, एक गुरु अपने शिष्य को सामान्य मानव से उठाकर महामानव के पद पर बिठा देता है।


चाणक्य ने अपने शिष्य चंद्रगुप्त को सडक से उठाकर संपूर्ण भारतवर्ष का चक्रवर्ती सम्राट बना दिया।


विश्व मुक्केबाजी का महानतम हैवीवेट चैंपियन माइक टायसन सुधार गृह से निकलकर अपराधी बन जाता अगर उसकी प्रतिभा को उसके गुरू ने ना पहचाना होता।


यह एक अकाट्य सत्य है कि चाहे वह कल का विश्वविजेता सिकंदर हो या आज का हमारा महानतम बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर, वे अपनी क्षमताओं को पूर्णता प्रदान करने में अपने गुरु के मार्गदर्शन व योगदान के अभाव में सफल नही हो सकते थे।


हमने प्राचीन काल से ही गुरु को सबसे ज्यादा सम्माननीय तथा आवश्यक माना। भारत की गुरुकुल परंपरा में बालकों को योग्य बनने के लिये आश्रम में रहकर विद्याद्ययन करना पडता था, जहां गुरु उनको सभी आवश्यक ग्रंथो का ज्ञान प्रदान करते हुए उन्हे समाज के योग्य बनाते थे।


विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों नालंदा तथा तक्षशिला में भी उसी ज्ञानगंगा का प्रवाह हम देखते हैं। संपूर्ण विश्व में शायद ही किसी अन्य देश में गुरु को उतना सम्मान प्राप्त हो जितना हमारे देश में दिया जाता रहा है। यहां तक कहा गया किः-

गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागूं पांय ।

बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय ॥


अर्थात, यदि गुरु के साथ स्वयं गोविंद अर्थात साक्षात भगवान भी सामने खडे हों, तो भी गुरु ही प्रथम सम्मान का अधिकारी होता है, क्योंकि उसीने तो यह क्षमता प्रदान की है कि मैं गोविंद को पहचानने के काबिल हो सका।
आध्यात्मिक जगत की ओर जाने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति का मार्ग गुरु और केवल गुरु से ही प्रारंभ होता है।

कुछ को गुरु आसानी से मिल जाते हैं, कुछ को काफी प्रयास के बाद मिलते हैं,और कुछ को नहीं मिलते हैं।

साधनात्मक जगत, जिसमें योग, तंत्र, मंत्र जैसी विद्याओं को रखा जाता है, में गुरु को अत्यंत ही अनिवार्य माना जाता है।

वे लोग जो इन क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं, उनको अनिवार्य रुप से योग्य गुरु के सानिध्य के लिये प्रयास करना ही चाहिये।

ये क्षेत्र उचित मार्गदर्शन की अपेक्षा रखते हैं।





गुरु का तात्पर्य किसी व्यक्ति के देह या देहगत न्यूनताओं से नही बल्कि उसके अंतर्निहित ज्ञान से होता है, वह ज्ञान जो आपके लिये उपयुक्त हो,लाभप्रद हो। गुरु गीता में कुछ श्लोकों में इसका विवेचन मिलता हैः-


अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥


अज्ञान के अंधकार में डूबे हुये व्यक्ति को ज्ञान का प्रकाश देकर उसके नेत्रों को प्रकाश का अनुभव कराने वाले गुरु को नमन ।

गुरु शब्द के अर्थ को बताया गया है कि :-


गुकारस्त्वंधकारश्च रुकारस्तेज उच्यते।

अज्ञान तारकं ब्रह्‌म गुरुरेव न संशयः॥


गुरु शब्द के पहले अक्षर 'गु' का अर्थ है, अंधकार जिसमें शिष्य डूबा हुआ है, और 'रु' का अर्थ है, तेज या प्रकाश जिसे गुरु शिष्य के हृदय में उत्पन्न कर इस अंधकार को हटाने में सहायक होता है, और ऐसे ज्ञान को प्रदान करने वाला गुरु साक्षात ब्रह्‌म के तुल्य होता है।


ज्ञान का दान ही गुरु की महत्ता है। ऐसे ही ज्ञान की पूर्णता का प्रतीक हैं भगवान शिव। भगवान शिव को सभी विद्याओं का जनक माना जाता है। वे तंत्र से लेकर मंत्र तक और योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि हैं और अंत भी। वे संगीत के आदिसृजनकर्ता भी हैं, और नटराज के रुप में कलाकारों के आराध्य भी हैं। वे प्रत्येक विद्या के ज्ञाता होने के कारण जगद्गुरु भी हैं। गुरु और शिव को आध्यात्मिक जगत में समान माना गया है।


कहा गया है कि :-


यः शिवः सः गुरु प्रोक्तः। यः गुरु सः शिव स्मृतः॥


अर्थात गुरु और शिव दोनों ही अभेद हैं, और एक दूसरे के पर्याय हैं।जब गुरु ज्ञान की पूर्णता को प्राप्त कर लेता है तो वह स्वयं ही शिव तुल्य हो जाता है, तब वह भगवान आदि शंकराचार्य के समान उद्घोष करता है कि ÷


