24 अगस्त 2025

श्री गणपति माला मंत्र

 श्री गणपति माला मंत्र



इस माला मंत्र मे 1008 से ज्यादा अक्षर हैं इसलिए इसका उपयोग वह साधक भी कर सकते हैं जो गुरु दीक्षा नहीं लिए है ।

ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ऐं ग्लौं ॐ ह्रीं क्रौं गं ॐ ,
नमो भगवते महागणपतये स्मरणमात्रसंतुष्टाय सर्वविद्याप्रकाशकाय सर्वकामप्रदाय भवबंधविमोचनाय
ह्रीं सर्वभूतबंधनाय ।
क्रों साध्याकर्षणाय ।
क्लीं जगतत्रयवशीकरणाय ।
सौ: सर्वमनक्षोभणाय ।
श्रीं महासंपत्प्रदाय ।
ग्लौं भूमंडलाधिपत्यप्रदाय ।
महाज्ञानप्रदाय चिदानंदात्मने गौरीनंदनाय महायोगिने शिवप्रियाय सर्वानंदवर्धनाय सर्वविद्याप्रकाशनप्रदाय
द्रां चिरंजिविने ।
ब्लूं सम्मोहनाय ।
ॐ मोक्षप्रदाय ।
फट वशी कुरु कुरु ।
वौषडाकर्षणाय ।
हुं विद्वेषणाय विद्वेषय विद्वेषय ।
फट उच्चाटय उच्चाटय ।
ठ: ठ: स्तंभय स्तंभय ।
खें खें मारय मारय ।
शोषय शोषय ।
परमंत्रयंत्रतंत्राणि छेदय छेदय ।
दुष्टग्रहान निवारय निवारय ।
दु:खं हर हर ।
व्याधिं नाशय नाशय नम: ।
संपन्नय संपन्नय स्वाहा ॥
सर्वपल्लवस्वरुपाय महाविद्याय गं गणपतये स्वाहा ॥
यन्मंत्रे क्षितलांछिताभमनघं मृत्युश्च वज्राशिषो भूत प्रेत पिशाचका: प्रतिहता निर्घातपातादिव उत्पन्नं च समस्त दु:ख दुरितं उच्चाटनोत्पादकं वंदेsभीष्टगणाधिपं भयहरं विघ्नौघनाशं परम ॥
ॐ गं गणपतये नम: ।
ॐ नमो महागणपतये , महावीराय , दशभुजाय , मदनकाल विनाशन , मृत्युं हन हन , यम यम , मद मद , कालं संहर संहर , सर्व ग्रहान चूर्णय चूर्णय , नागान मूढय मूढय , रुद्ररूप, त्रिभुवनेश्वर , सर्वतोमुख हुं फट स्वाहा ॥

ॐ नमो गणपतये , श्वेतार्क गणपतये , श्वेतार्क मूल निवासाय , वासुदेव प्रियाय , दक्ष प्रजापति रक्षकाय , सूर्य वरदाय , कुमार गुरवे , ब्रह्मादि सुरावंदिताय , सर्प भूषणाय , शशांक शेखराय , सर्पमालालंकृत देहाय , धर्म ध्वजाय , धर्म वाहनाय , त्राहि त्राहि , देहि देहि , अवतर अवतर , गं गणपतये , वक्रतुंड गणपतये , वरवरद , सर्व पुरुष वशंकर , सर्व दुष्टमृग वशंकर , सर्वस्व वशंकर , वशी कुरु वशी कुरु , सर्व दोषान बंधय बंधय , सर्व व्याधीन निकृंतय निकृंतय , सर्व विषाणि संहर संहर , सर्व दारिद्र्यं मोचय मोचय , सर्व विघ्नान छिंदि छिंदि , सर्व वज्राणि स्फोटय स्फोटय , सर्व शत्रून उच्चाटय उच्चाटय , सर्वसिद्धिं कुरु कुरु , सर्व कार्याणि साधय साधय , गां गीं गूं गैं गौं गं गणपतये हुं फट स्वाहा ॥
ॐ नमो गणपते महावीर दशभुज मदनकालविनाशन मृत्युं हन हन , कालं संहर संहर , धम धम , मथ मथ , त्रैलोक्यं मोहय मोहय , ब्रह्म विष्णु रुद्रान मोहय मोहय , अचिंत्य बल पराक्रम , सर्व व्याधीन विनाशाय , सर्वग्रहान चूर्णय चूर्णय , नागान मोटय मोटय , त्रिभुवनेश्वर सर्वतोमुख हुं फट स्वाहा ॥

