जगद्गुरु भगवान शिव
[1933-1998]
एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
जगद्गुरु भगवान शिव
गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी : एक प्रचंड तंत्र साधक
साधना का क्षेत्र अत्यंत दुरुह तथा जटिल होता है. इसी लिये मार्गदर्शक के रूप में गुरु की अनिवार्यता स्वीकार की गई है.
गुरु दीक्षा प्राप्त शिष्य को गुरु का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है.
बाहरी आडंबर और वस्त्र की डिजाइन से गुरू की क्षमता का आभास करना गलत है.
एक सफ़ेद धोती कुर्ता पहना हुआ सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति भी साधनाओं के क्षेत्र का महामानव हो सकता है यह गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी से मिलकर मैने अनुभव किया.
भैरव साधना से शरभेश्वर साधना तक.......
कामकला काली से लेकर त्रिपुरसुंदरी तक .......
अघोर साधनाओं से लेकर तिब्बती साधना तक....
महाकाल से लेकर महासुदर्शन साधना तक सब कुछ अपने आप में समेटे हुए निखिल तत्व के जाज्वल्यमान पुंज स्वरूप...
गुरुदेव स्वामी सुदर्शननाथ जी
महाविद्या त्रिपुर सुंदरी के सिद्धहस्त साधक हैं.वर्तमान में बहुत कम महाविद्या सिद्ध साधक इतनी सहजता से साधकों के मार्गदर्शन के लिये उपलब्ध हैं.
आप चाहें तो उनसे संपर्क करके मार्गदर्शन ले सकते हैं :-
साधना सिद्धि विज्ञान
जास्मीन - 429
न्यू मिनाल रेजीडेंसी
जे. के. रोड , भोपाल [म.प्र.]
दूरभाष : (0755)
4269368,4283681,4221116
वेबसाइट:-
यूट्यूब चेनल :-
https://www.youtube.com/@MahavidhyaSadhakPariwar
होलिका दहन की रात्रि को सभी प्रकार के रक्षा प्रयोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।
आप भी इस अवसर पर अपने लिए रक्षा रुद्राक्ष, रक्षा कडा या रक्षा माला बना सकते हैं ।
इसके लिए एक लाल कपड़े मे एक सूखे नारियल के साथ संबंधित वस्तु को आप सामने रख लेंगे और हाथ मे जल लेकर महामाया महाकाली से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हुए अपनी इच्छा बोल देंगे और जल जमीन पर छोड़ देंगे ।
इसके बाद आपको जैसा ज्ञान हो वैसा महाकाली का पूजन कर लेंगे और नीचे लिखे मंत्र का 1008 बार जप कर लेंगे । गिनती के लिए आप कागज पेंसिल, दाना , माला, काउंटिंग मशीन किसी भी चीज का उपयोग कर सकते हैं ।
।। हुं हुं ह्रीं ह्रीं कालिके घोर दन्ष्ट्रे प्रचन्ड चन्ड नायिके दानवान दारय हन हन शरीरे महाविघ्न छेदय छेदय स्वाहा हुं फट ।।
जाप के बाद माल, अंगूठी, कडा, धागा को धारण कर लेंगे । उस सूखे नारियल को अपने सिर से तीन बार उतारा करके लाल कपड़े मे लपेट कर उसे होली की अग्नि मे डाल देंगे । यदि आपके आसपास होली न जल रही हो तो घर मे ही लकड़ी जलाकर उसमे उसे जला देंगे । यह सारा काम आपको होलिका दहन की रात्री मे ही कर लेना है ।
अलबेले : भगवान शिव
भगवान शिव का स्वरुप अन्य देवी देवताओं से बिल्कुल अलग है।
जहां अन्य देवी-देवताओं को वस्त्रालंकारों से सुसज्जित
और सिंहासन पर विराजमान माना जाता है,
वहां ठीक इसके विपरीत शिव पूर्ण दिगंबर हैं,
अलंकारों के रुप में सर्प धारण करते हैं
और श्मशान भूमि पर सहज भाव से अवस्थित हैं।
उनकी मुद्रा में चिंतन है,
तो निर्विकार भाव भी है!
आनंद भी है और लास्य भी।
भगवान शिव को सभी विद्याओं का जनक भी माना जाता है।
वे तंत्र से लेकर मंत्र तक और योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि हैं और अंत भी।
यही नही वे संगीत के आदिसृजनकर्ता भी हैं, और नटराज के रुप में कलाकारों के आराध्य भी हैं।
वास्तव में भगवान शिव देवताओं में सबसे अद्भुत देवता हैं ।
वे देवों के भी देव होने के कारण ÷महादेव' हैं तो, काल अर्थात समय से परे होने के कारण ÷महाकाल' भी हैं ।
वे देवताओं के गुरू हैं तो, दानवों के भी गुरू हैं ।
देवताओं में प्रथमाराध्य, विघ्नों के कारक व निवारणकर्ता, भगवान गणपति के पिता हैं
तो,जगद्जननी मां जगदम्बा के पति भी हैं ।
वे कामदेव को भस्म करने वाले हैं तो,कामेश्वर' भी हैं ।
तंत्र साधनाओं के जनक हैं तो संगीत के आदिगुरू भी हैं ।
उनका स्वरुप इतना विस्तृत है कि उसके वर्णन का सामर्थ्य शब्दों में भी नही है।सिर्फ इतना कहकर ऋषि भी मौन हो जाते हैं किः-
असित गिरी समम् स्याद कज्जलं सिन्धु पात्रे , सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्र मुर्वी
लिखती यदि शारदा सर्वकालं ,तदपि तव गुणानाम ईश पारं न याति
अर्थात यदि समस्त पर्वतों को, समस्त समुद्रों के जल में पीसकर उसकी स्याही बनाइ जाये, और संपूर्ण वनों के वृक्षों को काटकर उसको कलम या पेन बनाया जाये और स्वयं साक्षात, विद्या की अधिष्ठात्री, देवी सरस्वती उनके गुणों को लिखने के लिये अनंतकाल तक बैठी रहें तो भी उनके गुणों का वर्णन कर पाना संभव नही होगा। वह समस्त लेखनी घिस जायेगी! पूरी स्याही सूख जायेगी मगर उनका गुण वर्णन समाप्त नही होगा। ऐसे भगवान शिव का पूजन अर्चन करना मानव जीवन का सौभाग्य है ।
||ॐ त्रयम्बकं यजामहे उर्वा रुकमिव स्तुता वरदा प्रचोदयंताम आयु: प्राणं प्रजां पशुं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्वा व्रजम ब्रह्मलोकं ||
दक्षिणामूर्ति शिव
दक्षिणामूर्ति शिव भगवान शिव का सबसे तेजस्वी स्वरूप है । यह उनका आदि गुरु स्वरूप है । इस रूप की साधना सात्विक भाव वाले सात्विक मनोकामना वाले तथा ज्ञानाकांक्षी साधकों को करनी चाहिये ।