शिवो s हं, शंकरो s हं'।


ऐसे ही ज्ञान के भंडार माने जाने वाले गुरुओं के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने का पर्व है,

गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा

यह वो बिंदु है, जिसके वाद से सावन का महीना जो कि शिव का मास माना जाता है, प्रारंभ हो जाता है।

इसका प्रतीक रुप में अर्थ लें तो, जब गुरु अपने शिष्य को पूर्णता प्रदान कर देता है, तो वह आगे शिवत्व की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने लगता है,और यह भाव उसमें जाग जाना ही मोक्ष या ब्रह्‌मत्व की स्थिति कही गयी है।

28 जुलाई 2026

गुरुपुर्णिमा विशेष ब्रह्मांडीय गुरुमंडल साधना

   







गुरुपुर्णिमा विशेष ब्रह्मांडीय गुरुमंडल साधना
( दुर्लभ गुरु अष्टोत्तर शत नामावली सहित )
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यहां पर गुरुपौर्णिमा के पर्व पर करने के लिये मैं ब्रम्हांड के समस्त गुरुमंडल की एक छोटी साधना प्रस्तुत कर रहा हूँ जो की उन लोगों को ध्यान में रखकर बनायी है जो ज्यादा समय तक साधना नहीं कर सकते या जटिल पूजन विधि नहीं कर सकते। यह पूजन किसी एक गुरु परंपरा का नही वरन समस्त गुरुपरंपरा का है इसलिए इसे कोइ भी कर सकता है .. अगर आपके कोइ गुरु नही है तो भी करे .. आपको समस्त गुरुमंडल की कृपा प्राप्त होगी ..
1.       सब पहले आपके सामने गुरुदेव जी का गुरुमंडल अंतर्गत आनेवाले किसीभी योगी या संत का कोई भी चित्र या यंत्र या मूर्ति हो। इनमेसे कुछ भी नही तो आपके रत्न या रुद्राक्ष पर पूजन करे .
2.       घी का दीपक या तेल का दीपक या दोनों दीपक जलाये। 
3.       धुप अगरबत्ती जलाये।
4.       बैठने के लिए आसन हो। 
5.       जाप के लिए रुद्राक्ष माला या स्फटिक माला ले
6.       एक आचमनी पात्र , जल पात्र रखे।
7.       हल्दी,कुंकुम ,चन्दन,अष्टगंध और अक्षत पुष्प ,नैवेद्य के लिए मिठाई या दूध या कोई भी वस्तु ,फल भी एकत्रित करे। 
8.       अगर यह सामग्री नहीं है तो मानसिक पूजन करे

सबसे पहले गुरु ,गणेश इन्हे वंदन करे

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: 

ॐ श्री गणेशाय नम: 

ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललितायै नम: 

ॐ श्री गुरुमंडलाय नम:

फिर आचमन करे 

ऐं आत्मतत्वाय स्वाहा 

ऐं विद्या तत्वाय स्वाहा 

ऐं शिव तत्वाय स्वाहा 

ऐं सर्व तत्वाय स्वाहा

फिर गुरु स्मरण करे और पुजन के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे

ॐ श्री गुरुभ्यो नम: 


ॐ श्री परम गुरुभ्यो नम: 


ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम:

 

अब आसन पर पुष्प अक्षत अर्पण करे

ॐ पृथ्वी देव्यै नमः


चारो तरफ दिशा बंधन हेतु अक्षत फेके और अपनी शिखा पर दाहिना हाथ रखे
फिर दीपक को प्रणाम करे


दीप देवताभ्यो नमः

कलश में जल डाले और उसमे चन्दन या सुगन्धित द्रव्य डाले

कलश देवताभ्यो नमः


अब अपने आप को तिलक करे
गणेश जी के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे

वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटी समप्रभ 

निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा


अब आप हाथ मे जल ,अक्षत ,पुष्प लेकर तिथी वार नक्षत्र आदि का स्मरण कर संकल्प करे की आप आज गुरुपौर्णिमा के पावन पर्व पर अपने सदगुरुदेव एवं संपूर्ण गुरुमंडल की कृपा प्राप्ति हेतु गुरुपूजन संपन्न कर रहे है और उनकी कृपा प्राप्त हो और आपकी आध्यात्मिक एवं भौतिक उन्नती हो और आपकी जो भी समस्या है उसका निवारण हो ..

गुरुस्मरण कर सर्वप्रथम उनका आवाहन करे

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: 

गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:

ध्यान मूलं गुरु: मूर्ति पूजा मूलं गुरो पदं 

मंत्र मूलं गुरुर्वाक्य मोक्ष मूलं गुरुकृपा

गुरुकृपा हि केवलं

गुरुकृपा हि केवलं 

गुरुकृपा हि केवलं

गुरुकृपा हि केवलं

 

श्री सदगुरु चरण कमलेभो नम: प्रार्थना पुष्पं समर्पयामि


श्री सदगुरु मम ह्रदये आवाहयामि स्थापयामि नम:
सदगुरुदेव का अब पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करे .. यहाँ पर पंचोपचार पूजन प्रस्तुत किया है ..

