जगद्गुरु भगवान शिव
[1933-1998]
एक प्रयास सनातन धर्म[Sanatan Dharma] के महासमुद्र मे गोता लगाने का.....कुछ रहस्यमयी शक्तियों [shakti] से साक्षात्कार करने का.....गुरुदेव Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji [ Nikhileswaranand Ji] की कृपा से प्राप्त Mantra Tantra Yantra विद्याओं को समझने का...... Kali, Sri Yantra, Laxmi,Shiv,Kundalini, Kamkala Kali, Tripur Sundari, Maha Tara ,Tantra Sar Samuchhay , Mantra Maharnav, Mahakal Samhita, Devi,Devata,Yakshini,Apsara,Tantra, Shabar Mantra, जैसी गूढ़ विद्याओ को सीखने का....
जगद्गुरु भगवान शिव
साधना मे रक्षा हेतु हनुमान शाबरमंत्र
· इस शाबर मंत्र को किसी शुभ दिन जैसे ग्रहण, होली, रवि पुष्य योग, गुरु पुष्य योग मे1008 बार जप कर सिद्ध कर ले ।
· इस मंत्र का जाप आप एकांत/हनुमान मंदिर/अपने घर मे करें |
· हनुमान जी का विधी विधान से पुजन करके 11 लड्डुओ का भोग लगा कर जप शुरू कर दे । जप समाप्त होने पर हनुमान जी को प्रणाम करे | त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना कर लें |
· जब भी आप कोई साधना करे |तो मात्र 7 बार इस मंत्र का जाप करके रक्षा घेरा बनाने से स्वयं हनुमान जी रक्षा करते है ।
· इस मंत्र का 7 बार जप कर के ताली बजा देने से भी पूर्ण तरह से रक्षाहोती है ।
इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद रोज इस मंत्र की 1 माला जाप करने पर इसका तेज बढ़ता जाता है और टोना जादु साधक पर असर नही करते ।
मंत्र :-
॥ ओम नमो वज्र का कोठा,
जिसमे पिंण्ड हमारा पैठा,
ईश्वर कुंजी ब्रम्हा का ताला,
मेरे आठो अंग का,
यति हनुमंत वज्र वीर रखवाला ।
हनुमान चालीसा से बनायें रक्षा कवच
हनुमान चालीसा एक बेहद लोकप्रिय उपाय है जो बहुत सारे लोग प्रयोग में लाते हैं ।
इसकी भाषा सरल है इसलिए कोई भी इसका प्रयोग कर सकता है ।
हनुमान जी अमर है ! चिरंजीवी है !!
इसलिए उनकी उपस्थिति आज भी पृथ्वी पर महसूस की जाती है ।
रक्षा कवच
हनुमान चालीसा को रक्षा कवच के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है ।
इसके लिए एक छोटे आकार की हनुमान चालीसा ले लें । उसे रखने लायक गेरुए कलर का कपड़ा ले लें जिसमे आप उसे लपेट कर रख सकें या उससे छोटा पॉकेट जैसा बना लें ।