यह एक सिद्ध माला मंत्र है ।
आप इसे नित्य पूजन मे प्रयोग कर सकते है ।
किसी समस्या समाधान हेतु इसका 21, 51 या 108 पाठ कर सकते है ।



23 अगस्त 2025

उच्चिष्ठ गणपति

  यह भगवान श्री गणेश की अति विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप की साधना है । इसे करने से सर्व अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं । इच्छुक साधक मेरे गुरुदेव स्वामी सुदर्शन नाथ जी से उच्चिष्ठ गणपति दीक्षा प्राप्त करके इस साधना को संपन्न कर सकते हैं ।  

उच्चिष्ठ गणपति मंत्र :-



॥ हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा ॥
 
सामान्य निर्देश :-
  • साधनाएँ इष्ट तथा गुरु की कृपा से प्राप्त और सिद्ध होती हैं |
  • इसके लिए कई वर्षों तक एक ही साधना को करते रहना होता है |
  • साधना की सफलता साधक की एकाग्रता और उसके श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है |
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विधि :-

  1. रुद्राक्ष की माला सभी कार्यों के लिए स्वीकार्य  है |
  2. जाप के पहले दिन हाथ में पानी लेकर संकल्प करें " मै (अपना नाम बोले), आज अपनी (मनोकामना बोले) की पूर्ती के लिए यह मन्त्र जाप कर रहा/ रही हूँ | मेरी त्रुटियों को क्षमा करके मेरी मनोकामना पूर्ण करें " | इतना बोलकर पानी जमीन पर छोड़ दें |
  3. गुरु से अनुमति ले लें|
  4. पान का बीड़ा चबाएं फिर मंत्र जाप करें |
  5. दिशा दक्षिण की और देखते हुए बैठें |
  6. आसन लाल/पीले रंग का रखें|
  7. जाप रात्रि 9 से सुबह 4 के बीच करें|
  8. यदि अर्धरात्रि जाप करते हुए निकले तो श्रेष्ट है | 
  9. कम से कम 21 दिन जाप करने से अनुकूलता मिलती है | 
  10. जाप के दौरान किसी को गाली गलौच / गुस्सा/ अपमानित ना करें|
  11. किसी महिला ( चाहे वह नौकरानी ही क्यों न हो ) का अपमान ना करें | यथा सम्भव सम्मान करें |
  12. जिस बालिका/युवती/स्त्री के बाल कमर से नीचे तक या उससे ज्यादा लम्बे हों उसे देखने पर मन ही मन मातृवत मानते हुए प्रणाम करें |
  13. सात्विक आहार/ आचार/ विचार रखें |
  14. ब्रह्मचर्य का पालन करें |

15 अगस्त 2025

मन पर नियंत्रण के लिए : काली यंत्र पर त्राटक

 



॥ क्रीं ॥

यन्त्र के मध्य के बिन्दु पर ध्यान लगाकर काली बीज का यथाशक्ति जाप करें |

14 अगस्त 2025

अष्टकाली मंत्र

 


   



