22 मार्च 2026

नवरात्रि में देवी का विस्तृत पूजन

   नवरात्रि में देवी का विस्तृत पूजन



नवरात्रि में सभी की इच्छा रहती है कि देवी का विस्तृत पूजन किया जाए । नीचे की पंक्तियों में एक सरल पूजन विधि प्रस्तुत है ।


इसमें मेरी आराध्य महामाया देवी महाकाली का पूजन किया गया है उनके पूजन में सभी देवियों का पूजन संपन्न हो जाता है .  लेकिन अगर आप देवी के किसी और स्वरूप का पूजन करना चाहते हैं तो भी आप इसी विधि से पूजन संपन्न कर सकते हैं । फर्क सिर्फ इतना होगा कि जहां पर (क्रीं महाकाल्यै नमः) लिखा है उस स्थान पर देवी के दूसरे स्वरूप का मंत्र आ जाएगा ।

उदाहरण के लिए अगर आप दुर्गा देवी की साधना कर रहे हैं तो वहां पर आप (दुँ दुर्गायै नमः ) बोलकर पूरा पूजन सम्पन्न कर सकते हैं ।
काली :-
ध्यान
देवी काली का ध्यान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ध्यानम समर्पयामि )

दुर्गा :-
ध्यान
देवी दुर्गा का ध्यान करें
( दुँ दुर्गायै नमः ध्यानम समर्पयामि )

इस तरह से आप किसी भी देवी का पूजन कर सकते हैं ....

इसके अलावा आप यदि किसी मंत्र का जाप कर रहे हो उस मंत्र को बोलकर भी पूरा पूजन संपन्न कर सकते हैं ।
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माता महाकाली का पूजन


महाकाली का पूजन प्रस्तुत है जो कि बेहद सरल है ।


ध्यान
देवी काली का ध्यान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ध्यानम समर्पयामि )

यदि पढ़ सकते हो तो नीचे लिखा हुआ ध्यान भी पढ़ सकते हैं ।

करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ॥
सद्यः छिन्नशिरः खड्गवामाधोर्ध्व कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदञ्चैव दक्षिणोर्ध्वाध: पाणिकाम् ॥
महामेघ प्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डाली गलद्‌रुधिर चर्चिताम् ॥
कर्णावतंसतानीत शवयुग्म भयानकां ।
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ॥
शवानां कर संघातैः कृतकाञ्ची हसन्मुखीम् ।
सृक्कद्वयगलद् रक्तधारां विस्फुरिताननाम् ॥
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालय वासिनीम् ।
बालर्क मण्डलाकार लोचन त्रितयान्विताम् ॥
दन्तुरां दक्षिण व्यापि मुक्तालम्बिकचोच्चयाम् ।
शवरूप महादेव ह्रदयोपरि संस्थिताम् ॥
शिवाभिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ।
महाकालेन च समं विपरीत रतातुराम् ॥
सुक प्रसन्नावदनां स्मेरानन सरोरुहाम् ।
एवं सञ्चियन्तयेत् काली सर्वकाम समृद्धिदां ॥

पुष्प समर्पण :-
अब फूल चढ़ाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पम समर्पयामि )

आसन :-
आसन के लिए महाकाली के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः आसनं समर्पयामि )

पाद्य :-
जल से चरण धोएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः पाद्यं समर्पयामि )

उद्वर्तन :-
चरणों में सुगन्धित तेल समर्पित करे ।
( क्रीं महाकाल्यै नमः उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

आचमन :-
पीने के लिए जल प्रदान करें ।
( क्रीं महाकाल्यै नमः आचमनीयम् समर्पयामि )

स्नान :-
सामान्य जल या सुगन्धित पदार्थों से युक्त जल से स्नान करवाएं (जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें )
( क्रीं महाकाल्यै नमः स्नानं निवेदयामि )

मधुपर्क :-
गाय का शुद्ध, दूध , दही , घी , चीनी , शहद मिलाकर चढ़ाएं या शहद चढ़ाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः मधुपर्कं समर्पयामि )

चन्दन :-
सफ़ेद चन्दन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः चन्दनं समर्पयामि )

रक्त चन्दन :-
लाल चन्दन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः रक्त चन्दनं समर्पयामि )

सिन्दूर :-
सिन्दूर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि )

कुंकुम :-
कुंकुम समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कुंकुमं समर्पयामि )

