14 जुलाई 2025

दक्षिणामूर्ति शिव

दक्षिणामूर्ति शिव 

दक्षिणामूर्ति शिव भगवान शिव का सबसे तेजस्वी स्वरूप है । यह उनका आदि गुरु स्वरूप है । इस रूप की साधना सात्विक भाव वाले सात्विक मनोकामना वाले तथा ज्ञानाकांक्षी साधकों को करनी चाहिये ।





॥ऊं ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः ॥

  • ब्रह्मचर्य का पालन करें.
  • ब्रह्ममुहूर्त यानि सुबह ४ से ६ के बीच जाप करें.
  • सफेद वस्त्र , आसन , होगा.
  • दिशा इशान( उत्तर और पूर्व के बीच ) की तरफ देखकर करें.
  • भस्म से त्रिपुंड लगाए . 
  • रुद्राक्ष की माला पहने .
  • रुद्राक्ष की माला से जाप करें.
.

13 जुलाई 2025

नटराज : कामेश्वर : शिव

 नटराज : कामेश्वर : शिव



यह मंत्र उनके लिए है जो .....
जीवन को एक उत्सव मानते हैं ....
उल्लास जिनकी जीवन शैली है ....
मुस्कान जिनके होंठों का श्रृंगार है.....
सहजता जिनकी प्रवृत्ति है ..................


....................यह शिवत्व की यात्रा है...........


॥ क्रीं आनंद ताण्डवाय नमः ॥

आनंद और उल्लास के साथ नृत्य के साथ इस मन्त्र का जाप करें.....

और फ़िर कहीं कुछ होगा, ऐसा जो अद्भुत होगा
बाकी शिव इच्छा.......

महामृत्युंजय मंत्र

 महामृत्युंजय मंत्र




त्रयंबकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, ।.

उर्वारुकमिव बंधनात मृत्युर्मुक्षीय मामृतात ॥ 


बीजमंत्र संपुटित महामृत्युंजय शिव मंत्रः-

॥ ऊं हौं ऊं जूं ऊं सः ऊं भूर्भुवः ऊं स्वः ऊं त्रयंबकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुकमिव बंधनात मृत्युर्मुक्षीय मामृतात ऊं स्वः ऊं भूर्भुवः ऊं सः ऊं जूं ऊं हौं ऊं ॥

भगवान शिव का एक अन्य नाम महामृत्युंजय भी है।

जिसका अर्थ है, ऐसा देवता जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुका हो

यह मंत्र रोग और अकाल मृत्यु के निवारण के लिये सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसका जाप यदि रोगी स्वयं करे तो सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि रोगी जप करने की सामर्थ्य से हीन हो तो, परिवार का कोई सदस्य या फिर कोई सधाक/तांत्रिक/ब्राह्‌मण रोगी के नाम से मंत्र जाप कर सकता है।

इसके लिये संकल्प इस प्रकार लें,

मैं(अपना नाम) महामृत्युंजय मंत्र का जाप,(रोगी का नाम) के रोग निवारण के निमित्त कर रहा हॅू, भगवान महामृत्युंजय उसे पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें''।

इस मंत्र के जाप के लिये सफेद वस्त्र तथा आसन का प्रयोग ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है।
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करें।

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-------- महामृत्युंजय मंत्रों से अभिमंत्रित माला ------

अगर आप चाहें तो सावन माह मे आपके नाम से भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र से अभिमंत्रित करके रुद्राक्ष माला आपको स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेजी जा सकती है ।
इसके लिए निर्धारित शुल्क एक हजार एक सौ रुपये [जिसमे रुद्राक्ष की 108 छोटे दानों वाली माला का मूल्य, पूजन सामग्री का व्यय, पूजन शुल्क, पेकेजिंग तथा पोस्टेज व्यय शामिल है ] भेजकर आप इसे प्राप्त कर सकते हैं ।
शुल्क आप फोन पे, पे टी एम, गूगल पे, भीम पे से मेरे मोबाइल नंबर पर भेज सकते हैं :-
मेरा मोबाइल//व्हाट्सप्प//UPI नंबर - 7000630499