॥  ऊं अष्टकाल्यै क्रीं श्रीं ह्रीं क्रीं सिद्धिं मे देहि दापय नमः ॥


  1.  
कमजोर मनस्थिति वाले पुरुष/महिलाएं/बच्चे इस साधना को ना करें |
  1. दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जाप करें.
  2. दिगम्बर अवस्था में जाप करें या काले रंग का आसन वस्त्र रखें.
  3. रुद्राक्ष या काली हकीक माला से जाप करें.
  4. पुरश्चरण १,२५,००० मन्त्रों का होगा.
  5. रात्रिकाल में जाप करें.जप काल मे किसी स्त्री का अपमान न करें 
  6. दशमी के दिन काली मिर्च/ तिल/दशांग/घी/ चमेली के तेल  से दशांश  हवन  करें |
  7. हवन होने के बाद किसी बालिका को यथाशक्ति दान दें |

13 अगस्त 2025

अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काल

 










शवासन संस्थिते महाघोर रुपे ,
                                महाकाल  प्रियायै चतुःषष्टि कला पूरिते |
घोराट्टहास कारिणे प्रचण्ड रूपिणीम,
                                अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काले ॥

मेरी अद्भुत स्वरूपिणी महामाया जो शव के आसन पर भयंकर रूप धारण कर विराजमान है, जो काल के अधिपति महाकाल की प्रिया हैं, जो चौंषठ कलाओं से युक्त हैं, जो भयंकर अट्टहास से संपूर्ण जगत को कंपायमान करने में समर्थ हैं, ऐसी प्रचंड स्वरूपा मातृरूपा महाकाली की मैं सदैव अर्चना करता हूं | 

उन्मुक्त केशी दिगम्बर रूपे,
                                 रक्त प्रियायै श्मशानालय संस्थिते ।
सद्य नर मुंड माला धारिणीम,
                               अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काले ॥
  
जिनकी केशराशि उन्मुक्त झरने के समान है ,जो पूर्ण दिगम्बरा हैं, अर्थात हर नियम, हर अनुशासन,हर विधि विधान से परे हैं , जो श्मशान की अधिष्टात्री देवी हैं ,जो रक्तपान प्रिय हैं , जो ताजे कटे नरमुंडों की माला धारण किये हुए है ऐसी प्रचंड स्वरूपा महाकाल रमणी महाकाली की मैं सदैव आराधना करता हूं |


क्षीण कटि युक्ते पीनोन्नत स्तने,
                               केलि प्रियायै हृदयालय संस्थिते।
कटि नर कर मेखला धारिणीम,
                               अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काले ॥

अद्भुत सौन्दर्यशालिनी महामाया जिनकी कटि अत्यंत ही क्षीण है और जो अत्यंत उन्नत स्तन मंडलों से सुशोभित हैं, जिनको केलि क्रीडा अत्यंत प्रिय है और वे  सदैव मेरे ह्रदय रूपी भवन में निवास करती हैं . ऐसी महाकाल प्रिया महाकाली जिनके कमर में नर कर से बनी मेखला सुशोभित है उनके श्री चरणों का मै सदैव अर्चन करता हूं  ||

खङग चालन निपुणे रक्त चंडिके,
                               युद्ध प्रियायै युद्धुभूमि संस्थिते ।
महोग्र रूपे महा रक्त पिपासिनीम,
                               अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काले ॥ 
देव सेना की महानायिका, जो खड्ग चालन में अति निपुण हैं, युद्ध जिनको अत्यंत प्रिय है, असुरों और आसुरी शक्तियों का संहार जिनका प्रिय खेल है,जो युद्ध भूमि की अधिष्टात्री हैं , जो अपने महान उग्र रूप को धारण कर शत्रुओं का रक्तपान करने को आतुर रहती हैं , ऐसी मेरी मातृस्वरूपा महामाया महाकाल रमणी महाकाली को मै सदैव प्रणाम करता हूं |



मातृ रूपिणी स्मित हास्य युक्ते,
                                प्रेम प्रियायै प्रेमभाव संस्थिते ।
वर वरदे अभय मुद्रा धारिणीम,
                                अम्बे महाकालीम तमर्चयेत सर्व काले ॥