अक्षत :-
चावल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः अक्षतं समर्पयामि )

पुष्प :-
पुष्प समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पं समर्पयामि )

विल्वपत्र :-
बिल्वपत्र समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि )

पुष्प माला :-
फूलों की माला समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पमालां समर्पयामि )

वस्त्र :-
वस्त्र समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि )

धूप :-
सुगन्धित धुप समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः धूपं समर्पयामि )

दीप :-
दीपक समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः दीपं दर्शयामि )

सुगंधि द्रव्य :-
इत्र समर्पित करे
( क्रीं महाकाल्यै नमः सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

कर्पूर दीप :-
कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कर्पूर दीपम दर्शयामि )

नैवेद्य :-
प्रसाद समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः नैवेद्यं समर्पयामि )

ऋतु फल :-
फल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ऋतुफलं समर्पयामि )

जल :-
जल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः जलम समर्पयामि )

करोद्वर्तन जल :-
हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

आचमन :-
जल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

ताम्बूल :-
पान समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि )

काजल :-
काजल समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः कज्जलं समर्पयामि )

महावर :-
महावर समर्पित करे
( क्रीं महाकाल्यै नमः महावरम समर्पयामि )

चामर :-
चामर / पंखा झलना होता है
( क्रीं महाकाल्यै नमः चामरं समर्पयामि )

घंटा वादनम :-
घंटी बजाएं
( क्रीं महाकाल्यै नमः घंटा वाद्यं समर्पयामि )

दक्षिणा :-
दक्षिणा/ धन समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः दक्षिणाम समर्पयामि )

पुष्पांजलि :-
दोनों हाथों मे फूल या फूल की पंखुड़ियाँ भरकर समर्पित करें
( क्रीं महाकाल्यै नमः पुष्पांजलिं समर्पयामि )

नीराजन :-
कपूर से आरती
( क्रीं महाकाल्यै नमः नीराजनं समर्पयामि )

क्षमा प्रार्थना :-
( क्रीं महाकाल्यै नमः क्षमा प्रार्थनाम समर्पयामि )


दोनों हाथों से कानों को पकड़कर पूजन मे हुईं किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए कृपा की याचना करें ।

अगर पढ़ सकते हैं तो इसे भी पढ़ सकते हैं

ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते

ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः ।।

आरती :-
अंत मे आरती करें

17 मार्च 2026

निखिलेश्वरानंद स्तवन

 


गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी का सन्यस्त स्वरूप है परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जो युगपुरुष हैं उनकी महिमा को शब्दों मे समेटने का भागीरथ प्रयत्न है यह स्तवन !
इसे श्री विरल पटेल जी ने आधुनिक तकनीक से स्कैन करके सभी के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया है जिसे आप नीचे लिखे लिंक से देख सकते हैं । 


किसी भी प्रकार की जानकारी या रोज गुरुदेव के वीडियो /प्रवचन अपने व्हाट्सप्प मे प्राप्त करने के लिए आप संपर्क कर सकते हैं । 
श्री विरल पटेल 
9429400214



  

22 फ़रवरी 2026

शूकर दंत : तांत्रिक अभिचार और वशीकरण कर्म की काट

 शूकर दंत : तांत्रिक अभिचार और वशीकरण कर्म की काट 


तंत्र शास्त्र और लोक मान्यताओं में शूकर दंत (सूअर के दांत) को सभी प्रकार के अभिचार/वशीकरण क्रियाओं की एक अत्यंत शक्तिशाली 'काट' के रूप में देखा जाता है। 

विशेष रूप से इस्लामिक तंत्र से की गयी क्रियाओं का प्रभाव इससे नष्ट हो जाता है । संभवतः इसका प्रमुख कारण यह है कि इस्लामिक मान्यताओं में सूअर को 'नजिस' (अपवित्र) माना गया है। तंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत 'विषस्य विषमौषधम्' (अर्थात -  जहर ही जहर की दवा है) पर काम करता है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि जिस ऊर्जा या शक्ति का आधार विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं पर टिका हो, वह उस वस्तु के संपर्क में आते ही अपनी शक्ति खो देती है जिसे उस धर्म में वर्जित माना गया है। इसी कारण, कई तांत्रिक इसे 'मुस्लिम तंत्र' या 'जिन्नात' आदि के प्रभावों को निष्क्रिय करने के लिए एक अचूक अस्त्र मानते हैं।


शूकर दंत को भगवान वराह (विष्णु के अवतार) का प्रतीक माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। इसलिए यह किसी भी प्रकार के 'अभिचार कर्म' को वापस पलटने की क्षमता रखता है। 

साधना विधि :-

शूकर दंत को एक स्टील के गहरे बर्तन मे अपने सामने रख लें । बर्तन इतना बड़ा हो कि लगभग आधा लीटर पानी आ जाये ।  

भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का ध्यान करें ।. 