पेमेंट के लिए इस क्यूआर कोड़ का भी प्रयोग कर सकते हैं :-


माला प्राप्त करने के लिए मुझे निम्नलिखित चीजें इस नंबर पर व्हाट्सप्प कर देंगे :-

१) निर्धारित शुल्क के ऑनलाइन पेमेंट की रसीद । 
२) आपका नाम , जन्म तिथि,स्थान,समय ।[ यदि मालूम हो ]
३) गोत्र (यदि मालूम हो )
४) अपनी ताजा फोटो जिसमे आपका चेहरा और आँखें स्पष्ट दिखती हों । चश्मा लगाते हों तो बिना चश्मे के फोटो भेजेंगे । यह फोटो आपके प्रतीक रूप में माला के पूजन के समय रखी जाएगी . 
५) आपका पूरा पोस्टल एड्रेस पिन कोड सहित भेजेंगे । साथ मे वह मोबाइल नंबर भी भेजेंगे जिसपर पोस्टमेन आवश्यकता पड़ने पर आपसे पार्सल की डिलिवरी के समय संपर्क कर सके ।


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मंत्र के उच्चारण को स्पष्ट करने के लिए 

मंत्र उच्चारण Mantra Pronunciation 

के नाम से 

पॉडकास्ट 

https://open.spotify.com/show/00vXvHwYrtTbjnjSzyOt3V


और यूट्यूब चेनल 

मंत्र उच्चारण Mantra Pronunciation by Anil Shekhar

https://www.youtube.com/channel/UCpQmfDpTFYokh8smhreq3Sg



भी बनाया है जिसमे सुनकर आप अपना मंत्र उच्चारण सुधार सकते हैं । 

आपका

अनिल शेखर अमस

®®®®®


सर्वरोग निवारक गोपनीय महामृत्युंजय मंत्र

||ॐ त्रयम्बकं यजामहे उर्वा रुकमिव स्तुता वरदा प्रचोदयंताम आयु: प्राणं प्रजां पशुं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्वा व्रजम ब्रह्मलोकं  ||


  • इस मंत्र के उच्चारण करने या श्रवण करने से समस्त बिमारियों में लाभ होता है .
  • क्षमतानुसार जाप करें.

12 जुलाई 2025

शिव पंचाक्षरी मन्त्र साधना : सरल साधकों के लिए सरल विधि

 शिव पंचाक्षरी मन्त्र साधना : सरल साधकों के लिए सरल विधि 


यह साधना भोले बाबा के उन भोले भक्तों के लिए है जो कुछ जानते नहीं और जानना भी नहीं चाहते |

शिव पंचाक्षरी मन्त्र है |

॥ ऊं नमः शिवाय ॥

जाप से पहले अपनी मनोकामना बाबा से कह दें..

नित्य जितनी आप की क्षमता हो उतना जाप करें..
चलते फिरते चौबीसों घंटे आप कर सकते हैं । 

कर सकें तो कम से कम 1 बेलपत्र और जल बाबा के ऊपर चढ़ा दें

बाकी बाबा देख लेंगे...... 

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जो नियमानुसार विधि विधान से करने के इच्छुक हैं उनके लिए विधि :-

भगवान शिव का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन सम्पन्न करें . 

माथे , दोनों गाल, गला, हृदय, दोनों बांह , दोनों जांघ , दोनों तरफ कमर इस प्रकार 11 स्थान पर भस्म का तिलक/त्रिपुन्ड लगाएँ ।.

रुद्राक्ष की 108 दानों की माला धारण करें और रुद्राक्ष की माला से जाप करें ।.

नित्य 11, 21, 33, 51 , 108 माला जाप कर सकते हैं।  सवा लाख मंत्र जाप का पुरास्चरण माना जाता है ।
माला में 108 दाने होते हैं जिसमे जाप किया जाता है । लेकिन एक माला जाप को 100 मंत्र जाप मान लें । बाकी 8 मंत्र को वचन त्रुटि या किसी अन्य गलती के लिए छोड़ देते हैं । एक पुरस्चरण सवा लाख मंत्र जाप का होगा यानी कुल 1250 मालाएं करनी हैं ।

ईशान यानि उत्तर और पूर्व के बीच की ओर देखते हुए मंत्र जाप करें ।.
नीचे कंबल का या मोटे कपड़े का आसन लगाकर बैठे ।