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: गंधं समर्पयामि


ॐ गुं गुरुभ्यो नम: पुष्पम समर्पयामि


ॐ गुं गुरुभ्यो नम: धूपं समर्पयामि


ॐ गुं गुरुभ्यो नम: दीपं समर्पयामि


ॐ गुं गुरुभ्यो नम: नैवेद्यम समर्पयामि


अब गुरु पंक्ति का पूजन करे

ॐ गुरुभ्यो नम:
ॐ परम गुरुभ्यो नम:
ॐ परात्पर गुरुभ्यो नम:
ॐ पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम:
ॐ दिव्यौघ गुरुपंक्तये नम:
ॐ सिद्धौघ गुरुपंक्तये नम:
ॐ मानवौघ गुरुपंक्तये नम:

अब गुरु अष्टोत्तर शत नामावली से एकेक नाम का उच्चारण करते हुये पुष्प अक्षत अर्पण करते जाये ..

श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली
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1) ॐ सदगुरवे नम:
2) ॐ अज्ञान नाशकाय नम:
3) ॐ अदंभिने नम:
4) ॐ अद्वैतप्रकाशकाय नम:
5) ॐ अनपेक्षाय नम:
06) ॐ अनसूयवे नम:
07) ॐ अनुपमाय नम:
08) ॐ अभयप्रदात्रे नम:
09) ॐ अमानिने नम:
10) ॐ अहिंसामूर्तये नम:
11) ॐ अहैतुकस्दयासिंधवे नम:
12) ॐ अहंकारनाशकाय नम:
13) ॐ अहंकारवर्जिताय नम:
14) ॐ आचार्येंद्राय नम:
15) ॐ आत्मसंतुष्टाय नम:
16) ॐ आनंदमूर्तये नम:
17) ॐ आर्जवयुक्ताय नम:
18) ॐ उचितवाचे नम:
19) ॐ उत्साहिने नम:
20) ॐ उदासीनाय नम:
21) ॐ उपरताय नम:
22) ॐ ऐश्वर्ययुक्ताय नम:
23) ॐ कृतकृत्याय नम:
24) ॐ क्षमावते नम:
25) ॐ गुणातीताय नम:
26) ॐ चारुवाग्विलासाय नम:
27) ॐ चारुहासाय नम:
28) ॐ छिन्नसंशयाय नम:
29) ॐ ज्ञानदात्रे नम:
30) ॐ ज्ञानयज्ञतत्पराय नम:
31) ॐ तत्त्वदर्शिने नम:
32) ॐ तपस्विने नम:
33) ॐ तापहराय नम:
34) ॐ तुल्यनिंदास्तुतये नम:
35) ॐ तुल्यप्रियाप्रियाय नम:
36) ॐ तुल्यमानापमानाय नम:
37) ॐ तेजस्विने नम:
38) ॐ त्यक्तसर्वपरिग्रहाय नम:
39) ॐ त्यागिने नम:
40) ॐ दक्षाय नम:
41) ॐ दांताय नम:
42) ॐ दृढव्रताय नम:
43) ॐ दोषवर्जिताय नम:
44) ॐ द्वंद्वातीताय नम:
45) ॐ धीमते नम:
46) ॐ धीराय नम:
47) ॐ नित्यसंतुष्टाय नम:
48) ॐ निरहंकाराय नम:
49) ॐ निराश्रयाय नम:
50) ॐ निर्भयाय नम:
51) ॐ निर्मदाय नम:
52) ॐ निर्ममाय नम:
53) ॐ निर्मलाय नम:
54) ॐ निर्मोहाय नम:
55) ॐ निर्योगक्षेमाय नम:
56) ॐ निर्लोभाय नम:
57) ॐ निष्कामाय नम:
58) ॐ निष्क्रोधाय नम:
59) ॐ नि:संगाय नम:
60) ॐ परमसुखदाय नम:
61) ॐ पंडिताय नम:
62) ॐ पूर्णाय नम:
63) ॐ प्रमाण प्रवर्तकाय नम:
64) ॐ प्रियभाषिणे नम:
65) ॐ ब्रह्मकर्मसमाधये नम:
66) ॐ ब्रह्मात्मनिष्ठाय नम:
67) ॐ ब्रह्मात्मविदे नम:
68) ॐ भक्ताय नम:
69) ॐ भवरोगहराय नम:
70) ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदात्रे नम:
71) ॐ मंगलकर्त्रे नम:
72) ॐ मधुरभाषिणे नम:
73) ॐ महात्मने नम:
74) ॐ महावाक्योपदेशकर्त्रे नम:
75) ॐ मितभाषिणे नम:
76) ॐ मुक्ताय नम:
77) ॐ मौनिने नम:
78) ॐ यतचित्ताय नम:
79) ॐ यतये नम:
80) ॐ यद इच्छा लाभ संतुष्टाय नम:
81) ॐ युक्ताय नम:
82) ॐ रागद्वेषवर्जिताय नम:
83) ॐ विदिताखिलशास्त्राय नम:
84) ॐ विद्याविनयसंपन्नाय नम:
85) ॐ विमत्सराय नम:
86) ॐ विवेकिने नम:
87) ॐ विशालहृदयाय नम:
88) ॐ व्यवसायिने नम:
89) ॐ शरणागतवत्सलाय नम:
90) ॐ शांताय नम:
91) ॐ शुद्धमानसाय नम:
92) ॐ शिष्यप्रियाय नम:
93) ॐ श्रद्धावते नम:
94) ॐ श्रोत्रियाय नम:
95) ॐ सत्यवाचे नम:
96) ॐ सदामुदितवदनाय नम:
97) ॐ समचित्ताय नम:
98) ॐ समाधिकस्वर्जिताय नम:
99) ॐ समाहितचित्ताय नम:
100) ॐ सर्वभूतहिताय नम:
101) ॐ सिद्धाय नम:
102) ॐ सुलभाय नम:
103) ॐ सुशीलाय नम:
104) ॐ सुह्रदये नम:
105) ॐ सूक्ष्मबुद्धये नम:
106) ॐ संकल्पवर्जिताय नम:
107) ॐ संप्रदायविदे नम:
108) ॐ स्वतंत्राय नम:

!! इति श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली !!

अब एक आचमनी जल लेकर निम्न मंत्र पढकर अर्पण करे

अनेन श्री गुरु अष्टोत्तर शत नामावली द्वारा पूजनेन श्री गुरुदेव सहित समस्त गुरुमंडल देवता प्रीयतां न मम ..

जिन्हे गुरुमंडल का पूजन न करना हो वे सिधे पूजन के अंत मे जाकर अर्घ्य प्रदान करे और मंत्र जाप करे ..
जिंन्हे गुरुमंडल का पूजन करना हो वे आगे का पूजन continue रखे ..
वैसे सभी साधकों से निवेदन है वे यह पूजन अवश्य करे इस पूजन से समस्त गुरुओं का पूजन हो जाता है और गुरुपुर्णिमा के अवसर पर इस पूजन को करने से सभी गुरुओं की कृपा प्राप्त होती है ..

अब पहले हाथ मे पुष्प लेकर समस्त गुरुमंडल का ध्यान करे

नारायण समारंभा शंकराचार्य मध्यमाम
अस्मदाचार्य पर्यंतां वंदे गुरुपरंपराम !!
श्रीनाथादि गुरुत्रयं गणपतिं पीठत्रयं भैरवं
सिद्धौघ बटुकत्रयं पदयुगं दूतीक्रमं मंडलं !!
वीरांद्वष्ट चतुष्कषष्ठीनवकं वीरावलीपंचकं
श्रीमन्मालिनी मंत्रराजसहितं वंदे गुरोर्मंडलं !!

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम: !!

अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: !!

अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया
चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: !!

वंदे गुरुपदद्वंदवांग्मनस गोचरं
रक्त शुक्ल प्रभामिश्रमतर्क्यं मह : !!

नमोस्तु गुरवे तस्मै स्वेष्ट देविस्वरुपिणे
यस्य वाकममृतं हंति विषं संसारसंज्ञकम !!

समस्त गुरुमंडल आवाहयामि मम पूजा स्थाने स्थापयामि नम:

समस्त गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: पंचोपचार पूजनं समर्पयामि

श्री गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: गंध समर्पयामि
श्री गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: पुष्प समर्पयामि
श्री गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: धूपं समर्पयामि
श्री गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: दीपं समर्पयामि
श्री गुरुमंडल गुरुभ्यो नम: नैवेद्यं समर्पयामि

अब गुरुमंडल का पूजन शुरु करे ..
गुरुमंडल अंतर्गत एकेक गुरु का नाम लेकर पूजयामि कहकर पुष्पअक्षत अर्पण करे और तर्पयामि कहकर एक आचमनी जल अर्पण करे ..

सबसे पहले श्री व्यास जी स्मरण करे

वेदव्यासं श्यामरुपं सत्यसंघं परायणम
शांतेंद्रियं जित्क्रोधं सशिष्यं प्रणमाम्यहम् !!

व्यास पंचकं

ॐ श्री व्यासाय नम: ! वेदव्यासं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम: !!
ॐ वैशंपायनाय नम: ! वैशंपायनं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम: !!

ॐ सुमंताय नम: ! सुमंतं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम: !!

ॐ जैमिनये नम: ! जैमिनिं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम: !!

ॐ पैलाय नम: ! पैलं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

!! इति व्यासपंचकं पूजनम !!

अब श्री शंकराचार्य जी का स्मरण करे

सर्वशास्त्रार्थतत्वज्ञम परमानंदविग्रहं
ब्रम्हण्यं शंकराचार्यं प्रणमामि विवेकिनम
परात्परतरं शांतं योगींद्रं योगसेविनं
शांतेंद्रियं जितक्रोधं सशिष्यं प्रणमाम्यहम् !!

शंकराचार्य पंचकं

ॐ शंकराचार्याय नम: ! शंकराचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विश्वरुपाचार्याय नम:! विश्वरुपाचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पद्मपादाचार्याय नम:! पद्मपादाचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ गौडपादाचार्याय नम: ! गौडपादाचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ हस्तामलकाचार्याय नम: ! हस्तमलकाचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ त्रोटकाचार्याय नम: ! त्रोटकाचार्यं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

!! इति शंकराचार्यं पूजनं !!