हनुमान जयंती से या किसी भी पूर्णिमा के दिन से प्रारंभ करें और उस हनुमान चालीसा के 11 पाठ रोज करें , ऐसा अगली पूर्णिमा तक करें यानी कुल मिलाकर लगभग 30 दिनों तक आपका पाठ होगा । पाठ हो जाने के बाद उसे उस कपड़े या पॉकेट में बंद करके रख ले । उसे इस प्रकार से रखें कि कोई दूसरा व्यक्ति उसे स्पर्श ना कर सके । यानी आपको 30 दिनों तक उसे दूसरों से छुपा कर रखना है ॥
पूर्णिमा से पूर्णिमा तक पाठ कर लेने के बाद आप उस हनुमान चालीसा को उस कपड़े में लपेटकर हमेशा अपने साथ रखें तथा नित्य एक बार हनुमान चालीसा का पाठ करें जिससे आपको सभी प्रकार के बाधाओं में हनुमान जी की कृपा से रक्षा प्राप्त होगी ।
हनुमान जी पर चोला चढ़ाने की सरल विधि

हनुमान जी के 108 नाम
1 ॐ अक्षहन्त्रे नमः।
2 ॐ अन्जनागर्भ सम्भूताय नमः।
3 ॐ अशोकवनकाच्छेत्रे नमः।
4 ॐ आञ्जनेयाय नमः।
5 ॐ कपिसेनानायकाय नमः।
6 ॐ कपीश्वराय नमः।
7 ॐ कबळीकृत मार्ताण्डमण्डलाय नमः।
8 ॐ काञ्चनाभाय नमः।
9 ॐ कामरूपिणे नमः।
10 ॐ काराग्रह विमोक्त्रे नमः।
11 ॐ कालनेमि प्रमथनाय नमः।
12 ॐ कुमार ब्रह्मचारिणे नमः।
13 ॐ केसरीसुताय नमः।
14 ॐ गन्धमादन शैलस्थाय नमः।
15 ॐ गन्धर्व विद्यातत्वज्ञाय नमः।
16 ॐ चञ्चलाय नमः।
17 ॐ चतुर्बाहवे नमः।
18 ॐ चिरञ्जीविने नमः।
19 ॐ जाम्बवत्प्रीतिवर्धनाय नमः।
20 ॐ तत्वज्ञानप्रदाय नमः।
21 ॐ दशग्रीव कुलान्तकाय नमः।
22 ॐ दशबाहवे नमः।
23 ॐ दान्ताय नमः।
24 ॐ दीनबन्धुराय नमः।
25 ॐ दृढव्रताय नमः।
26 ॐ दैत्यकार्य विघातकाय नमः।
27 ॐ दैत्यकुलान्तकाय नमः।
28 ॐ धीराय नमः।
29 ॐ नवव्याकृतपण्डिताय नमः।
30 ॐ पञ्चवक्त्राय नमः।
31 ॐ परमन्त्र निराकर्त्रे नमः।
32 ॐ परयन्त्र प्रभेदकाय नमः।
33 ॐ परविद्या परिहाराय नमः।
34 ॐ परशौर्य विनाशनाय नमः।
35 ॐ पारिजात द्रुमूलस्थाय नमः।
36 ॐ पार्थ ध्वजाग्रसंवासिने नमः।
37 ॐ पिङ्गलाक्षाय नमः।
38 ॐ प्रतापवते नमः।
39 ॐ प्रभवे नमः।
40 ॐ प्रसन्नात्मने नमः।
41 ॐ प्राज्ञाय नमः।
42 ॐ बल सिद्धिकराय नमः।
43 ॐ बालार्कसद्रशाननाय नमः।
44 ॐ ब्रह्मास्त्र निवारकाय नमः।
45 ॐ भविष्यथ्चतुराननाय नमः।
46 ॐ भीमसेन सहायकृते नमः।
47 ॐ मनोजवाय नमः।
48 ॐ महाकायाय नमः।
49 ॐ महातपसे नमः।
50 ॐ महातेजसे नमः।
51 ॐ महाद्युतये नमः।
52 ॐ महाबल पराक्रमाय नमः।
53 ॐ महारावण मर्दनाय नमः।
54 ॐ महावीराय नमः।
55 ॐ मायात्मने नमः।
56 ॐ मारुतात्मजाय नमः।
57 ॐ योगिने नमः।
58 ॐ रक्षोविध्वंसकारकाय नमः।
59 ॐ रत्नकुण्डल दीप्तिमते नमः।
60 ॐ रामकथा लोलाय नमः।
61 ॐ रामचूडामणिप्रदायकाय नमः।
62 ॐ रामदूताय नमः।
63 ॐ रामभक्ताय नमः।
64 ॐ रामसुग्रीव सन्धात्रे नमः।