संभव हो तो रोज शिवलिंग पर 11 बेलपत्र चढ़ाएँ और/ या जल से अभिषेक करें । 
साधना काल में संभव हो तो ब्रह्मचर्य रख सकते हैं । विवाहित हैं तो पत्नी से संबंध रख सकते हैं ।

किसी स्त्री पर क्रोध न करें ।

यथा संभव मौन रहें । बेवजह की बकवास, प्रलाप, चुगली, बुराई आदि से बचें ।

किसी पर क्रोध न करें और न ही अपशब्द, श्राप, आदि दें। 

 

शिव मानस पूजा स्तोत्र


हमारी पूजन पद्धति में एक ऐसी विधि भी है जिसके तहत आप बिना किसी सामग्री के भी पूजन कर सकते हैं ।

इसे मानसिक पूजन कहते हैं ।.

मानसिक पूजन में जिन जिन सामग्रियों को चढ़ाना होता है उसके विषय में हम मानसिक रूप से कल्पना करते हैं कि हमने उन चीजों को अपने इष्ट देवता को समर्पित किया है । उदाहरण के लिए अगर आप उनके चरणों में जल समर्पित कर रहे हैं तो मन ही मन ऐसी भावना करेंगे कि वह आपके सामने साक्षात उपस्थित हैं और आप अपने हाथों से उनके चरणों में जल चढ़ा रहे हैं ।

इसी प्रकार से पुष्प धूप तथा अन्य सामग्रियों को भी मानसिक रूप से चढ़ाया जाता है अर्थात मन में उसके बिंब को साकार कर के अपने इष्ट को समर्पित किया जाता है ।

इसी प्रकार का एक मानसिक पूजन स्तोत्र भगवान शिव के लिए भी बनाया गया है जो आप अपने पूजन में प्रयोग कर सकते हैं । इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव का पूजन संपन्न हो जाता है ।.

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं,
नानारत्नविभूषितं मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम्।

जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥

रत्न से जडा हुआ आसन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्न से विभूषित दिव्य वस्त्र, मृग के मद अर्थात कस्तूरि आदि गन्ध से समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप , हे देव , हे दयानिधि, हे पशुपति , यह सब मैं अपने हृदय से कल्पना करता हुआ मानसिक रूप से आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया आप इस मानसिक पूजन को ग्रहण कीजिये।

सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं रम्भाफलं पानकम्।

शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥


मैंने नौ रत्नों से जड़ित सोने के पात्र में घी से युक्त खीर, दूध और दधि सहित पांच प्रकार का भोग व्यंजन, केले (कदली) का फल, शरबत, अनेकों शाक, तथा कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा पान आदि मानसिक रूप से बनाकर प्रस्तुत किये हैं। हे प्रभो, आप स्वीकार कीजिये।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला गीतं च नृत्यं तथा।

साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥


मैं मानसिक रूप से भावना करता हुआ आपको ... छत्र, चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, के साथ साथ वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी जैसे वाद्य यंत्रों के साथ साथ गान और नृत्य आपकी सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ । आपके श्री चरणों मे मैं अपना साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति आदि मानसिक रूप से ही संकल्प करता हुआ आपको समर्पण करता हूँ। आप इसे ग्रहण कीजिये।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधि-स्थितिः।

सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥

हे देवधिदेव शिव , मेरी आत्मा आप हो, मेरी बुद्धि पार्वतीजी हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, मेरा यह शरीर आपका मन्दिर है,
सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है, मेरी निद्रा ही मेरी समाधि है, मेरा चलना-फिरना ही आपकी परिक्रमा है तथा
मेरे मुख से निकले शब्द ही आपके पूजन के स्तोत्र हैं। इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब हे शंभू ,आपकी आराधना ही है।

कर-चरण-कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥


मैंने अपने हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, जिनके विषय मे मुझे पता हो या न पता हो , उन सबको हे करुणा के सागर महादेव शम्भो। आप क्षमा कर कीजिये। हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।