वाराह स्तुति

नमस्ते देवदेवाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वताय जयाय च ।।

अर्थ - देवों के देव, ब्रह्मस्वरूप, परमेष्ठी (परम पद में स्थित रहने वाले) पुराण पुरुष, शाश्वत और जयस्वरूप, आपके लिए नमस्कार है।

नमः स्वयंभुवे तुभ्यं स्त्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने ।
नमो हिरण्यगर्भाय वेधसे परमात्मने ।।

अर्थ - स्वयंभू, सृष्टि रचयिता और सर्वार्थ को जानने वाले आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा और परमात्मा को नमस्कार है।

नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये ।
नारायणाय देवाय देवानां हितकारिणे ।।

अर्थ - वासुदेव, विष्णु, विश्वयोनि, नारायण, देवों के हितकारी देवरूप के लिए नमस्कार है।

नमोऽस्तु ते चतुर्वक्त्रे शार्ङ्गचक्रासिधारिणे ।
सर्वभूतात्मभूताय कूटस्थाय नमो नमः ।।

अर्थ - चतुर्मुख, शार्ङ्ग, चक्र तथा असि धारण करने वाले आपको नमस्कार है। समस्तभूतों के आत्मस्वरूप तथा कूटस्थ को नमस्कार है।

नमो वेदरहस्याय नमस्ते वेदयोनये ।
नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे ।।

अर्थ - वेदों के रहस्यरूप के लिए नमस्कार है। वेदयोनि को नमस्कार है। बुद्ध और शुद्ध को नमस्कार है। ज्ञानरूपी के लिए नमस्कार है।

नमोऽस्त्वानन्दरूपाय साक्षिणे जगतां नमः ।
अनन्तायाप्रमेयाय कार्याय करणाय च ।।

अर्थ - आनन्दरूप और जगत् के साक्षीरूप को नमस्कार है। अनन्त, अप्रमेय, कार्य तथा कारणरूप को नमस्कार है।

नमस्ते पञ्चभूताय पञ्चभूतात्मने नमः ।
नमो मूलप्रकृतये मायारूपाय ते नमः ।।

अर्थ - पञ्चभूतरूप आपको नमस्कार। पञ्चभूतात्मा को, मूलप्रकृतिरूप मायारूप आपको नमस्कार है।

नमोऽस्तु ते वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे ।
नमो योगाधिगम्याय नमः सकर्षणाय ते ।।

अर्थ - वराह रूपधारी को नमस्कार है। मत्स्यरूपी को नमस्कार है। योग के द्वारा ही जानने योग्य को नमस्कार है तथा संकर्षण! आपको नमस्कार है।

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे ।
नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभागिने ।।

अर्थ - त्रिमूर्ति के लिए नमस्कार है। दिव्य तेज वाले विधामा, सिद्ध, पूज्य और तीनों गुणों का विभाग करने वाले आपको नमस्कार है।

तमोऽस्त्वादित्यवर्णाय नमस्ते पद्मयोनये ।
नमोऽमूर्त्ताय मूर्ताय माधवाय नमो नमः ।।

अर्थ - आदित्यरूप को नमस्कार है। पद्मयोनि को नमस्कार है। अमूर्त, मूर्त तथा माधव को नमस्कार है।

त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव लयमेष्यति ।
पालयैतज्जगत् सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः ।।

अर्थ - आपने ही अखिल जगत् को सृष्टि की है। आप में ही सकल विश्व स्थित है। आप इस सम्पूर्ण जगत् का पालन करें। आप ही रक्षक एवं शरणागति हैं।

वराह स्तुति करके प्रभु को प्रणाम करके प्रार्थना कर लेंगे की उनकी रक्षाकारक शक्ति इस शूकर दंत मे समाहित होकर रक्षा करें ।. 