65 ॐ रुद्र वीर्य समुद्भवाय नमः।
66 ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः।
67 ॐ लङ्कापुर विदायकाय नमः।
68 ॐ लन्किनी भञ्जनाय नमः।
69 ॐ लोकपूज्याय नमः।
70 ॐ वज्रकायाय नमः।
71 ॐ वज्रदेहाय नमः।
72 ॐ वज्रनखाय नमः।
73 ॐ वागधीशाय नमः।
74 ॐ वाग्मिने नमः।
75 ॐ वानराय नमः।
76 ॐ वार्धिमैनाक पूजिताय नमः।
77 ॐ जितेन्द्रियाय नमः।
78 ॐ विभीषण प्रियकराय नमः।
79 ॐ शतकन्टमुदापहर्त्रे नमः।
80 ॐ शरपञ्जर भेदकाय नमः।
81 ॐ शान्ताय नमः।
82 ॐ शूराय नमः।
83 ॐ शृन्खला बन्धमोचकाय नमः।
84 ॐ श्री राम हृदयस्थाये नमः
85 ॐ श्रीमते नमः।
86 ॐ संजीवननगायार्था नमः।
87 ॐ सर्वग्रहबाधा विनाशिने नमः।
88 ॐ सर्वतन्त्र स्वरूपिणे नमः।
89 ॐ सर्वदुखः हराय नमः।
90 ॐ सर्वबन्धविमोक्त्रे नमः।
91 ॐ सर्वमन्त्र स्वरूपवते नमः।
92 ॐ सर्वमायाविभंजनाय नमः।
93 ॐ सर्वयन्त्रात्मकाय नमः।
94 ॐ सर्वरोगहराय नमः।
95 ॐ सर्वलोकचारिणे नमः।
96 ॐ सर्वविद्या सम्पत्तिप्रदायकाय नमः।
97 ॐ सागरोत्तारकाय नमः।
98 ॐ सिंहिकाप्राण भञ्जनाय नमः।
99 ॐ सीतादेविमुद्राप्रदायकाय नमः।
100 ॐ सीतान्वेषण पण्डिताय नमः।
101 ॐ सीताशोक निवारकाय नमः।
102 ॐ सीतासमेत श्रीरामपाद सेवदुरन्धराय नमः।
103 ॐ सुग्रीव सचिवाय नमः।
104 ॐ सुचये नमः।
105 ॐ सुरार्चिताय नमः।
106 ॐ स्फटिकाभाय नमः।
107 ॐ हनूमते नमः।
108 ॐ हरिमर्कट मर्कटाय नमः।
इन नामों का उच्चारण करें नमः के साथ चावल, सिंदूर,पुष्प,जल अर्पित करें ।
नवरात्रि हवन की सरल विधि:-
नवरात्रि मे आप चाहें तो रोज या फिर आखिरी मे हवन कर सकते हैं ।
यह विधि सामान्य गृहस्थों के लिए है जो ज्यादा विधि विधान नहीं कर सकते हैं ।. जो साधक हैं या कर्मकाँड़ी हैं वे अपने गुरु से प्राप्त विधि विधान या प्रामाणिक ग्रंथों से विधि देखकर सम्पन्न करें ।। मेरी राय मे चंडी प्रकाशन, गीता प्रेस, चौखम्बा प्रकाशन, आदि से प्रकाशित ग्रंथों मे त्रुटियाँ काम रहती हैं ।.
आवश्यक सामग्री :-
1. दशांग या हवन सामग्री , दुकान पर आपको मिल जाएगा .
2. घी ( अच्छा वाला लें , भले कम लें , पूजा वाला घी न लें क्योंकि वह ऐसी चीजों से बनता है जिसे आपको खाने से दुकानदार मना करता है तो ऐसी चीज आप देवी को कैसे अर्पित कर सकते हैं )
3. कपूर आग जलाने के लिए .
4. एक नारियल गोला या सूखा नारियल पूर्णाहुति के लिए ,
5. हवन कुंड या गोल बर्तन ।.
हवनकुंड/ वेदी को साफ करें.
हवनकुंड न हो तो गोल बर्तन मे कर सकते हैं .