रुद्राक्ष की सिद्ध माला : आध्यात्मिक साधकों के लिए

 रुद्राक्ष की सिद्ध माला : आध्यात्मिक साधकों के लिए

वे साधक या आध्यात्मिक व्यक्ति जो अपनी साधनात्मक शक्तियों का उपयोग दूसरे लोगों के लिए अनुष्ठान करने या उनकी समस्याओं के समाधान के लिए करते हैं उन्हें सिद्ध माला धारण करनी चाहिए । यह उन्हें विभिन्न प्रकार के विपरीत प्रभावों से बचाने के साथ-साथ उनकी आध्यात्मिक शक्तियों को संरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
सिद्ध माला एक मुखी से लेकर 14 मुखी तक के रुद्राक्ष को एक माला में गूँथकर बनाई जाती है । यह काफी महंगी होती है । 
यह माला ऑनलाइन भी उपलब्ध है आप प्रतिष्ठान को और उसकी प्रामाणिकता को देखकर मंगा सकते हैं ।


इसके अलावा आप चाहे तो यह माला मेरे गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी से भी प्राप्त कर सकते हैं लेकिन इसके लिए आपको स्वयं भोपाल तक जाना पड़ेगा क्योंकि वह इसे अपने शिष्यों को ही प्रदान करते हैं । रुद्राक्ष के जितने प्रकार होते हैं लगभग वे सारे उनके संग्रह मे मौजूद रहते हैं । वे रुद्राक्षों के मर्मज्ञ हैं ...... 


उनकी वैबसाइट है :-
namobaglamaa.org

भगवान् शिव का विविध वस्तुओं से अभिषेक : सरल विधि



 भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय मानी जाने वाली क्रिया है ‘अभिषेक’. अभिषेक का शाब्दिक तात्पर्य होता है श्रृंगार करना तथा शिवपूजन के संदर्भ में इसका तात्पर्य होता है किसी पदार्थ से शिवलिंग को पूर्णतः आच्ठादित कर देना. समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ गया. उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा प्रारंभ हुयी. जो आज भी चली आ रही है.


शिव पूजन में सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति शिवलिंग पर जल या दूध चढाता है. शिवलिंग पर इस प्रकार द्रवों का अभिषेक ‘धारा’ कहलाता है. जल तथा दूध की धारा भगवान शिव को अत्यंत ही प्रिय है. शिवलिंग को स्नान कराने के विषय में कहा गया है कि :-


पंचामृतेन वा गंगोदकेन वा अभावे गोक्षीर युक्त कूपोदकेन च कारयेत


अर्थात पंचामृत से या फिर गंगा जल से भगवान शिव को धारा का अर्पण किया जाना चाहिये इन दोनों के अभाव में गाय के दूध को कूंए के जल के साथ मिश्रित कर के स्नान करवाना चाहिये.


हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक पूजन क्रिया को एक विशिष्ठ मंत्र के साथ करने की व्यवस्था है, इससे पूजन का महत्व कई गुना बढ जाता है. शिवलिंग पर अभिषेक या धारा चढाने के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है वह हैः-


।ऊं हृं हृं जूं सः पशुपतये नमः ।


। ऊं नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।


इन मंत्रों का सौ बार जाप करके जल चढाना शतधारा तथा एक हजार बार जाप करके जल चढाना सहस्रधारा कहलाता है.


जलधारा चढाने के लिए विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अलावा आप चाहें तो भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हें. पंचाक्षरी मंत्र का तात्पर्य है ‘ ऊं नमः शिवाय ’ मंत्र .


विविध कार्यों के लिए विविध सामग्रियों या द्रव्यों की धाराओं का शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है. तंत्र में सकाम अर्थात किसी कामना की पूर्ति की इच्ठा के साथ पूजन के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग करने का प्रावधान रखा गया है. इनमें से कुछ का वर्णन आगे प्रस्तुत हैः-


जल की धारा सर्वसुख प्रदायक होती है.

घी की सहस्रधारा से वंश का विस्तार होता है.

दूध की धारा गृहकलह की शांति के लिए देना चाहिए.

दूध में शक्कर मिलाकर धारा देने से बुद्धि का विकास होता है.

गंगाजल का अभिषेक पुत्रप्रदायक माना गया है.

सरसों के तेल की धारा से शत्रु का विनाश होता है.

