8 दिसंबर 2018

गणपति साधना




विघ्नेश्वरं सुरगणपूजितंमोदकप्रियं पार्वती सुतम ।
हस्तिमुखं लम्बोदरं नमामि शिवपुत्रम गणेश्वरम ॥

विघ्नों के अधिपतिदेवताओं के भी आराध्यमोदक अर्थात लड्डूओं के प्रेमीजगदम्बा पार्वती के पुत्रहाथी के समान मुख व लम्बे पेट वालेभगवान शिव के प्रिय पुत्र गणेश को मैं प्रणाम करता हूं ।

जनसामान्य में व्यापक लोकप्रियता रखने वाले इस अद्भुत देवता के गूणों की चर्चा करना लगभग असंभव है। वे गणों के अधिपति हैं तो देवताओं के सम्पूर्ण मण्डल में प्रथम पूज्य भी हैं। बुद्धि कौशल तथा चातुर्य को प्रदान करने वाले है तो कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने वाले भी हैं। समस्त देव सेना और शिवगणों को पराजित करने वाले हैं, तो दूसरी ओर महाभारत जैसे ग्रंथ के लेखक भी हैं। ऐसे सर्वगुण संपन्न देवता की आराधना न सिर्फ भौतिक जीवन बल्कि आध्यात्मिक जीवन की भी समस्त विध मनोकामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं।

भगवान गणेश की आराधना या साधना उनके तीन स्वरूपों में की जाती है। उनके तीनों स्वरूपराजसी तामसी तथा सात्विक स्वरूप साधक की इच्ठा तथा क्षमता के अनुसार कार्यसिद्धि प्रदान करते ही हैं।

भारतीय संस्कृति में जो परंपरा है उसके अनुसार तो प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में गणपति का स्मरण किया ही जाता है। यदि नित्य न किया जाये तो भी गणेश चतुर्थी जैसे अवसरों पर तो गृहस्थों को उनका पूजन व ध्यान करना चाहिए।

व्यापारसेल्समार्केटिंगएडवर्टाइजिंग जैसे क्षेत्रों में जहां वाकपटुता तथा चातुर्य की नितांत आवश्यकता होती हैवहां गणपति साधना तथा ध्यान विशेष लाभप्रद होता है। भगवती लक्ष्मी को चंचला माना गया है। लक्ष्मी के साथ गणपति का पूजन लक्ष्मी को स्थायित्व प्रदान करता है। इसलिए आप व्यापारी बंधुओं के पास ऐसा संयुक्त चित्र लगा हुआ पायेंगे।

आगे की पंक्तियों में भगवान गणपति का एक स्तोत्र प्रस्तुत है। इस स्तोत्र का नित्य पाठ करना लाभप्रद होता है।

गणपति स्तोत्र

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियायलम्बोदराय सकलाय जगद्विताय ।
नागाननाय श्रुति यज्ञ विभूषितायगौरीसुताय गणनाथ नमोस्तुते ॥

भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वरायसर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय ।
विद्याधराय विकटाय च वामनायभक्तप्रसन्न वरदाय नमोनमस्ते ॥

नमस्ते ब्रह्‌मरूपाय विष्णुरूपायते नमःनमस्ते रूद्ररूपाय करि रूपायते नमः ।
विश्वरूपस्य रूपाय नमस्ते ब्रह्‌मचारिणेभक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायकः ॥

लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रियनिर्विनं में कुरू सर्व कार्येषु सर्वदा ।
त्वां विन शत्रु दलनेति च सुंदरेति भक्तप्रियेति शुभदेति फलप्रदेति ॥

विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवंति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेवि ।
अनया पूजया सांगाय सपरिवाराय श्री गणपतिम समर्पयामि नमः ॥

इस स्तोत्र का पाठ कर गणपति को नमन करें ।

7 दिसंबर 2018

गीताप्रेस : अध्यात्मिक ग्रन्थ प्रकाशन

गीताप्रेस : अध्यात्मिक ग्रन्थ प्रकाशक
गीता प्रेस भारत के प्रमुख अध्यात्मिक प्रकाशनों में से एक है | यहाँ से कल्याण नमक पत्रिका निकलती है | विस्तृत जानकारी के लिए गीता प्रेस की वेब साईट :-