उसके बाद इस मंत्र का 1008 बार जाप करें । 

॥ ॐ वज्र वाराह्ये नमः ॥ 

हर बार नमः के साथ उसके ऊपर एक चम्मच जल डालते जाएँगे । इस प्रकार से आपका पानी अभिमंत्रित हो जाएगा । 

जब पूरा हो जाये तो उस शूकर दंत सहित उस पानी को बोतल मे डालकर रख लें ।

पानी को प्रयोग करना है । खतम हो जाये तो इसी प्रयोग को उसी शूकर दंत पर पुनः करके फिर अभिमंत्रित पानी बना सकते हैं । 

प्रयोग विधि :-

1) अगर किसी के ऊपर वशीकरण या तांत्रिक प्रयोग होने का शक हो तो इस जल की कुछ बूंदें उसे पिला दें । ऐसा तीन दिनों तक करें ।. प्रभाव दिखाई देने लगेगा ।

2) घर मे किसी क्रिया का अभास हो तो इसी जल को पूरे घर मे छिड़क सकते हैं । 


 


17 फ़रवरी 2026

सूर्यग्रहण विशेष - तारा शाबर मंत्र




      ॐ आदि योग अनादि माया । 
      जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया ।
      ब्रह्माण्ड समाया । 

      आकाश मण्डल । 
      तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै । 

      ब्रह्म कापलिजहाँ पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्तिसूरज मुख तपे । 
      चंद मुख अमिरस पीवे
      अग्नि मुख जले
      आद कुंवारी हाथ खण्डाग गल मुण्ड माल
      मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । 
      नीली काया पीली जटा
      काली दन्त में जिह्वा दबाया । 
      घोर तारा अघोर तारा
      दूध पूत का भण्डार भरा । 
      पंच मुख करे हा हा ऽऽकारा
      डाकिनी शाकिनी भूत पलिता 
      सौ सौ कोस दूर भगाया । 
      चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी 
      तुम तो हों तीन लोक की जननी ।

      तारा मंत्र
      ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्

      विधि :-
      1. रात्री काल मे जाप करें । ग्रहण काल मे जाप करने से विशेष लाभदायक है । 
      2. अपनी क्षमतानुसार 1,11,21,51,108 बार । 
      3. व्यापार और आर्थिक समृद्धि के लिए लाभदायक । 
      4. जप काल मे किसी स्त्री का अपमान न करें । 

सूर्यग्रहण विशेष - तंत्र रक्षा नारियल

सूर्यग्रहण विशेष  - तंत्र रक्षा नारियल 



सूर्यग्रहण के अवसर पर अपने घर मे गृह शांति और रक्षा के लिए एक विधि प्रस्तुत है जिसके द्वारा आप अपने घर पर पूजन करके नारियल बाँध सकते हैं.


आवश्यक सामग्री :-

लाल कपडा सवा मीटर

नारियल

सामान्य पूजन सामग्री

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यदि आर्थिक रूप से सक्षम हों तो इसके साथ रुद्राक्ष/ गोरोचन/केसर भी डाल सकते हैं.

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वस्त्र/आसन लाल रंग का हो तो पहन लें यदि न हो तो जो हो उसे पहन लें.

सबसे पहले शुद्ध होकर आसन पर बैठ जाएँ. हाथ में जल लेकर कहें " मै [अपना नाम ] अपने घर की रक्षा और शांति के लिए यह पूजन कर रहा हूँ मुझपर कृपा करें और मेरा मनोरथ सिद्ध करें."

इतना बोलकर हाथ में रखा जल जमीन पर छोड़ दें. इसे संकल्प कहते हैं.

नारियल पर मौली धागा [अपने हाथ से नापकर तीन हाथ लम्बा तोड़ लें.] लपेट लें.

लपेटते समय निम्नलिखित मंत्र का जाप करें." ॐ श्री विष्णवे नमः"

अब अपने सामने लाल कपडे पर नारियल रख दें. उसका पूजन करें.

लोबान का धुप या अगरबत्ती जलाएं .