फर्श गरम हो जाता है इसलिए नीचे स्टैन्ड या ईंट , रेती रखें उसपर पात्र रखें.
कुंड मे लकड़ी जमा लें और उसके नीचे में कपूर रखकर जला दें.
हवनकुंड की अग्नि प्रज्जवलित हो जाए तो पहले घी की आहुतियां दी जाती हैं.
सात बार अग्नि देवता को आहुति दें और अपने हवन की पूर्णता की प्रार्थना करें
“ ॐ अग्नये स्वाहा “
इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें-
ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये न मम् ।
ॐ इन्द्राय स्वाहा । इदं इन्द्राय न मम् ।
ॐ अग्नये स्वाहा । इदं अग्नये न मम ।
ॐ सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय न मम ।
ॐ भूः स्वाहा ।
उसके बाद हवन सामग्री से हवन करें .
नवग्रह मंत्र :-
ऊँ सूर्याय नमः स्वाहा
ऊँ चंद्रमसे नमः स्वाहा
ऊं भौमाय नमः स्वाहा
ऊँ बुधाय नमः स्वाहा
ऊँ गुरवे नमः स्वाहा
ऊँ शुक्राय नमः स्वाहा
ऊँ शनये नमः स्वाहा
ऊँ राहवे नमः स्वाहा
ऊँ केतवे नमः स्वाहा
गायत्री मंत्र :-
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् ।
ऊं गणेशाय नम: स्वाहा,
ऊं भैरवाय नम: स्वाहा,
ऊं गुं गुरुभ्यो नम: स्वाहा,
ऊं कुल देवताभ्यो नम: स्वाहा,
ऊं स्थान देवताभ्यो नम: स्वाहा,
ऊं वास्तु देवताभ्यो नम: स्वाहा,
ऊं ग्राम देवताभ्यो नम: स्वाहा,
ॐ सर्वेभ्यो गुरुभ्यो नमः स्वाहा ,
ऊं सरस्वती सहित ब्रह्माय नम: स्वाहा,
ऊं लक्ष्मी सहित विष्णुवे नम: स्वाहा,
ऊं शक्ति सहित शिवाय नम: स्वाहा
माता के नर्वाण मंत्र से 108 बार आहुतियां दे
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै स्वाहा
हवन के बाद नारियल के गोले में कलावा बांध लें. चाकू से उसके ऊपर के भाग को काट लें. उसके मुंह में घी, हवन सामग्री आदि डाल दें.
पूर्ण आहुति मंत्र पढ़ते हुए उसे हवनकुंड की अग्नि में रख दें.
पूर्णाहुति मंत्र-
ऊँ पूर्णमद: पूर्णम् इदम् पूर्णात पूर्णम उदिच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते ।।
इसका अर्थ है :-
वह पराशक्ति या महामाया पूर्ण है , उसके द्वारा उत्पन्न यह जगत भी पूर्ण हूँ , उस पूर्ण स्वरूप से पूर्ण निकालने पर भी वह पूर्ण ही रहता है ।
वही पूर्णता मुझे भी प्राप्त हो और मेरे कार्य , अभीष्ट मे पूर्णता मिले ....
इस मंत्र को कहते हुए पूर्ण आहुति देनी चाहिए.
उसके बाद यथाशक्ति दक्षिणा माता के पास रख दें,
फिर आरती करें.
अंत मे क्षमा प्रार्थना करें.
माताजी को समर्पित दक्षिण किसी गरीब महिला या कन्या को दान मे दें ।
नवरात्रि पर देवी साधना कैसे करें ?
नवरात्रि पर देवी साधनाएं करने की इच्छा सभी की होती है । अधिकांश लोग नियमों मान्यताओं और डर आदि की वजह से घबराते हैं या झिझकते हैं कि....
कुछ गड़बड़ न हो जाए !
मातारानी क्रोधित होकर कोई नुकसान न कर दे !
आदि आदि.....