गीताप्रेस द्वारा मुख्य रूपसे हिन्दी तथा संस्कृतभाषामें गीताप्रेसका साहित्य प्रकाशित होता हैकिन्तु अहिन्दीभाषी लोगोंकी असुविधाको देखते हुए अब तमिलतेलुगुमराठीकन्नड़बँगला,गुजराती तथा ओड़िआ आदि प्रान्तीय भाषाओंमें भी पुस्तकें प्रकाशित की जा रही हैं और इस योजनासे लोगोंको लाभ भी हुआ है। अंग्रेजी भाषामें भी कुछ पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। अब न केवल भारतमें अपितु विदेशोंमें भी यहाँका प्रकाशन बड़े मनोयोग एवं श्रद्धासे पढ़ा जाता है। प्रवासी भारतीय भी यहाँका साहित्य पढ़नेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं । 

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सांब सदाशिवाय नमः




॥ ऊं सांब सदाशिवाय नमः ॥

 लाभ - यह शिव तथा शक्ति की कृपा प्रदायक है.


विधि ---
  1. रात्रि काल में जाप होगा.
  2. रत्रि ९ बजे से सुबह ४ बजे के बीच का समय रात्रि काल है.
  3. सफ़ेद या लाल रंग का आसन तथा वस्त्र होगा.
  4. दिशा पूर्व तथा उत्तर के बीच [ईशान] की तरफ़ मुंह करके बैठना है.
  5. हो सके तो साधना स्थल पर ही रात को सोयें.
  6. किसी पर साधन काल में क्रोध न करें.
  7. यथा संभव मौन रखें.
  8. साधना में बैठने से पहले हल्का भोजन करें अन्यथा नींद आयेगी.
  9. जप संख्या अपनी क्षमतानुसार 1, 3,5,11,21,51,101 माला नित्य कर सकते हैं.
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तांत्रिक विग्रह : श्री शरभेश्वरम


6 दिसंबर 2018

भैरव अष्टोत्तर शत नाम


भैरव अष्टोत्तर शत नाम


01) ॐ भैरवाय नम:
02) ॐ भूतनाथाय नम: 
03) ॐ भूतात्मने नम: 
04) ॐ भूतभावनाय नम: 
05) ॐ क्षेत्रदाय नम: 
06) ॐ क्षेत्रपालाय नम: 
07) ॐ क्षेत्रज्ञाय नम: 
08) ॐ क्षत्रियाय नम: 
09) ॐ विराजे नम: 
10) ॐ श्मशानवासिने नम: 
11) ॐ मांसाशिने नम: 
12) ॐ खर्पराशिने नम: 
13) ॐ स्मरांतकाय नम: 
14) ॐ रक्तपाय नम: 
15) ॐ पानपाय नम: 
16) ॐ सिद्धाय नम: 
17) ॐ सिद्धिदाय नम: 
18) ॐ सिद्धसेविताय नम: 
19) ॐ कंकालाय नम:
20) ॐ कालशमनाय नम: 
21) ॐ कलाकाष्ठाय नम: 
22) ॐ तनये नम: 
23) ॐ कवये नम:
24) ॐ त्रिनेत्राय नम: 
25) ॐ बहुनेत्राय नम: 
26) ॐ पिंगललोचनाय नम: 
27) ॐ शूलपाणये नम: 
28) ॐ खडगपाणये नम: 
29) ॐ कंकालिने नम: 
30) ॐ धूम्रलोचनाय नम: 
31) ॐ अभीरवे नम: 
32) ॐ भैरवीनाथाय नम: 
33) ॐ भूतपाय नम: 
34) ॐ योगिनीपतये नम: 
35) ॐ धनदाय नम: 
36) ॐ अधनहारिणे नम: 
37) ॐ धनवते नम: 
38) ॐ प्रीतिवर्धनाय नम: 
39) ॐ नागहाराय नम: 
40) ॐ नागपाशाय नम: 
41) ॐ व्योमकेशाय नम: 
42) ॐ कपालभृते नम: 
43) ॐ कालाय नम: 
44) ॐ कपालमालिने नम: 
45) ॐ कमनीयाय नम: 
46) ॐ कलानिधये नम: 
47) ॐ त्रिनेत्राय नम: 
48) ॐ ज्वलन्नेत्राय नम: 
49) ॐ त्रिशिखिने नम: 
50) ॐ त्रिलोकपालाय नम: 
51) ॐ त्रिवृत्ततनयाय नम: 
52) ॐ डिंभाय नम: 
53) ॐ शांताय नम: 
54) ॐ शांतजनप्रियाय नम: 
55) ॐ बटुकाय नम: 
56) ॐ बटुवेशाय नम: 
57) ॐ खट्वांगधराय नम: 
58) ॐ भूताध्यक्षाय नम: 
59) ॐ पशुपतये नम: 
60) ॐ भिक्षकाय नम: 
61) ॐ परिचारकाय नम: 
62) ॐ धूर्ताय नम: 
63) ॐ दिगंबराय नम: 
64) ॐ शूराय नम: 
65) ॐ हरिणे नम: 
66) ॐ पांडुलोचनाय नम: 
67) ॐ प्रशांताय नम: 
68) ॐ शांतिदाय नम: 
69) ॐ शुद्धाय नम: 
70) ॐ शंकरप्रियबांधवाय नम: 
71) ॐ अष्टमूर्तये नम: 
72) ॐ निधीशाय नम: 
73) ॐ ज्ञानचक्षुषे नम: 
74) ॐ तपोमयाय नम: 
75) ॐ अष्टाधाराय नम: 
76) ॐ षडाधाराय नम: 
77) ॐ सर्पयुक्ताय नम: 
78) ॐ शिखिसखाय नम: 
79) ॐ भूधराय नम: 
80) ॐ भूधराधीशाय नम: 
81) ॐ भूपतये नम: 
82) ॐ भूधरात्मजाय नम: 
83) ॐ कपालधारिणे नम: 
84) ॐ मुंडिने नम: 
85) ॐ नागयज्ञोपवीतवते नम: 
86) ॐ जृंभणाय नम: 
87) ॐ मोहनाय नम: 
88) ॐ स्तंभिने नम: 
89) ॐ मारणाय नम: 
90) ॐ क्षोभणाय नम: 
91) ॐ शुद्धनीलांजनप्रख्याय नम: 
92) ॐ दैत्यघ्ने नम: 
93) ॐ मुंडभूषिताय नम: 
94) ॐ बलिभुजे नम: 
95) ॐ बलिभुंगनाथाय नम: 
96) ॐ बालाय नम: 
97) ॐ बालपराक्रमाय नम: 
98) ॐ सर्वापत्तारणाय नम: 
99) ॐ दुर्गाय नम: 
100) ॐ दुष्टभूतनिषेविताय नम: 
101) ॐ कामिने नम: 
102) ॐ कलानिधये नम: 
103) ॐ कांताय नम: 
104) ॐ कामिनीवशकृद्वशिने नम: 
105) ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम: 
106) ॐ वैद्याय नम: 
107) ॐ प्रभवे नम: 
108) ॐ विष्णवे नम:

विधि:-
  • काला/लाल वस्त्र पहनें.
  • दक्षिण दिशा की और मुख रखें .
  • भैरव यंत्र या चित्र या पंचमुखी रुद्राक्ष रखकर कर सकते हैं .
  • सरसों के तेल का दीपक जला सकते हैं .
  • हर मन्त्र के साथ सिंदूर या लाल पुष्प चढ़ाएं .


5 दिसंबर 2018

भैरवं नमामि



भैरवं नमामि
यं यं यं यक्ष रूपं दश दिशि विदितं भूमि कम्पायमानं
सं सं सं संहार मूर्ति शुभ मुकुट जटा शेखरं चन्द्र विम्बं
दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुख चौर्ध्व रोमं करालं
पं पं पं पाप नाशं प्रणमतं सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ १ ॥
रं रं रं रक्तवर्णं कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्रा विशालं
घं घं घं घोर घोषं घ घ घ घ घर्घरा घोर नादं
कं कं कं कालरूपं धग धग धगितं ज्वलितं कामदेहं
दं दं दं दिव्य देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ २ ॥
लं लं लं लम्ब दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वाकरालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुट विकृत मुखंमासुरं भीम रूपं
रूं रूं रूं रुण्डमालं रुधिरमय मुखं ताम्र नेत्रं विशालं
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ३ ॥
वं वं वं वायुवेगं प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपं
खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवन निलयं भास्करं भीमरूपं
चं चं चं चालयन्तं चल चल चलितं चालितं भूत चक्रं
मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ४ ॥
खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालान्धकारं
क्षि क्षि क्षि क्षिप्र वेग दह दह दहन नेत्रं सन्दीप्यमानं
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन गर्जितं भूमिकंपं
बं बं बं बाललीलम प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ५ ॥

  • भैरव प्रार्थना है.
  • उनकी कृपा प्रदान करती है .