नारियल के सामने निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें । 

"ॐ नमो आदेश गुरून को इश्वर वाचा अजरी बजरी बाडा बज्जरी मैं बज्जरी को बाँधा, दशो दुवार छवा और के ढालों तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे, पहली चौकी गणपति दूजी चौकी में भैरों, तीजी चौकी में हनुमंत,चौथी चौकी देत रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देव जी शब्द सांचा पिंड कांचा फुरो मंत्र इश्वरी वाचा"

अब इस नारियल को अन्य पूजन सामग्री के साथ लाल कपडे में लपेट ले. आपका रक्षा नारियल तय्यार है. इसे आप दशहरा, दीपावली, पूर्णिमा, अमावस्या या अपनी सुविधानुसार किसी भी दिन घर की छत में हुक हो तो उसपर बांधकर लटका दें. यदि न हो तो पूजा स्थान में रख लें. नित्य पूजन के समय इसे भी अगरबत्ती दिखाएँ.

धनिष्ठा नक्षत्र का सूर्य ग्रहण : 17 फरवरी 2026 : समय



इस बार का सूर्यग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा । लेकिन हर खगोलीय घटना की तरह ही इसका प्रभाव हमारी पूरी पृथ्वी पर पड़ेगा ।

इसका भारतीय समय इस प्रकार है:

ग्रहण का प्रारंभ - दोपहर 03:26 बजे

मध्यम/चरम अवस्था - शाम 05:42 बजे ।

ग्रहण का समापन - रात 07:57 बजे

इस अवसर पर विशेष भाग्योदय साधना का विशेष महत्व होता है । 

अगर पाठक चाहें तो तो गुरुमाता डॉ साधना सिंह जी द्वारा फोटो के माध्यम से दी जा रही "भाग्योदय दीक्षा पूजन" मे भाग ले सकते हैं । यह ग्रहण धनिष्ठा नक्षत्र मे लग रहा है इसलिए धनिष्ठा नक्षत्र मे जन्मे जातक के लिए यह भाग्योदय दीक्षा विशेष लाभप्रद रहेगी ।

संपर्क :-

श्री प्रशांत पांडे 

8800458271

14 फ़रवरी 2026

मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं

   



महामृत्युंजय स्तोत्र

मार्कण्डेय मुनि द्वारा वर्णित “महामृत्युंजय स्तोत्र” मृत्यु के भय को मिटाने वाला स्तोत्र है । 

इसका आप नित्य पाठ कर सकते हैं । 


ॐ रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकंठमुमापतिम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १ ॥


नीलकंठं कालमूर्तिं कालज्ञं कालनाशनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ २ ॥


नीलकंठं विरूपाक्षं निर्मलं निलयप्रदम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ३ ॥


वामदॆवं महादॆवं लॊकनाथं जगद्गुरुम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ४ ॥


दॆवदॆवं जगन्नाथं दॆवॆशं वृषभध्वजम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ५ ॥

गंगाधरं महादॆवं सर्पाभरणभूषितम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ६ ॥


त्र्यक्षं चतुर्भुजं शांतं जटामुकुटधारणम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ७ ॥


भस्मॊद्धूलितसर्वांगं नागाभरणभूषितम्‌ ।

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ८ ॥


अनंतमव्ययं शांतं अक्षमालाधरं हरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ९ ॥


आनंदं परमं नित्यं कैवल्यपददायिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १० ॥


अर्धनारीश्वरं दॆवं पार्वतीप्राणनायकम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ ११ ॥


प्रलयस्थितिकर्तारं आदिकर्तारमीश्वरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १२ ॥


व्यॊमकॆशं विरूपाक्षं चंद्रार्द्ध कृतशॆखरम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १३ ॥


गंगाधरं शशिधरं शंकरं शूलपाणिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १४ ॥


अनाथं परमानंदं कैवल्यपददायिनम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १५ ॥


स्वर्गापवर्ग दातारं सृष्टिस्थित्यांतकारिणम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १६ ॥


कल्पायुर्द्दॆहि मॆ पुण्यं यावदायुररॊगताम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १७ ॥


शिवॆशानां महादॆवं वामदॆवं सदाशिवम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १८ ॥


उत्पत्ति स्थितिसंहार कर्तारमीश्वरं गुरुम्‌ । 

नमामि शिरसा दॆवं किं नॊ मृत्यु: करिष्यति ॥ १९ ॥


फलश्रुति

मार्कंडॆय कृतं स्तॊत्रं य: पठॆत्‌ शिवसन्निधौ । 

तस्य मृत्युभयं नास्ति न अग्निचॊरभयं क्वचित्‌ ॥ २० ॥


शतावृतं प्रकर्तव्यं संकटॆ कष्टनाशनम्‌ । 

शुचिर्भूत्वा पठॆत्‌ स्तॊत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम्‌ ॥ २१ ॥