जो सारे संसार का पालन करने वाली मातृस्वरूपा हैं, जिनके मुख पर सदैव अभय भाव युक्त आश्वस्त करने वाली मंद मंद मुस्कुराहट विराजमान रहती है , जो प्रेममय हैं जो प्रेमभाव में ही स्थित हैं , हमेशा अपने साधकों को वर प्रदान करने को आतुर रहने वाली ,अभय प्रदान करने वाली माँ महाकाली को मै उनके सहस्र रूपों में सदैव प्रणाम करता हूं |
|| इति श्री निखिल शिष्य अनिल कृत महाकाल रमणी स्तोत्रं सम्पूर्णम ||

12 अगस्त 2025

श्री कालिकाष्टकम्

  


विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीम ,
समाराध्य कालीम  प्रधाना बभूवुः ।
अनादिम  सुरादिम मखादिम भवादिम,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ 1 ॥

जगन्मोहनीयम तु वाग्वादिनीयम,
सुह्रित्पोषिणी शत्रुसन्हारिणीयम् ।
वचस्स्तम्भनीयम् किमुच्चाटनीयम्,
स्वरुपम् त्वदीयम् न विन्दति देवाः ॥ 2 ॥

इयम् स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली,
मनोजास्तु कामान्यथार्थ प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था  भवंतीति नित्यम्,
स्वरुपम् त्वदीयम् न विन्दन्ति देवाः ॥ 3 ॥

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता,
लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्काः,
स्वरुपम् त्वदीयम् न विन्दन्ति देवाः ॥ 4 ॥

चिदानन्दकन्दम  हसन्मन्दमन्दम ,
शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनाम् कवीनाम् ह्रदि द्योतयन्तम्,
स्वरुपम् त्वदीयम् न विन्दन्ति देवाः ॥ 5 ॥

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा,
कदाचिद्विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला, न वृध्दा, न कामातुरापि,
स्वरुपम् त्वदीयम् न विन्दन्ति देवाः ॥ 6 ॥

क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं,
मयि लोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ 7 ॥

यदि ध्यानयुक्तम पठेद्यो मनुष्य-
स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृहे चाष्टसिध्दिमृते चापि मुक्तिः,
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ 8 ॥



भगवती महाकाली के ध्यान के रूप में आप इसे पढ़ सकते हैं उनकी स्तुति के रूप में इसे पढ़ सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं ।


youtube video :-





आप इसका उच्चारण आडिओ मे यहाँ सुन सकते हैं

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11 अगस्त 2025

महाकाली का स्वयंसिद्ध मन्त्र

    

।। हुं हुं ह्रीं ह्रीं कालिके घोर दन्ष्ट्रे प्रचन्ड चन्ड नायिके दानवान दारय हन हन शरीरे महाविघ्न छेदय छेदय स्वाहा हुं फट ।।



यह महाकाली का स्वयंसिद्ध मन्त्र है.
तंत्र बाधा की काट , भूत बाधा आदि में लाभ प्रद है .
जन्माष्टमी की रात्रि मे इसका जाप करना ज्यादा लाभदायक है .
निशा काल अर्थात रात्रि 9 से 3 बजे के बीच १०८ बार जाप करें । क्षमता हो तो ज्यादा जाप भी कर सकते हैं . 

इस दौरान आप अपने सामने रुद्राक्ष , अंगूठी , माला आदि को सामने रखकर उसे मंत्र सिद्ध करके रक्षा के लिए बच्चों को भी पहना सकते हैं । 
इस मन्त्र का जाप करके रक्षा सूत्र बान्ध सकते हैं।



29 जुलाई 2025

भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने के 108 मंत्र

  

नाग पंचमी विशेष : सर्प सूक्त

 नाग पंचमी विशेष :  सर्प सूक्त



यदि आपको अपने घर में बार बार सांप दिखाई देते हो .....