4 दिसंबर 2018

काल भैरव साधना




काल भैरव साधना निम्नलिखित परिस्थितियों में लाभकारी है :-
  • शत्रु बाधा.
  • तंत्र बाधा.
  • इतर योनी से कष्ट.
  • उग्र साधना में रक्षा हेतु.
काल भैरव मंत्र :-

|| ॐ भ्रं काल भैरवाय फट ||

विधि :-
  1. रात्रि कालीन साधना है.अमावस्या, नवरात्रि,कालभैरवाष्टमी, जन्माष्टमी या किसी भी अष्टमी से प्रारंभ करें.
  2. गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी के अनुसार शिवरात्रि भैरव साधना का सिद्ध मुहूर्त है |
  3. रात्रि 9 से 4 के बीच करें.
  4. काला आसन और वस्त्र रहेगा.
  5. रुद्राक्ष या काली हकिक माला से जाप करें.
  6. १०००,५०००,११०००,२१००० जितना आप कर सकते हैं उतना जाप करें.
  7. जाप के बाद १० वा हिस्सा यानि ११००० जाप करेंगे तो ११०० बार मंत्र में स्वाहा लगाकर हवन  कर लें.
  8. हवन सामान्य हवन सामग्री से भी कर सकते हैं.

  9. काली  मिर्च या  तिल का प्रयोग भी कर सकते हैं.
  10. अंत में एक कुत्ते को भरपेट भोजन करा दें. काला कुत्ता हो तो बेहतर.
  11. एक नारियल [पानीवाला] आखिरी दिन अपने सर से तीन बार घुमा लें, अपनी इच्छा उसके सामने बोल दें. 
  12. किसी सुनसान जगह पर बने शिव या काली मंदिर में छोड़कर बिना पीछे मुड़े वापस आ जाएँ. 
  13. घर में आकर स्नान कर लें. 
  14. दो अगरबत्ती जलाकर शिव और शक्ति से कृपा की प्रार्थना करें. 
  15. किसी भी प्रकार की गलती हो गयी हो तो उसके लिए क्षमा मांगे.
  16. दोनों अगरबत्ती घर के द्वार पर लगा दें.

प्रत्यंगिरा साधना

मनुष्य का जीवन लगातार विविध संघर्षों के बीच बीतता है संघर्ष कई प्रकार के होते हैं और समस्याएं भी कई प्रकार की होती हैं । कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब व्यक्ति समस्याओं और बाधाओं के बीच बुरी तरह से घिर जाता है और उसे आगे बढ़ने के लिए कोई मार्ग दिखाई नहीं देता है ।




साधना के क्षेत्र में वह सर्वश्रेष्ठ साधना जो  ऐसी विपरीत परिस्थिति में साधक को चक्रव्यू से निकालकर विजयी बनाती है वह साधना है प्रत्यंगिरा साधना ।
प्रत्यंगिरा साधना बेहद उग्र साधना होती है और इस साधना की काट केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसने स्वयं प्रत्यंगिरा साधना कर रखी हो ।

प्रत्यंगिरा साधना करने की अनुमति साधक को अपने गुरु से लेनी चाहिए क्योंकि इस साधना में साधक को कई परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है जिस में सफलता प्राप्त करने के लिए सतत गुरु का मार्गदर्शन वह भी सक्षम गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य होता है ।
प्रत्यंगिरा अनेक प्रकार की होती है जिसमें से सबसे प्रमुख है 

महा विपरीत प्रत्यंगिरा 

महा विपरीत प्रत्यंगिरा एक ऐसी साधना है जो हर प्रकार के तंत्र प्रयोग को वापस लौटाने में सक्षम है और विपरीत प्रत्यंगिरा के द्वारा लौटाई गई तांत्रिक शक्तियां गलत कर्म करने वाले साधक को उचित दंड अवश्य देती है


शिव प्रत्यंगिरा
काली प्रत्यंगिरा

विष्णु प्रत्यंगिरा

गणेश प्रत्यंगिरा

नरसिंह प्रत्यंगिरा 

सहित विभिन्न दैवीय शक्तियों की प्रत्यंगिरा विद्याएं हैं  जो आप सक्षम गुरु से प्राप्त करके साधना को संपन्न कर सकते हैं  ।

यहां विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य बात यह है की प्रत्यंगिरा साधना बेहद उग्र साधना में गिनी जाती है, इसलिए छोटे बच्चे , बालिकाएं , महिलाएं और कमजोर मानसिक स्थिति वाले पुरुष तथा साधक साधना को गुरु के सानिध्य में उनकी अनुमति से ही संपन्न  करें ।

तांत्रिक सामग्री : श्री बगलामुखी


तांत्रिक विग्रहम : श्री वेंकटेश्वरम