वास्तव में ऐसा झिझकने लायक कुछ नहीं है ।
जगदंबा संपूर्ण सृष्टि की माता है और वह बच्चों की गलतियों को क्षमा कर देती है । इसलिए आप जैसे और जितना अपनी क्षमतानुसार कर पाएंगे वैसा पूरी श्रद्धा से करें आपको अनुकूलता और महामाया की कृपा अवश्य मिलेगी ।
जगदंबा का आशीर्वाद और कृपा हर क्षेत्र मे सहायक होती ही है ..... इसीलिए हमारे सनातन धर्म मे शक्ति साधनाओं को इतना महत्व दिया गया है ।
आप देखें तो विश्व में सबसे शक्तिशाली नेताओं में मोदी जी की गिनती होती है । वह भगवती जगदंबा के प्रबल भक्त हैं । ऐसे भक्त जो नवरात्रि के समय में पूरी श्रद्धा के साथ निर्जला व्रत भी रखते हैं....
इसी प्रकार से अगर आप इतिहास के पन्नों में जाएं तो आपको पता चलेगा कि जितने भी अत्यंत उच्च कोटि के वीर और साहसी राजा या योद्धा हुए हैं वे सभी के सभी आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न थे । किसी न किसी इष्ट की प्रबल भक्ति और साधना से उनके अंदर जागृत हुई अध्यात्मिक शक्ति, उनकी शारीरिक शक्तियों और प्रतिभा को कई कई गुना बढ़ा देती थी जिसके चलते वे असामान्य अभूतपूर्व और असंभव से लगने वाले कार्यों को भी संपन्न कर पाते थे ।
एक उदाहरण ले लीजिए....
महाकवि कालिदास, विश्व के श्रेष्ठतम पद्य रचयिता माने जाते हैं । उनकी कविताओं की टक्कर की कविता आज तक न किसी ने लिखी है और संभवत कोई लिख भी नहीं पाएगा...
उनका कवित्व तब प्रस्फुटित हुआ था जब वह महाकाली की साधना में संलग्न हुए थे .....
स्वर कोकिला लता दीदी यानी लता मंगेशकर जी वाग्देवी की प्रबल साधिका थी..... अब यह बताने की जरूरत नहीं है कि माँ शारदा साक्षात उनके कंठ में निवास करती थी........
छत्रपति शिवाजी से लेकर महाराणा प्रताप तक जितने भी वीर प्रचंड योद्धा हुए हैं सब अपने अपने इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पित रहे हैं.....
उनका आध्यात्मिक बल इतना प्रचंड रहा है कि वह उन्हे उनसे कई गुना शक्तिशाली शत्रु पर भी भारी पड़ने के लिए समर्थ कर देता था.....
मुझे ऐसा लगता है कि जीवन में आप किसी भी क्षेत्र में हों यदि आप सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो आपके अंदर....
आध्यात्मिक शक्ति का अंश भी होना चाहिए !
देवी कृपा भी होनी चाहिए !!
भगवती जगदंबा का आशीर्वाद होना चाहिए !!!
यह बहुत कठिन कार्य नहीं है । हमारे साथ दिक्कत यह है कि हमारे पास जब समस्या आती है, उस समय हम मंदिर की ओर दौड़ लगाते हैं । वहां जाकर रोना गाना करके वापस आ जाते हैं । उसमें भी हमारे कई काम हो जाते हैं तो आप स्वयं सोचे कि अगर आप नित्य प्रति निष्ठा के साथ सम्मान के साथ श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवती जगदंबा की आराधना, पूजन, चिंतन, मंत्र जाप करेंगे तो वे स्वयं कितनी कृपालु हो जाएंगी ।
उन का वरद हस्त आपको अपने क्षेत्र में एक अद्भुत व्यक्तित्व बनाने की क्षमता रखता है । आप अगर इस बात पर विश्वास नहीं रखते हैं तो उसका उदाहरण मैं स्वयं हूँ । एक मामूली सा व्यक्ति जो संयोग से एक तंत्र गुरु से दीक्षा ले पाया, उनकी कृपा से भगवती की साधना की विधियां समझ पाया । एक लंबे समय..... यूं समझ लीजिए 10 साल 15 साल उनका मंत्र जाप निष्ठा के साथ करता रहा । आज आप देख लीजिए कि लिखते हुए मुश्किल से मुझे चार साल हुए हैं ....