आपकी कुंडली में कालसर्प दोष हो.........

या आप भगवान शिव के गण के रूप में नाग देवता की पूजा करना चाहते हो तो आप श्रावण मास में इस सर्प सूक्त का नित्य प्रयोग कर सकते हैं ।

सर्प सूक्त

ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा: शेषनागपुरोगमा: ।।
नमोSस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।। 1।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।

कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।

सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।

मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।

पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये च साकेत वासिन:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।

सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।

ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पा: प्रचरन्ति च।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।

समुद्रतीरे च ये सर्पा: ये सर्पा जलवासिन:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।

रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

जिनको काल सर्प दोष है वे इसका १०८ बार पाठ नाग पंचमी से प्रारम्भ करके पूर्णिमा तक कर सकते हैं . 

इसके अलावा आप अपने आसपास अगर कोई शिव मंदिर हो तो उसकी साफ़ सफाई या पोताई जैसी व्यवस्था करें तो भी लाभदायक है . 

नाग पंचमी : सर्प दोष निवारण का मुहूर्त

 नाग पंचमी : सर्प दोष निवारण का मुहूर्त


अधिकांश जातक अपनी कुंडली में कालसर्प दोष को लेकर चिंतित रहते हैं और उसके निवारण का उपाय खोजते रहते हैं ।
कालसर्प दोष पिछले कुछ समय से बहुत ज्यादा प्रचार में आया है और इसके नाम पर कई प्रकार के पूजन अनुष्ठान भी प्रचलित है ।
बैंगलोर के प्रख्‍यात ज्‍योतिषी वेंकट रमन ने ज्‍योतिषीय योगों पर किए अपने अध्‍ययन में पाया, कि प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में कहीं भी कालसर्प योग का उल्‍लेख नहीं है। केवल एक जगह एक सामान्‍य सर्प योग के बारे में जानकारी है ।

प्राचीन ग्रंथों में इतना ही बताया गया है कि राहू और केतु के मध्‍य सभी ग्रह होने पर सर्प योग बनता है।  मेष में राहू है और तुला में केतु इसके साथ सारे ग्रह मेष से तुला या तुला से मेष के बीच हों तो इसे सर्प योग कहा जाएगा।

कालसर्प योग के विषय में यह कहा जाता है कि राहु और केतु के मध्य सभी 7 ग्रहों के आने से कालसर्प योग बनता है। जब राहु से केतु के मध्य अन्य ग्रह होते हैं तो उदित और जब केतु से राहु के मध्य ग्रह होते हैं तो अनुदित काल सर्प योग की रचना होती है।
कुछ ज्योतिषियों के अनुसार यह भी एक ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि सूर्य की गति के कारण कालसर्प योग कभी भी 6 माह से अधिक अवधि के लिए नहीं आता है। इस 6 माह में भी चंद्रमा की गति के कारण 2 सप्ताह यह योग रहता है और 2 सप्ताह नहीं रहता है, जबकि कभी चंद्रमा धुरी से बाहर हो जाता है तो आंशिक कालसर्प योग होता है।

इस विषय पर ज्योतिषियों के बीच में मत भिन्नता रही है । पिछली सदी के प्रसिद्ध ज्योतिषी स्वर्गीय डॉक्टर बीवी रमन, ने कालसर्प योग को सिरे से नकार दिया था। वह 60 वर्ष तक एस्ट्रोलॉजिकल-मैगजीन के संपादक रहे थे।

खैर....... 