दिगंबरं कुमारं च विधिमानससनंदनं !
सनकं परंवैराग्यं मुनिमावाहयाम्यहम !!

ॐ सनकाय नम: सनकं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सनंदनाय नम: सनंदनं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सनतनाय नम: सनंदनं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सनत्कुमाराय नम: सनत्कुमारम आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सनत्सुजाताय नम: सनत्सुजातं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

!! इति सनकादि पूजनं !!

ॐ दत्तात्रेयाय नम: दत्तात्रेयं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ जीवन्मुक्ताय नम: जीवन्मुक्तं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विधातृतनयाय नम: विधातृतनयं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ नारदाय नम: नारदं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वामदेवाय नम: वामदेवं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ कपिलाय नम: कपिलं आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ब्रम्हानंद परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वंदातितं गगनसदृश्यम एकमस्यादि लक्ष्यं
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधिसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि

ॐ स्वगुरवे नम :
स्वगुरु ( अपने गुरु का नाम यहां पर ले )
स्वगुरु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पुजयामि तर्पयामि नम:

ॐ परम गुरवे नम:
परमगुरु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ परात्पर गुरवे नम:
परात्पर गुरु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ परमेष्ठी गुरवे नम:
परमेष्ठी गुरु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पर गुरवे नम:
पर गुरु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सदाशिवाय नम:
सदाशिव आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ ईश्वराय नम:
ईश्वर आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विष्णवे नम:
विष्णु आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ ब्रम्हाचार्याय नम:
ब्रम्हाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ नकुलाचार्याय नम:
नकुलाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ गौरिशाचार्याय नम:
गौरीशाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ अर्चिषाचार्याय नम:
अर्चिषाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ मैत्रेयाचार्याय नम:
मैत्रेयाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ कपिलाचार्याय नम:
कपिलाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सिद्धशांतनाचार्याय नम:
सिद्धशांतनाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ अगस्ताचार्याय नम:
अगस्ताचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पिंगाक्षाचार्याय नम:
पिंगाक्षाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ मनुगणाचार्याय नम:
मनुगणाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पुष्पदंताचार्याय नम:
पुष्पदंताचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ शांतनाचार्याय नम:
शांतनाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विद्याचार्याय नम:
विद्याचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पंचधाचार्याय नम:
पंचधाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ व्रताचार्याय नम:
व्रताचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ दुर्वासाचार्याय नम:
दुर्वासाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ कौंडिन्याचार्याय नम:
कौंडिन्याचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ कौशिकाचार्याय नम:
कौशिकाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ भैरवाष्टकाचार्याय नम:
भैरवाष्टकाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ एकाक्षराचार्याय नम:
एकाक्षराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विश्वनाथाचार्याय नम:
विश्वनाथाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सोमेश्वराचार्याय नम:
सोमेश्वराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वसिष्ठाचार्याय नम:
वसिष्ठाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वाल्मिक्याचार्याय नम:
वाल्मिक्याचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ अत्र्याचार्याय नम:
अत्र्याचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ गर्गाचार्याय नम:
गर्गाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ पराशराचार्याय नम:
पराशराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वेदव्यासाचार्याय नम:
वेदव्यासाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ शुक्राचार्याय नम:
शुक्राचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ गौडपादाचार्याय नम:
गौडपादाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ गोविंदपादाचार्याय नम:
गोविंदपादाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ शंकराचार्याय नम:
शंकराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ ऱामानंदाचार्याय नम:
रामानंदाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ रामानुजाचार्याय नम:
रामानुजाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ हयग्रीवाचार्याय नम:
हयग्रीवाचार्याय आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सच्चिदानंदाचार्याय नम:
सच्चिदानंदाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ दामोदराचार्याय नम:
दामोदराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वैष्णवाचार्याय नम:
वैष्णवाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ सुश्रुताचार्याय नम:
सुश्रुताचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ चरकाचार्याय नम:
चरकाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ वाग्भटाचार्याय नम:
वाग्भटाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ नागार्जुनाचार्याय नम:
नागार्जुनाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ नित्यनाथाचार्याय नम:
नित्यनाथाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ धंन्वंतराचार्याय नम:
धंन्वंतराचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ द्राविणाचार्याय नम:
द्राविणाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

ॐ विवर्णाचार्याय नम:
विवर्णाचार्य आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम:

तद्वामत: समस्तविद्यासंप्रदायप्रवर्तकाचार्येभ्यो नम:
समस्तविद्यासंप्रदायप्रवर्तकाचार्यान आवाहयामि स्थापयामि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नम':

अब एक आचमनी जल अर्पण करे
अनेन पूजनेन स्वगुरु सहित समस्त गुरुमंडल देवता प्रीयतां मम !!

अब एक आचमनी जल मे चंदन मिलाकर अर्घ्य दे ..