सुगंधित द्रव्यों यथा इत्र, सुगंधित तेल की धारा से भोगों की प्राप्ति होती है.


इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैंः-


सहस्राभिषेकः-(एक हजार बार चढ़ाना)

एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है.

एक हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है.

एक हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है.

एक हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है.

एक हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति व विष्णुकृपा प्राप्त होती है.

एक हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है.

एक हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है.


लक्षाभिषेकः-

एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है.

एक लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.

एक लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.

एक लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.

एक लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है.

एक लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है.

एक लाख तुलसीदल चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.

एक लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है.


शिवपूजन में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-

पूजन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर करें.

माता पार्वती का पूजन अनिवार्य रुप से करना चाहिये अन्यथा पूजन अधूरा रह जायेगा. इसके लिए बहुत लम्बा विधान करने की आवश्यकता नहीं है . महामाया को प्रेम और श्रद्धा से प्रणाम कर लेंगे तो भी पर्याप्त है . 

रुद्राक्ष की माला हो तो धारण करें।भस्म से तीन आडी लकीरों वाला तिलक लगाकर बैठें.



शिवलिंग पर चढाया हुआ प्रसाद ग्रहण नही किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं.

अलबेले : भगवान शिव

 अलबेले : भगवान शिव




भगवान शिव का स्वरुप अन्य देवी देवताओं से बिल्कुल अलग है।

जहां अन्य देवी-देवताओं को वस्त्रालंकारों से सुसज्जित

और सिंहासन पर विराजमान माना जाता है,


वहां ठीक इसके विपरीत शिव पूर्ण दिगंबर हैं,


अलंकारों के रुप में सर्प धारण करते हैं


और श्मशान भूमि पर सहज भाव से अवस्थित हैं।


उनकी मुद्रा में चिंतन है,


तो निर्विकार भाव भी है!


आनंद भी है और लास्य भी।


भगवान शिव को सभी विद्याओं का जनक भी माना जाता है।


वे तंत्र से लेकर मंत्र तक और योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि हैं और अंत भी।


यही नही वे संगीत के आदिसृजनकर्ता भी हैं, और नटराज के रुप में कलाकारों के आराध्य भी हैं।


वास्तव में भगवान शिव देवताओं में सबसे अद्भुत देवता हैं ।


वे देवों के भी देव होने के कारण ÷महादेव' हैं तो, काल अर्थात समय से परे होने के कारण ÷महाकाल' भी हैं ।


वे देवताओं के गुरू हैं तो, दानवों के भी गुरू हैं ।


देवताओं में प्रथमाराध्य, विघ्नों के कारक व निवारणकर्ता, भगवान गणपति के पिता हैं

तो,जगद्जननी मां जगदम्बा के पति भी हैं ।


वे कामदेव को भस्म करने वाले हैं तो,कामेश्वर' भी हैं ।


तंत्र साधनाओं के जनक हैं तो संगीत के आदिगुरू भी हैं ।


उनका स्वरुप इतना विस्तृत है कि उसके वर्णन का सामर्थ्य शब्दों में भी नही है।सिर्फ इतना कहकर ऋषि भी मौन हो जाते हैं किः-


असित गिरी समम् स्याद कज्जलं सिन्धु पात्रे , सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्र मुर्वी

लिखती यदि शारदा सर्वकालं ,तदपि तव गुणानाम ईश पारं न याति


अर्थात यदि समस्त पर्वतों को, समस्त समुद्रों के जल में पीसकर उसकी स्याही बनाइ जाये, और संपूर्ण वनों के वृक्षों को काटकर उसको कलम या पेन बनाया जाये और स्वयं साक्षात, विद्या की अधिष्ठात्री, देवी सरस्वती उनके गुणों को लिखने के लिये अनंतकाल तक बैठी रहें तो भी उनके गुणों का वर्णन कर पाना संभव नही होगा। वह समस्त लेखनी घिस जायेगी! पूरी स्याही सूख जायेगी मगर उनका गुण वर्णन समाप्त नही होगा। ऐसे भगवान शिव का पूजन अर्चन करना मानव जीवन का सौभाग्य है ।