और आप जैसे कितने लोग मुझे जानते हैं....
कितने लोगों की यह लगता है कि यह व्यक्ति वास्तव में आध्यात्मिक क्षेत्र में कुछ दखल रखता है....
यह सब प्रतिभा विकसित होती है भगवती जगदंबा के आशीर्वाद से......
मुझे यह कहते हुए जरा भी संकोच नहीं है कि मैं एक बिल्कुल आम और सामान्य सा मूर्ख आदमी हूं जिसके अंदर कमजोरियाँ और कमियाँ भरी पड़ी हैं......
आप जो भी लेखन देखते हैं जो भी मेरा लिखा हुआ पढ़ते हैं वह सब उसकी अहेतुकी कृपा है.....
उसका आशीर्वाद है कि वह मुझे जैसे मूढ़ व्यक्ति से भी इतना कुछ लिखवा लेती है ।
बिल्कुल ऐसा ही आपके साथ भी संभव है !
बस जरूरत इसकी है कि आप पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ नवरात्रि में जाप करें !
नित्य जाप करें !
उन्हें अपनी माता के रूप में देखें !
अपने आप को उनके शिशु के रूप में देखें !!
जैसा कर सकते हों !
जितना कर सकते हों !
उतना पूरे विश्वास और श्रद्धा से समर्पण भाव से एक शिशु के जैसे भाव से करिये......
यकीन मानिए उसके बाद फिर जो घटित होगा उसका शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता ।
वह एक ऐसी स्थिति होती है कि बस आप कुछ बन जाते हैं....
कुछ ऐसा..... जो लोगों को एहसास करा देता है कि यह औरों से अलग है ....
इसमे कुछ तो स्पेशल है ......
अगर आप स्पेशल बनना चाहते हैं तो मैं आपका स्वागत करता हूं साधना के जगत में.....
आप आइए और इन विद्याओं को, इन शक्तियों को प्राप्त करने के प्रयासों को समझें, मंत्र जाप करें और जीवन में सफलता प्राप्त करें....
प्राचीन काल मे गुरु को खोजने के लिए जंगल जंगल भटकना पड़ता था । उसकी सेवा टहल मे बरसों बिताने पड़ते थे तब एकाध मंत्र या साधना मिल पाती थी ....
आज कि स्थिति अलग है .... आप इतना सब नहीं कर सकते ....
इसलिए आज के युग मे स्वामी सुदर्शन नाथ और गुरुमाता डा साधना सिंह जैसे गुरु सहजता से समाज के बीच मे उपलब्ध हैं । आप उनसे मिलेंगे तो ऐसा लगेगा जैसे अपने परिवार के ही किसी सदस्य से मिल रहे हैं । न किसी प्रकार का तामझाम और न ही किसी प्रकार का प्रपंच !
एक सामान्य लोगों के रहने वाली कॉलोनी मे एक सामान्य से घर मे बिलकुल एक सामान्य गृहस्थ जैसे !
आप उनसे मिल सकते हैं !
दीक्षा ले सकते हैं !
मंत्र और साधनाएं प्राप्त कर सकते हैं !
साधना के दौरान आने वाली किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान मांग सकते हैं ....
सबसे बड़ी बात यह कि आप उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर बातचीत कर सकते हैं .....
ऐसे गुरु से जो साधनाओं के शिखर पर बैठकर भी आपके लिए सहज उपलब्ध है .....
ऐसे अवसर का लाभ उठाएँ । उनसे मिलें अपने फील्ड से संबन्धित दीक्षा और मंत्र प्राप्त करें । नित्य जाप करें और फिर दस साल के बाद आप मुड़कर देखेंगे तो एहसास करेंगे कि ...
हाँ ! मैं स्पेशल बन चुका हूँ .... कुछ ऐसा जो शायद मेरे पूरे खानदान मे नहीं है ......