मृत्युंजय महादॆव त्राहि मां शरणागतम्‌ । 

जन्ममृत्यु जरारॊगै: पीडितं कर्मबंधनै: ॥ २२ ॥


तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्व च्चित्तॊऽहं सदा मृड । 

इति विज्ञाप्य दॆवॆशं त्र्यंबकाख्यममं जपॆत्‌ ॥ २३ ॥


नम: शिवाय सांबाय हरयॆ परमात्मनॆ । 

प्रणतक्लॆशनाशाय यॊगिनां पतयॆ नम: ॥ २४ ॥



॥ इति श्री मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं संपूर्णम्‌ ॥


रुद्राष्टकम

   रुद्राष्टकम



नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरूपम्।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्॥


निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।

करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्॥


तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥


चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम्।

मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि॥



प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्।

त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥


कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥


न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।

न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥


न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्।

जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥



रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥


13 फ़रवरी 2026

भगवान् शिव का विविध वस्तुओं से अभिषेक : सरल विधि

 



 भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय मानी जाने वाली क्रिया है ‘अभिषेक’. अभिषेक का शाब्दिक तात्पर्य होता है श्रृंगार करना तथा शिवपूजन के संदर्भ में इसका तात्पर्य होता है किसी पदार्थ से शिवलिंग को पूर्णतः आच्ठादित कर देना. समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ गया. उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा प्रारंभ हुयी. जो आज भी चली आ रही है.


शिव पूजन में सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति शिवलिंग पर जल या दूध चढाता है. शिवलिंग पर इस प्रकार द्रवों का अभिषेक ‘धारा’ कहलाता है. जल तथा दूध की धारा भगवान शिव को अत्यंत ही प्रिय है. शिवलिंग को स्नान कराने के विषय में कहा गया है कि :-


पंचामृतेन वा गंगोदकेन वा अभावे गोक्षीर युक्त कूपोदकेन च कारयेत


अर्थात पंचामृत से या फिर गंगा जल से भगवान शिव को धारा का अर्पण किया जाना चाहिये इन दोनों के अभाव में गाय के दूध को कूंए के जल के साथ मिश्रित कर के स्नान करवाना चाहिये.


हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक पूजन क्रिया को एक विशिष्ठ मंत्र के साथ करने की व्यवस्था है, इससे पूजन का महत्व कई गुना बढ जाता है. शिवलिंग पर अभिषेक या धारा चढाने के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है वह हैः-


।ऊं हृं हृं जूं सः पशुपतये नमः ।


। ऊं नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।


इन मंत्रों का सौ बार जाप करके जल चढाना शतधारा तथा एक हजार बार जाप करके जल चढाना सहस्रधारा कहलाता है.


जलधारा चढाने के लिए विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अलावा आप चाहें तो भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हें. पंचाक्षरी मंत्र का तात्पर्य है ‘ ऊं नमः शिवाय ’ मंत्र .


विविध कार्यों के लिए विविध सामग्रियों या द्रव्यों की धाराओं का शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है. तंत्र में सकाम अर्थात किसी कामना की पूर्ति की इच्ठा के साथ पूजन के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग करने का प्रावधान रखा गया है. इनमें से कुछ का वर्णन आगे प्रस्तुत हैः-


जल की धारा सर्वसुख प्रदायक होती है.

घी की सहस्रधारा से वंश का विस्तार होता है.

दूध की धारा गृहकलह की शांति के लिए देना चाहिए.

दूध में शक्कर मिलाकर धारा देने से बुद्धि का विकास होता है.

गंगाजल का अभिषेक पुत्रप्रदायक माना गया है.

सरसों के तेल की धारा से शत्रु का विनाश होता है.

सुगंधित द्रव्यों यथा इत्र, सुगंधित तेल की धारा से भोगों की प्राप्ति होती है.


इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैंः-


सहस्राभिषेकः-(एक हजार बार चढ़ाना)

एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है.

एक हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है.

एक हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है.

एक हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है.

एक हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति व विष्णुकृपा प्राप्त होती है.