ॐ गुरुदेवाय विद्महे परम गुरवे धीमहि तन्नो गुरु: प्रचोदयात्

ॐ परमहंसाय विद्महे महातत्त्वाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात्

ॐ गुरुदेवाय विद्महे परमब्रम्हाय धीमहि तन्नो गुरु: प्रचोदयात्

अब गुरुमंत्र का यथाशक्ती जाप करे

जिन्होने किसी गुरु से गुरु दिक्षा ना ली हो वे " ऐं " इस एकाक्षर गुरु मंत्र बीज मंत्र का जाप करे ..

" ऐं " यह बीज ब्रह्माण्ड के सभी गुरुमंडल का बीज मंत्र है .. इस एकाक्षर मंत्र का यथाशक्ती स्फटिक माला या रुद्राक्ष माला से जाप करे ..

और निम्न गुरु मंत्र का भी यथाशक्ती जाप करे .. यह ब्रम्हाण्ड के शक्तिशाली गुरुपरंपरा का गुरुमंत्र है .. इसका नित्य जाप करने से सभी गुरुमंडल के गुरुओं की कृपा प्राप्त होती है ..

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:

अब जप गुरुदेव को अर्पण करे

ॐ गुह्याति गुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत कृतं जपं
सिद्धिर्भवतु मे गुरुदेव त्वतप्रसादान्महेश्वर !!

अब एक आचमनी जल अर्पण करे

अनेन पूजनेन श्री गुरुदेव सहित समस्त गुरुमंडल देवता प्रीयंताम !!

 

16 जुलाई 2026

श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली

 श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली

सद्गुरुदेव का 108 नामों से पूजन 





सद्गुरु के 108 नामों को श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली कहते हैं । इसमे नमः के साथ आप अपने गुरु के श्री चरणों मे फूल. पानी,कुमकुम,सिंदूर,चावल,अष्टगंध आदि चढ़ा सकते हैं । 


श्री सदगुरु अष्टोत्तरशत नामावली

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1) ॐ सदगुरवे नम:

2) ॐ अज्ञान नाशकाय नम:

3) ॐ अदंभिने नम:

4) ॐ अद्वैतप्रकाशकाय नम:

5) ॐ अनपेक्षाय नम:

06) ॐ अनसूयवे नम:

07) ॐ अनुपमाय नम:

08) ॐ अभयप्रदात्रे नम:

09) ॐ अमानिने नम:

10) ॐ अहिंसामूर्तये नम:

11) ॐ अहैतुकस्दयासिंधवे नम:

12) ॐ अहंकारनाशकाय नम:

13) ॐ अहंकारवर्जिताय नम:

14) ॐ आचार्येंद्राय नम:

15) ॐ आत्मसंतुष्टाय नम:

16) ॐ आनंदमूर्तये नम:

17) ॐ आर्जवयुक्ताय नम:

18) ॐ उचितवाचे नम:

19) ॐ उत्साहिने नम:

20) ॐ उदासीनाय नम:

21) ॐ उपरताय नम:

22) ॐ ऐश्वर्ययुक्ताय नम:

23) ॐ कृतकृत्याय नम:

24) ॐ क्षमावते नम:

25) ॐ गुणातीताय नम:

26) ॐ चारुवाग्विलासाय नम:

27) ॐ चारुहासाय नम:

28) ॐ छिन्नसंशयाय नम:

29) ॐ ज्ञानदात्रे नम:

30) ॐ ज्ञानयज्ञतत्पराय नम:

31) ॐ तत्त्वदर्शिने नम:

32) ॐ तपस्विने नम:

33) ॐ तापहराय नम:

34) ॐ तुल्यनिंदास्तुतये नम:

35) ॐ तुल्यप्रियाप्रियाय नम:

36) ॐ तुल्यमानापमानाय नम:

37) ॐ तेजस्विने नम:

38) ॐ त्यक्तसर्वपरिग्रहाय नम:

39) ॐ त्यागिने नम:

40) ॐ दक्षाय नम:

41) ॐ दांताय नम:

42) ॐ दृढव्रताय नम:

43) ॐ दोषवर्जिताय नम:

44) ॐ द्वंद्वातीताय नम:

45) ॐ धीमते नम:

46) ॐ धीराय नम:

47) ॐ नित्यसंतुष्टाय नम:

48) ॐ निरहंकाराय नम:

49) ॐ निराश्रयाय नम:

50) ॐ निर्भयाय नम:

51) ॐ निर्मदाय नम:

52) ॐ निर्ममाय नम:

53) ॐ निर्मलाय नम:

54) ॐ निर्मोहाय नम:

55) ॐ निर्योगक्षेमाय नम:

56) ॐ निर्लोभाय नम:

57) ॐ निष्कामाय नम:

58) ॐ निष्क्रोधाय नम:

59) ॐ नि:संगाय नम:

60) ॐ परमसुखदाय नम:

61) ॐ पंडिताय नम:

62) ॐ पूर्णाय नम:

63) ॐ प्रमाण प्रवर्तकाय नम:

64) ॐ प्रियभाषिणे नम:

65) ॐ ब्रह्मकर्मसमाधये नम:

66) ॐ ब्रह्मात्मनिष्ठाय नम:

67) ॐ ब्रह्मात्मविदे नम:

68) ॐ भक्ताय नम:

69) ॐ भवरोगहराय नम:

70) ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदात्रे नम:

71) ॐ मंगलकर्त्रे नम:

72) ॐ मधुरभाषिणे नम:

73) ॐ महात्मने नम:

74) ॐ महावाक्योपदेशकर्त्रे नम:

75) ॐ मितभाषिणे नम:

76) ॐ मुक्ताय नम:

77) ॐ मौनिने नम:

78) ॐ यतचित्ताय नम:

79) ॐ यतये नम:

80) ॐ यद इच्छा लाभ संतुष्टाय नम:

81) ॐ युक्ताय नम:

82) ॐ रागद्वेषवर्जिताय नम:

83) ॐ विदिताखिलशास्त्राय नम:

84) ॐ विद्याविनयसंपन्नाय नम:

85) ॐ विमत्सराय नम:

86) ॐ विवेकिने नम:

87) ॐ विशालहृदयाय नम:

88) ॐ व्यवसायिने नम:

89) ॐ शरणागतवत्सलाय नम:

90) ॐ शांताय नम:

91) ॐ शुद्धमानसाय नम:

92) ॐ शिष्यप्रियाय नम:

93) ॐ श्रद्धावते नम:

94) ॐ श्रोत्रियाय नम:

95) ॐ सत्यवाचे नम:

96) ॐ सदामुदितवदनाय नम:

97) ॐ समचित्ताय नम:

98) ॐ समाधिकस्वर्जिताय नम:

99) ॐ समाहितचित्ताय नम:

100) ॐ सर्वभूतहिताय नम:

101) ॐ सिद्धाय नम:

102) ॐ सुलभाय नम:

103) ॐ सुशीलाय नम:

104) ॐ सुह्रदये नम:

105) ॐ सूक्ष्मबुद्धये नम:

106) ॐ संकल्पवर्जिताय नम:

107) ॐ संप्रदायविदे नम:॥

108) ॐ स्वतंत्राय नम:॥

15 जुलाई 2026

गुरू शृंखला

   

 जगद्गुरु भगवान शिव







भगवान वेद व्यास


गौड पादाचार्य [शंकराचार्य जी के गुरु ]


जगद्गुरु आदि शंकराचार्य 



==========


ब्रह्मानंद सरस्वती



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।                                                                                                 ।
           महेश योगी                                                                     करपात्री महाराज
।                                                                                                 ।
।                                                                                                 ।
।                                                                                                 ।
                                           पूज्यपाद सद्गुरुदेव
                                                                               डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी
[परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी]
[1933-1998]



                                                 
                                              ।
                                              ।
                                               ।
-----------------------------------------------------------------------
।                                                                                                 ।
।                                                                                                 ।
।                                                                                                 ।
।                                                                                                 ।
गुरुमाता डॉ . साधना सिंह  जी                                                                       गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी
                                                                                                       
जानकारी स्त्रोत -  साधना सिद्धि विज्ञान जुलाई २००५ पेज ७०

14 जुलाई 2026

गुरुमाता डॉ. साधना सिंह : एक सिद्ध तंत्र गुरु

गुरुमाता डॉ. साधना सिंह : एक सिद्ध तंत्र गुरु




वात्सल्यमयी गुरुमाता डॉ. साधना सिंह जी महाविद्या बगलामुखी की प्रचंड , सिद्धहस्त साधिका हैं.
स्त्री कथावाचक और उपदेशक तो बहुत हैं पर तंत्र के क्षेत्र में स्त्री गुरु अत्यंत दुर्लभ हैं.

तंत्र के क्षेत्र में स्त्री गुरु का बहुत महत्व होता है.
माँ अपने शिशु को स्नेह और वात्सल्य के साथ जो कुछ भी देती है वह उसके लिए अनुकूल हो जाता है . 

स्त्री गुरु मातृ स्वरूपा होने के कारण उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र साधकों को सहज सफ़लता प्रदायक होते हैं. स्त्री गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र स्वयं में सिद्ध माने गये हैं.

वे एक  योगाचार्य और विश्वविख्यात होम्यो पैथ भी हैं । उनके लेख वर्षों तक प्रतिष्ठित पत्रिका निरोगधाम में प्रकाशित होते रहे हैं । आप उनसे अपनी असाध्य बीमारियों पर भी सलाह एप्वाइंटमेंट लेकर ले सकते हैं।

मैने तंत्र साधनाओं की वास्तविकता और उनकी शक्तियों का अनुभव पूज्यपाद सदगुरुदेव स्वामी निखिलेश्वरानंद जी [डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी ] तथा उनके बाद गुरुदेव स्वामी सुदर्शननाथ जी और गुरुमाता डॉ. साधना सिंह जी के सानिध्य में किया है ।

आप भी उनसे मिलकर प्रत्यक्ष मार्गदर्शन ले सकते हैं :-


जास्मीन - 429
न्यू मिनाल रेजीडेंसी
जे. के. रोड , भोपाल [म.प्र.]
दूरभाष : (0755)
4269368,4283681,4221116