गुरुदेव से संपर्क का पता :-
साधना सिद्धि विज्ञान कार्यालय -जैस्मिन – 429, न्यू मिनाल रेसिडेंसी, जे.के.रोड, भोपाल,म.प्र.
फोन नंबर - 0755-4269368
सिद्धकुंजिका स्तोत्रम : भावार्थ सहित
शिव उवाच -----
श्रूणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिका स्तोत्रमुत्तमम ।
येन मंत्रप्रभावेण चण्डीजाप: शुभो भवेत ॥ १॥
अर्थ - शिव जी बोले-देवी! सुनो। मैं उत्तम कुंजिका स्तोत्र बताता हूँ, जिस मन्त्र(स्तोत्र) के प्रभाव से देवी का जप (पाठ) शुभ (सफल) होता है ।
न कवचं न अर्गला स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम ।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वा अर्चनं ॥ २॥
अर्थ - (इसका पाठ करने से)कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है ।
कुंजिका पाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत ।
अति गुह्यतरं देवी देवानामपि दुर्लभं ॥ ३॥
अर्थ - केवल कुंजिका स्तोत्र के पाठ कर लेने से दुर्गापाठ का फल प्राप्त हो जाता है। (यह कुंजिका) अत्यंत गोपनीय और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है अर्थात इतना महत्वपूर्ण है ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यं स्तंभनं उच्चाटनादिकम ।
पाठ मात्रेण संसिद्धयेत कुंजिकास्तोत्रं उत्तमम ॥ ४ ॥
अर्थ - हे पार्वती! जिस प्रकार स्त्री अपने गुप्त भाग (स्वयोनि) को सबसे गुप्त रखती है अर्थात छुपाकर या ढँककर रखती है उसी भांति इस कुंजिका स्तोत्र को भी प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। यह कुंजिकास्तोत्र इतना उत्तम (प्रभावशाली ) है कि केवल इसके पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि (अभिचारिक षट कर्मों ) को सिद्ध करता है ( अभीष्ट फल प्रदान करता है ) ।
अथ मंत्र : ।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट स्वाहा ॥ इति मंत्र: ॥
नमस्ते रुद्ररुपिण्ये नमस्ते मधुमर्दिनि ।
नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥
अर्थ - हे रुद्ररूपिणी! तुम्हे नमन है । हे मधु नामक दैत्य का मर्दन करने (मारने) वाली! तुम्हे नमस्कार है। कैटभ और महिषासुर नामक दैत्यों को मारने वाली माई ! मैं आपके श्री चरणों मे प्रणाम करता हूँ ।.
नमस्ते शूम्भहंत्र्यै च निशुंभासुरघातिनि ॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥
अर्थ - दैत्य शुम्भ का हनन करने (मारने) वाली और दैत्य निशुम्भ का घात करने (मारने) वाली! माता मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ आप मेरे जप (पाठ द्वारा इस कुंजिका स्तोत्र)को जाग्रत और (मेरे लिए)सिद्ध करो।
ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरुपिण्यै बीजरुपे नमोस्तुते ॥3॥
अर्थ - ऐंकार ( ऐं बीज मंत्र जो कि सृष्टि कर्ता ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती का बीज मंत्र है ) के रूप में सृष्टिरूपिणी( उत्पत्ति करने वाली ), ‘ह्रीं’ ( भुवनेश्वरी महालक्ष्मी बीज जो कि पालन कर्ता श्री हरि विष्णु की शक्ति है )के रूप में सृष्टि का पालन करने वाली क्लीं (काम / काली बीज )के रूप में क्रियाशील होने वाली बीजरूपिणी (सबका मूल या बीज स्वरूप वाली ) हे देवी! मैं तुम्हे बारम्बार नमस्कार करता हूँ ।
चामुंडा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनि ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररुपिणि ॥4॥
अर्थ - (नवार्ण मंत्र मे प्रयुक्त "चामुंडायै" शब्द मे )"चामुंडा" के रूप में तुम मुण्ड(अहंकार और दुष्टता का) विनाश करने वाली हो, और ‘यैकार’ के रूप में वर देने वाली (भक्त की रक्षा और उसकी मनोकामना की पूर्ति प्रदान करने वाली )हो । ’विच्चे’ रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो।(इस प्रकार आप स्वयं नवार्ण मंत्र "ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ") मन्त्र का स्वरुप हो ।
धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥
धां धीं धूं’ के रूप में धूर्जटी (शिव) की तुम पत्नी हो। ‘वां वीं वूं’ के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। ‘क्रां क्रीं क्रूं’ के रूप में कालिकादेवी, ‘शां शीं शूं’ के रूप में मेरा शुभ अर्थात कल्याण करो, मेरा अभीष्ट सिद्ध करो ।.