एक हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है.

एक हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है.


लक्षाभिषेकः-

एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है.

एक लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.

एक लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.

एक लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है.

एक लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है.

एक लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है.

एक लाख तुलसीदल चढाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.

एक लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है.


शिवपूजन में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-

पूजन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर करें.

माता पार्वती का पूजन अनिवार्य रुप से करना चाहिये अन्यथा पूजन अधूरा रह जायेगा. इसके लिए बहुत लम्बा विधान करने की आवश्यकता नहीं है . महामाया को प्रेम और श्रद्धा से प्रणाम कर लेंगे तो भी पर्याप्त है . 

रुद्राक्ष की माला हो तो धारण करें।भस्म से तीन आडी लकीरों वाला तिलक लगाकर बैठें.



शिवलिंग पर चढाया हुआ प्रसाद ग्रहण नही किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं.

12 फ़रवरी 2026

शिव मानस पूजा स्तोत्र

 


हमारी पूजन पद्धति में एक ऐसी विधि भी है जिसके तहत आप बिना किसी सामग्री के भी पूजन कर सकते हैं ।

इसे मानसिक पूजन कहते हैं ।.

मानसिक पूजन में जिन जिन सामग्रियों को चढ़ाना होता है उसके विषय में हम मानसिक रूप से कल्पना करते हैं कि हमने उन चीजों को अपने इष्ट देवता को समर्पित किया है । उदाहरण के लिए अगर आप उनके चरणों में जल समर्पित कर रहे हैं तो मन ही मन ऐसी भावना करेंगे कि वह आपके सामने साक्षात उपस्थित हैं और आप अपने हाथों से उनके चरणों में जल चढ़ा रहे हैं ।

इसी प्रकार से पुष्प धूप तथा अन्य सामग्रियों को भी मानसिक रूप से चढ़ाया जाता है अर्थात मन में उसके बिंब को साकार कर के अपने इष्ट को समर्पित किया जाता है ।

इसी प्रकार का एक मानसिक पूजन स्तोत्र भगवान शिव के लिए भी बनाया गया है जो आप अपने पूजन में प्रयोग कर सकते हैं । इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव का पूजन संपन्न हो जाता है ।.

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं,
नानारत्नविभूषितं मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम्।

जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥

रत्न से जडा हुआ आसन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्न से विभूषित दिव्य वस्त्र, मृग के मद अर्थात कस्तूरि आदि गन्ध से समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप , हे देव , हे दयानिधि, हे पशुपति , यह सब मैं अपने हृदय से कल्पना करता हुआ मानसिक रूप से आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया आप इस मानसिक पूजन को ग्रहण कीजिये।

सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं रम्भाफलं पानकम्।

शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥


मैंने नौ रत्नों से जड़ित सोने के पात्र में घी से युक्त खीर, दूध और दधि सहित पांच प्रकार का भोग व्यंजन, केले (कदली) का फल, शरबत, अनेकों शाक, तथा कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा पान आदि मानसिक रूप से बनाकर प्रस्तुत किये हैं। हे प्रभो, आप स्वीकार कीजिये।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला गीतं च नृत्यं तथा।

साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥


मैं मानसिक रूप से भावना करता हुआ आपको ... छत्र, चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, के साथ साथ वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी जैसे वाद्य यंत्रों के साथ साथ गान और नृत्य आपकी सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ । आपके श्री चरणों मे मैं अपना साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति आदि मानसिक रूप से ही संकल्प करता हुआ आपको समर्पण करता हूँ। आप इसे ग्रहण कीजिये।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधि-स्थितिः।

सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥

हे देवधिदेव शिव , मेरी आत्मा आप हो, मेरी बुद्धि पार्वतीजी हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, मेरा यह शरीर आपका मन्दिर है,
सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है, मेरी निद्रा ही मेरी समाधि है, मेरा चलना-फिरना ही आपकी परिक्रमा है तथा
मेरे मुख से निकले शब्द ही आपके पूजन के स्तोत्र हैं। इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब हे शंभू ,आपकी आराधना ही है।

कर-चरण-कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥


मैंने अपने हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, जिनके विषय मे मुझे पता हो या न पता हो , उन सबको हे करुणा के सागर महादेव शम्भो। आप क्षमा कर कीजिये। हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।