वेबसाइट:-

www.namobaglamaa.org


यूट्यूब चेनल :-

https://www.youtube.com/@MahavidhyaSadhakPariwar

12 जुलाई 2026

निखिलेश्वरानंद स्तवन

   


गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी का सन्यस्त स्वरूप है परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जो युगपुरुष हैं उनकी महिमा को शब्दों मे समेटने का भागीरथ प्रयत्न है यह स्तवन !
इसे श्री विरल पटेल जी ने आधुनिक तकनीक से स्कैन करके सभी के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया है जिसे आप नीचे लिखे लिंक से देख सकते हैं । 


किसी भी प्रकार की जानकारी या रोज गुरुदेव के वीडियो /प्रवचन अपने व्हाट्सप्प मे प्राप्त करने के लिए आप संपर्क कर सकते हैं । 
श्री विरल पटेल 
9429400214



  

3 जुलाई 2026

गुरुदेव के आडिओ वीडियो प्रवचन : सबके लिये

   

गुरुदेव के आडिओ वीडियो प्रवचन : सबके लिये 




मेरे गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी तंत्र तथा
आयुर्वेद के ख्याति प्राप्त विद्वान थे ।
उनका जन्म 21 अप्रेल सन 1935 को हुआ था ।
उनका देहांत 3 जुलाई 1998 में हो गया । 

उन्होंने विभिन्न विषयों पर लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा
किताबें लिखी हैं ।
किताबों के विषय ज्योतिष और हस्तरेखा शास्त्र से लेकर
तंत्र और पारद विद्या तक विस्तृत है । 
विश्व का सर्वप्रथम तांत्रिक उपन्यास " शमशान भैरवी" 
उन्होंने ही लिखा था । 
जब वे किसी विषय पर बोलते थे ...
तो उस पर लगातार घंटों बोल लेते थे । 
ऐसा लगता था ....
जैसे उनके कंठ में साक्षात
भगवती सरस्वती विराजमान हो ।  

मंत्रों का और साधनाओं का
उनके पास अकूत भंडार था । 
जब वे तांत्रिक प्रयोग कराते थे...
तो 30-32 पेज के मंत्र ...
जिनको बोलने में लगभग
आधा से 1 घंटे का समय लगता है
वह बिना कोई कागज देखें बोल लेते थे ।
चारों वेद उनको कंठस्थ थे ..... 

उन्होंने अपने जीवन काल में
अनेक बड़ी-बड़ी हस्तियों को मार्गदर्शन दिया है । 
ज्योतिष के क्षेत्र में उनकी राय को
भारत का ज्योतिष जगत प्रमाणित मानता रहा है ....
भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर
भूतपूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा
और ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी तक
उनके कई प्रतिष्ठित समर्थक रहे हैं । 

उनके कई प्रयोगों के ऑडियो और वीडियो आज भी उपलब्ध हैं
जिन्हें सुनकर आप लाभ उठा सकते हैं ।  

https://www.youtube.com/@Nikhileshwaranandji


निखिलम शरणम

    


-:निखिलम शरणम :-


डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी (परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी)

    तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र के सिद्धहस्त आचार्य, ज्योतिष के प्रकांड विद्वान, कर्मकांड के पुरोधा, प्राच्य विद्याओं के विश्वविख्यात पुनरुद्धारक,अनगिनत ग्रन्थों के रचयिता तथा पूरे विश्व में फ़ैले हुए करोडों शिष्यों को साधना पथ पर उंगली पकडकर चलाने वाले मेरे परम आदरणीय गुरुवर.....
शिव स्वरूप गुरुदेव के लिये सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि....

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।। 
अर्थात :- 
यदि समुद्र रूपी दवात में काले पर्वतों को घिसकर उसकी स्याही बना दी जाये, स्वर्ग लोक के दिव्य कल्पवृक्ष की शाखाओं को तोड़ तोड़कर कलम बनाई जाए, पूरी पृथ्वी को कागज के समान प्रयोग किया जाए और स्वयं विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती अनन्त काल तक लिखती रहें, तो भी हे शिव स्वरूप गुरुदेव ! आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता ।



२ जुन १९९२ 


जब मैने परम पुज्य गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी [परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी ] से दीक्षा ली तब से आज तक मै गुरु कृपा से साधना के मार्ग पर गतिशील हूं.

अक्टूबर - १९९३

जब गुरुदेव भिलाई की धरती पर पधारे.....


.....

.....

जब जब मेरे कदम लडखडाये गुरुवर की कृपा सदैव मुझपर बनी रही.जो मेरे जीवन का आधार है.

3 जुलाई 1998

एक अपूरणीय क्षति का दिन जब मेरे गुरुवर ने अपनी भौतिक देह का त्याग किया .एक ममता भरा वात्सल्यमय साथ जो नही रहा......... ऐसा लगा जैसे सब कुछ छूट गया ..... सब कुछ समाप्त हो गया ..... 
 

और फ़िर.......

गुरु देह की सीमा से परे होते हैं यह एह्सास गुरुवर ने करा दिया और फिर यह बालक निश्चिंत होकर निकल पडा खेल के मैदान में........