जब कालसर्प योग को ज्योतिषियों ने मानना शुरु कर दिया तो इस कालसर्प योग पर आधारित कई ज्योतिषीय किताबें भी प्रकाशित हुईं । इनमें कालसर्प दोष की व्याख्या करते हुए इसे 12 तरह का बताया गया।

जो कि क्रमशः अनन्‍त, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर और शेषनाग नाम के कालसर्प योग हैं।

कालसर्प योग जिस व्यक्ति की कुंडली में रहता है वह अपने भविष्य को लेकर इस प्रकार से चिंतित रहता है जैसे उसे किसी सांप ने डस लिया हो या किसी अजगर ने उसे चारों तरफ से घेर लिया ।

कई बार उनके इस डर का श्रेय उन ज्योतिषियों को भी जाता है जो कालसर्प दोष के नाम पर जातक को डराने में किसी प्रकार की कमी नहीं रखते । जो व्यक्ति किसी समस्या से पीड़ित रहता है वह यह सारी बातें सुनकर बुरी तरह प्रभावित और भयभीत हो जाता है । उसे लगता है कि यह कालसर्प दोष ही सारी समस्या की जड़ में है ......
वास्तव में कालसर्प योग कई प्रकार की सफलताओं को भी प्रदान करने वाला भी माना गया है । अनेक विश्व विख्यात और सफल व्यक्तियों के जीवन में कालसर्प योग मौजूद रहा है ।
विख्यात ज्योतिषी के एन राव के अनुसार मुगल सम्राट अकबर, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंग्लैंड की प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर, अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को काल सर्प दोष था, लेकिन इन्होंने सफलता के नए सोपान अर्जित किए।

ग्वालियर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य सीताराम सिंह ने स्व. विजयाराजे सिंधिया की जन्मकुंडली का विश्लेषण करते हुए एक लेख में लिखा है कि उनकी कुंडली में महापदम नामक कालसर्प योग था । जिसके कारण वह जनता की परमप्रिय नेता बनीं । स्व. धीरूभाई अंबानी की कुंडली में वासुकी नामक कालसर्प योग था । इसमें ग्रहों की दशा के कारण गजकेसरी योग बना । फिल्म अभिनेता रजनीकांत की कुंडली में भी कर्कोटक नामक कालसर्प दोष है । वह आज दक्षिणी फिल्म जगत में सुप्रसिद्व सुपरस्टार हैं।

आचार्य किशोर यश शर्मा ने अपने एक लेख में उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की कुंडली का विशलेषण करते हुए लिखा है कि उनकी कुंडली में कालसर्प दोष था, जिसमें उनके ग्रहों की दशा के कारण राजयोग बना और वह उत्तरप्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री बन गईं ।

अब आप अपने विवेक से कालसर्प दोष के अच्छा या बुरा होने या ना होने पर निर्णय ले सकते हैं ।

सर्प दोष के निवारण के लिए नागपंचमी को एक श्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है । यदि आपको स्वप्न में बार-बार सर्प दिखाई देते हो और आपको इससे डर लगता हो तो इस अवसर पर निम्नलिखित पूजन संपन्न कर सकते हैं । पूजन आपको सर्प की प्रसन्नता प्रदान करने वाले हैं ।

सर्प सूक्त के विषय में मैंने पहले लिखा है आप उसका पाठ नागपंचमी के दिन कर सकते हैं । यह पाठ आप एक बार या एक से अधिक बार अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार कर सकते हैं ।


नाग पंचमी के दिन आप किसी ऐसे शिव मंदिर में जहां पर शिवलिंग के ऊपर नाग ना बना हो वहां पर नाग का दान कर सकते हैं यह भगवान शिव और सर्प दोनों की कृपा प्रदायक है ।

यदि आप दान आदि में विश्वास रखते हैं तो किसी गरीब ब्राह्मण को चांदी का बना हुआ सांप का जोड़ा भी दान कर सकते हैं ।

यदि दान पर आपका विश्वास नहीं है तो तांबे या चांदी से बना हुआ सर्प का जोड़ा आप किसी शिव मंदिर में या नाग देवता के मंदिर में अर्पित कर सकते हैं , यदि यह दोनों उपलब्ध नहीं हो तो आप किसी नदी या तालाब में भी इसे प्रवाह दे सकते हैं इससे भी आपको अनुकूलता प्राप्त होगी ।