हुं हुं हुंकाररुपिण्यै जं जं जं जंभनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम: ॥6॥
बीजमंत्रों मे (वायु बीज)'हुं हुं हुंकार’ के स्वरूप वाली , ‘जं जं जं’ (जं बीज का नाद करने वाली)जम्भनादिनी, ‘भ्रां भ्रीं भ्रूं’ के रूप में (भैरव बीज स्वरूपा भैरवी शक्ति ), संसार मे भद्रता(सज्जनता) की स्थापना करने वाली हे भवानी! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ ।.
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥7॥
।।7।।’अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ’ इन सब बीज मंत्रों को जागृत करो, मेरे सभी पाशों को तोड़ो और मेरी चेतना को दीप्त ( प्रकाशित या उज्ज्वल प्रकाशमान ) करो, और (न्युनताओं को भस्मीभूत ) स्वाहा करो ।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धीं कुरुष्व मे ॥8॥
’पां पीं पूं’ के रूप में तुम पार्वती अर्थात भगवान शिव की पूर्णा शक्ति हो। ‘खां खीं खूं’ के रूप में तुम खेचरी (आकाशचारिणी) या परा शक्ति हो।।8।।’सां सीं सूं’ स्वरूपिणी सप्तशती देवी के इस विशिष्ट मन्त्र की मुझे सिद्धि प्रदान करो।
फलश्रुति:-
इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ॥ अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥
यह सिद्धकुंजिका स्तोत्र (नवार्ण) मन्त्र को जगाने(चैतन्य करने /सिद्धि प्रदायक बनाने) के लिए है। इसे भक्तिहीन पुरुष को नहीं देना चाहिए। हे पार्वती ! इस मन्त्र को गुप्त रखकर इसकी रक्षा करनी चाहिए ।.
यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत ॥ न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥
हे देवी ! जो बिना कुंजिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में (निर्जन स्थान पर जहां कोई देखने सुनने वाला न हो ) रोना निरर्थक होता है।
इति श्री रुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम ॥
वर्तमान समय मे मेरे गुरुदेव डा नारायण दत्त श्रीमाली जी को सर्वश्रेष्ठ तंत्र मंत्र मर्मज्ञ के रूप मे निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है । आप उनके द्वारा सम्पन्न कराये गए विभिन्न मंत्र प्रयोगों को यूट्यूब पर सर्च करके देख और सुन सकते हैं । उनके प्रत्येक प्रयोग मे आप देख सकते हैं कि वे रक्षा के लिए कुंजिका स्तोत्र का ही पाठ प्रारम्भ मे करवाते थे । इसी से आप इसका महत्व और शक्ति को समझ सकते हैं ।.
नवरात्रि मे इसका 108 पाठ या जितना आप कर सकें दीपक जलाकर सम्पन्न करें और उसके बाद नित्य एक बार इसका पाठ करें तो आपके ऊपर छोटे मोटे तंत्र प्रयोग, टोने टोटके का असर ही नहीं होगा और बड़े तंत्र प्रयोग जैसे मारण अगर किए गए तो भी वे घातक नहीं हो पाएंगे । भगवती का यह सिद्ध स्तोत्र आपकी रक्षा कर लेगा ।